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डॉ. बलदेव की ग्यारह
कहानियाँ
केंचुल
असहाय
एक गहरा सन्नाटा टूटा। सिसकियाँ एक क्षण जीवन्त हुई और दूसरे
क्षण ठंडी और निःशब्द लौट गई।
अभीकुछ देर है
कुछ ही देर में साला मर जावेगा।
हम पन्द्रह बीस मिनट बाद उसे नल्ली में फेंक दिये रहेंगे साला
अभी तक जी रहा है, हाथ लगा दूँ क्या, जरा जल्दी निपट जावेंगे।
मृत्यु की नीलिमा को ओढ़ा हुआ बूढ़ा इन बातों को सुन और भी डर
गया, सिर से पैर तक कम्बल ढंक लिया और डर को हाँकने के लिए
खाँसने लगा जिससे उसे कोई मरा न समझ ले।
आसपास खाटों पर लावारिश लाशें पड़ी थीं । गद्दे पीप और पेशाब
को सोखे हुए मरीजों को समेट कर फैले थे । गंधक की गंध ओर सडांध
से लौटती हवा और स्टो की भाँय-भाँय वातावरण को प्राणान्तक बना
रही थी इसी वक्त दो सफेदपोशधारी जिसमें एक के गले से स्थेसिस
लटक रहा था तथा दूसरा जिसके हाथ में चमकदार सर्ज़री प्लेट
(डिसेक्शन वाक्स) थी, कमरा नं. 9 में प्रवेश किए ।
रेलिंग से हाथ खींचकर दोनों फुसफुसाने लगे, फिर दाँत से जीभ
सटाकर अदव से झुककर फिर खड़े हो गये। क्षण भर बाद कोई आदेश न
पाकर पीछे की ओर मुट्ठी बांधे बरांडे में आकर दुबकने से लगे।
डॉक्टर को कमरे में आते देखकर मरीज चमके हुए बकरों-सा सींग
खींचने लगे। कुछ कातर हो गये, कुछ खांसना बंद-कर गहरी निद्रा
में भी उच्छावासें भरने लगे। कोने वाली औरत की कमर के नीचे
इंजेक्शन देते देख उसकी बच्ची भयभीत हो आंख भींच ली।
दोनों यमदूत खिड़की के शीशे के पार हथेली में आँखे डालकर कुछ
देखने लगे और साँस खींचकर कुछ सूंघने की कोशिश तक करने लगे। एक
बुदबुदाकर डॉक्टर को कुछ भद्दी सी गाली देकर पच्च से फर्श पर
थूंका और पैर से साफ कर एक भरपूर चुटकी फाँक गया। दूसरे से न
रहा गया ।
“यह
डॉक्टर पैसा लेकर कितनों को बचा देता है”
“साला
दवाई को मारकेट में सेल करता है,”
“और
हम यूं ही खाली हाथ लौट जाते हैं। उसे तो सब कुछ मिल जाता है
पैसा, दारू, नर्स
।”
“हाँ
भई” कहकर पहला चुप हो गया । दूसरे के हलक में
कुछ शब्द आकर अटक गये और यह उन्हें न तो निगल पा रहा था और न
ही उगल पा रहा था। उसके कान में स्टो की भाँय-भाँय और तेज-तेज
डराने वाली रोशनी और भी तेज और कर्कश हो गई ।
डॉक्टर के लौटने के बाद न जाने कब से वह बदसूरत बीमार आदमी
धीरे-धीरे कम्बल खींचकर बुझी-बुझी आँखों से बाहर कुछ देखने
सुनने का प्रयास कर रहा था......अचानक उसकी आँखों में-
मोतिया-बिन्दु उभरे फिर वे एक सर्किल में घूमकर काल-चक्र में
बदल गए और अचानक ही ठुमक कर दो वेजान पुतले से उसके सामने खड़े
हो गए । वह पहले से और भी ज़्यादा खाँसने लगा। खाँस-खाँस कर
