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डॉ. बलदेव की ग्यारह
कहानियाँ
बूढ़ा देव का कोप
सरपंच
ने दूर से ही देख लिया था, साइकिल से वह उतरा । उसे सामने खड़े
देखकर मैंने भी गाड़ी रोक दी । हालचाल पूछने पर उसने बताया-
साहब सरकार ने जनहित में मुकदमा वापस ले लिया । हम सब लोग बरी
हो गये । बधाई देते हुए मैंने कहा अब सुख शांति से रहो भाई ।
सुख शांति अब कहाँ, साहब लड़ाई तो अब शुरु होगी । पिछली बार तो
अंजोर सिंह की चूक के कारण साला जिंदा बच निकला
था.....अब.....मैंने टोकते हुए कहा- देख भाई पाले का गलना तो
तय है, लेकिन उसे खड़ी फसल बरबाद हो जाती है, रुआँसे स्वर में
उसने कहा- खेती बारी तो इन तीन महीनों में चौपट हो ही गई साहब
अब भाई धीरज धरो, गाँव के तुम्हीं मुखिया हो, अगर तुम ही बहक
गए, तो बेचारे मजदूर-किसानो का क्या होगा । उसकी आँखें छलछला
गयीं बोला- साहब इन साले नेताओं की राजनीति हम समझते हैं सामने
चुनाव है न इसलिए केश वापिस ले लिया गया, उधर नेता जी ने सेठ
के नुकसान का एक का दो भर दिया । जनता का पइसा है
? इस चुनाव में देखते हैं, ये गाँव में कैसे घुसते हैं
?
न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी । बूढ़ादेव
के कोप से इन कुत्तों को कौन बचायेगा साहब। मैंने हामी भरते
हुए कहा- भाई जब भगवान का नाम लेते हो तो उसके न्याय पर भी
विश्वास करो । घनघोर जंगल के बीच की सूनी सड़क पर अन्धेरा
बढ़ता ही जा रहा था । इसलिये जल्दी ही हम अपनी अपनी दिशाओं में
बढ़ गए ।
रास्ते भर सरपंच का वह तमतमाया चेहरा याद आता रहा । अधम सेठ की
करतूतें याद आने लगी । उसी ने अपने स्वार्थ में भोले-भाले इन
बनवासियों को लठैत बनाया था.....याद आया जुहड़मल के इस
नवाबजादे का घिनौना चेहरा.........काली करतूतें.....इन्हीं
भोले-भाले लोगों को ठग फुसलाकर, डरा-धमकाकर वह करोड़पति बना
हुआ है । याद आया बाजार का वह दिन....
महुए, सरई बीज, लाख, चिरौंजी की टोकरी उठाए बनवासी
महिलाएं.............आपस में बतियाती बाजार की ओर जा रही हैं ।
बातचीत जारी है
–
सभी सचेत हो जाओ अधम सेठ को कुछ भी नहीं बेचना है ।
क्यों तू तो पहले उस पर मरती थी आज क्या हुआ
?
चंपा भउजी, कौन उस बूढ़े पर मरेगा....बताए देती हूँ उसकी दूकान
के पास तक नहीं जाना है।
क्यों कुछ बतलाएगी
?
अरे नहीं जानती । उसके लड़के ने गाँव के दो अनाथ बच्चों को
ट्रेक्टर से कुचला है । गाँव में एका हो गयी है, जो कोई भी
उसके यहाँ लेन-देन करेगा उसे ज़ुर्माना हो जाएगा । उसकी
ट्रेक्टर में भी नहीं चढ़ना है ।
ट्रेक्टर रहेगी तब न, पहले जब्त हो गयी है । अरे तुम किस
दुनिया में रहती हो, वह तो कबका छुड़ाकर ले आया है। और उसके
लड़के का क्या हुआ, उसे तो जेल में बंद कर दिये थे न
!
‘अरे
पगली सेठ की पहुँच कचहरी तक है, दो ही दिन में उसे ज़मानत मिल
गयी, अब वह गुल्छरें उड़ा रहा है।
अब तो सरदार के ट्रेक्टर में चढ़ना है, वह हफ्ता पाँच रूपये
अधिक देगा। सड़क का काम फिर शुरु होने वाला है।
मैं कल अस्पताल गई थी दीदी, बेचारे लड़के के दोनों पैर कट गए
हैं, लड़के के हाथ पैरे में प्लास्टर चढ़े है, चेहरा कुरुप हो
गया है, इससे तो अच्छा था बूढ़ा देव उसे अपने पास बुला लेता
!
कितने ही थाना-कचहरी सेठ का कुछ भी न बिगाड़ सके, लेकिन इस
पापी को बूढ़ादेव का कोप जला देगा
?