मौत को हँकालने लगा। और अब मौत दूर-दूर से डैने फैलाकर तेजी से
चोंच मारने लगी थी।
उधर कमरा नं. 8 में किसी नवजात शिशु का कंठ फूटा । प्रसव
पीड़ा की कराह अब बंद हो चुकी है। वहाँ खुशियों का माहौल खड़ा
हो चुका है। असाध्य चिकित्सा की सफलता के बाद सबको गहरा संतोष
और आंतरिक आनन्द है। किन्तु कमरा नं. 9 के वरांडे में अब भी दो
आवाज़े असंतुष्ट हैं।
“एक
आवाज़- “ आज तो खूब छनेगा”
दूसरी- “अरे
हमें क्या मिलेगा....दो रोटी और दो बोटी और जूठे पात्र”
“अब
छोड़....इधर देख बूढ़ा ऐंठ रहा है, और यह लावारिश है।”अचानक वत्तियाँ गुल हुई किन्तु दो मिनट बाद ही वापस आ गई। इनकी कितनी
अरमानें पल में ऊगी और डूबीं। इससे वे खाँसने लगे।
“साले सारे वल्व एक साथ फ्यूज़ क्यों नहीं हो जाते।”
रात बढ़ी और अस्पताल का असली रूप झूमकर सामने आया। सिसकियाँ
गर्म और हवा बंद कमरों में उठने लगी....फिर छप्परों में,
खिड़कियों में, दरारों में ईंट-ईंट के संधिस्थल में खिसियानी
हँसी छिप-छिप कर सरकने लगी और बैठने लगी। उसमें पहला और ऊँचा
व्यक्ति ऊँघने लगा था। और दूसरा जो नाटा था केहुनी खिड़की पर
टिकाए था अचानक उत्साहित हो जल्दीवाजी में बोला-
“अबे
सुन”
“क्या
है”
“चलो”
उसने प्रश्न किये वगैर ही कहा-
“हो
गया, अच्छ ही हुआ”
“चलो
राहत मिली”
डॉक्टर तपतीश कर चला गया । बाबू से दो-दो के एक-एक नोट दुखी
भाव से हाथ में लेकर वे वह स्लीपर उठाकर गेट के बाहर हुए और एक
साथ मुस्करा उठे। वे अँधेरे रास्ते में सावधानी से पैर रखते
गंतव्य की ओर जा रहे थे। बीच-बीच में वे जेब में हाथ डाल लेते
थे और आँखें उचका कर शव को देख भी लेते थे।
अरे ‘बू
आ रही है।’
‘बू
की क्या बात है बे....आदमी की वू से ज़्यादा क्या बुरा
है....फिर ये तो हमारा जैसा ही लावारिश है।’
‘तब
तो वह तेरा जरूर बाप रहा होगा’
‘अबे
चुप’
‘क्या
बुरा है....यह तो रोज का धंधा है। चल आगे बढ़, थोड़ी दूर और
है।’
ढेर-सा अंधेरा शहर के कोने में
‘कचरा’ के साथ इकट्ठा हो गया था। अचानक बेशरम के
झुझांट में एक उलझा और
‘बूढ़ा’
सीधा खड़ा हो गया। कुछ पत्तों में खरखराहट
हुई दोनों के चारों कान चौकन्ने हो गए । एक ने लाइटर जलाई।
बूढे़ की आँखें उलट गईं थीं और मुँह कुछ ऐंठ-सा गया था। दोनों
अनिदिष्ट शक्ति से एकाएक शहर की ओर मुड़े...वे बड़े शान से
अकड़-अकड़े चलने लगे थे......
पहले ने सिर को ढीला किया उसकी कमीज़ आस्तीन से खिसकने लगी।
दूसरे ने भी वैसा ही किया। दोनों शरीर को ढ़ीला और ढीला छोड़ते
गये और कमीज़ केंचुल-सी उतरती चली गई, पसीने की गमक के साथ।
डॉ. बलदेव
स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,
छत्तीसगढ़
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