क्या खाख जला देगा। अब बूढ़ादेव बुढ़ा गये हैं। अंजोर सिंह की
विवाह में जोगी की लड़की को किसने विगाड़ा। बेचारा सिदार
लोकलाज के भय से रिपोट तक नहीं लिखा सका। डागदर बाबू को गला
दबाकर किसने मारा उसकी नर्स बाई को किसने रखा हैं
? हमारे बूढ़ादेव ने क्या किया
? अरे पगली वह सब देख रहा है, देख लेना एक
दिन बूढ़ादेव का क्रोध उसे भस्म कर देगा। बातचीत करती-करती वे
महिलाएं बाजार पहुँच गई और इधर उधर बिखर गयीं।
000000
उस दिन बाजार गर्म थी । तरह तरह की बातें हो रही थी। बाजार का
दिन और छेरछेरा का पर्व । जवान लटलट से पिये हुए थे । कोई
भजिया खा रहा था तो कोई मूंगफली छिल रहा था। कोई गाली-गलौज कर
रहा था । लेनदेन करने वाले अपने कामों में लगे थे । शोर के ऊपर
शोर । बाजार में घूमते हुए चेलिकों ने दरोगा को फटफटी में
गाँव के भीतर जाते हुए देख लिया । सब एक जगह जुड़ियाने लगे ।
उधर गुड़ी-चौक में पूछताछ शुरु हुई। भारी भरकम शरीर वाले दरोगा
ने रौब में पूछा। क्या नाम है बे
?
पुसु महराजा
।
ये पुसु क्या है रे ।
फोसवा महराज
।
फोसवा माने पुसु
।
साले ठीक ठीक बता पुस-उसु क्या बोलता है
?
दूर खड़ा अंजोर सिंह पास आया । गाँव का सयाना था, बोल पड़ा-
पुस नाम हय साहेब इसका । पोसवा भी इसे कहत हय……
चुप्प बे साले बुड्डा, हमको समझाता है, भाग साले यहाँ से नहीं
तो तेरी गौंटिआई घुसेड़ दूँगा।
अंजोर सिंह डर गया और गुड़ी से बाजार की ओर बढ़ गया।
आगे दरोगा ने पूछा-
हाँ तो क्या बताया रे...
पुसु महराज पुसु…..
अच्छा ठीक है, अब ये बता, सेठ की ट्रेक्टर कौन चलाता है-
मैं…..
साले तेरे पास लाइसेंस है
?
हाँ साहेब....
दिखा....
सेठ रखा है साहब....
अच्छा उस दिन ट्रेक्टर तू ही चला रहा था न...
नहीं महराज…..
तो कौन चला रहा था
?
बंटी…
बंटी कौन ?
सेठ का लड़का साहेब, उस दिन मुझे ढकेल कर उसी ने स्टैरिंग
घुमाई और बच्चों को कुचल दिया…..
साला झूठ बोलता है, ट्रेक्टर तो तू ही चला रहा था, बोलता है कि
नहीं नई चला रहा था साहब.....
सहसा ही दरौगा का नशा चढ़ा, आखें लाल हुई और तीन झापड़ पुस की
कनपटी में दे मारा । पिस्तौल तानते हुए दरोगा ने धमकाया–बोला साले गाड़ी तू ही चला रहा था न....
ना हाँ …..
मुन्शी जी कागज में इसका अंगूठा लो ।
साहब मैं पढ़ा लिखा हूँ
।
अच्छा है, अंगूठा नहीं देता तो दस्तखत कर...कर.....
साहब ये तो कोरा है
!
तो क्या हुआ, कानून मत बघार सीधे दस्तखत कर, नहीं तो, पिस्तौल
देख रहा हैं न
!उड़ा दूँगा.....
काँपते हाथ में पुसु ने दस्तखत कर दिया । फिर मुन्शी ने पास
खड़े कई लोगों से अंगूठे का निशान ले लिया और बस्ता बाँधने
लगा। दरोगा उठने वाला था कि इतने में ही चेलिकों के झुंड ने
उसे घेर लिया। उत्तेजित युवकों को देखकर दरोगा सहम-सा गया।
चन्दन सिंह, अंजोर सिंह सिदार का बेटा गबरू जवान, आवाज़ को
दबाकर बोला- क्यों साहब, कागज में क्या लिखा है, हम बयान पढ़ना
चाहते हैं। दरोगा धूर्त और चालाक तो था ही अनुभवी भी कम नहीं
था। उसने नरम स्वर में कहा- सरकारी कागजात है भाई, इसे आप लोग
देखकर क्या करोगे
?
साहब रिपोर्ट हमने की थी, तो कागज तो हम देखेंगे ही कहता हुआ,
चंदनसिंह मुंशी के हाथ से कागज को झपट लिया। कोरा कागज में
दस्तखत और अंगूठे का निशान देखकर चंदन सिंह आग-बबूला हो गया,
उसे फाड़ता हुआ एक झन्नाटेदार झापड़ मुन्शी के गाल में जड़
दिया। दरोगा जी बताइये क्या चाहते हैं आप
? अरे भाई कागज-वागज में क्या रक्खा है । मैं तो सेठ को समझाने ही आया
था।
तो भेंट हुई
?
हाँ…
।
आपको क्या बोला
?
मैंने कहा देख सेठ मामला संगीन है। अनाथ बच्चे हैं, उनकी
ज़िंदगी तो बरबाद हो गयी है, अच्छा है एक-एक लाख रूपये देकर
मना ले ।
सेठ ने क्या कहा
?
सेठ ने कहा- इन भेंड़-गंवारों को एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा
।
आगे दरोगा ने क्या बताया चेलिकों ने नहीं सुना। वे बाजार की ओर
दौड़े। भगदड़ मच गयी- तेल और मिट्टी तेल झपट लिए गये....मिनटों
में आग की लपटें आकाश को छूने लगी।
डॉ. बलदेव
स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,
छत्तीसगढ़
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