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डॉ. बलदेव की ग्यारह
कहानियाँ
नया आश्रम
मुड़कर
पीछ देखता हूँ, लगता है किसी की छाया मेरा पीछा कर रही है
लगातार, बार-बार पीछे की ओर देखने से मेरी हैरानी जेनी समझ
जाती है, वह पूछ बैठती है, क्या बात है जी
?
“कुछ
नहीं”
जेनी यूं ही । वह मुस्कुरा देती है पर्स से चाकलेट निकाल अपने
उजले दाँतों के बीच रखकर दूसरा मेरे मुँह में रख देती है। जेनी
साधारण बातों को लेकर भी देर तक तर्क करती है, लेकिन वह आदत के
विरूद्ध इस समय चुप है।
अप्रेल की तेज धूप पाँच बजते-बजते नर्म
पड़ने लगी है। गुलमोहर की छाँव में कैद हो गयी हवा मुक्त होकर
बहने लगी है। लोग काम से लौट रहे हैं। ट्रेफ़िक में भीड़ है।
भीड़ अनेक सड़कों को क्रास करती हुई लिंक रोड पर दूर तक पसर
गयी है। भीड़-भीड़ है । भीड़ को चीरकर निकल जाना हिम्मत की बात
है। भीड़ हमारी खुली वासनाओं पर पर्दा है। जेनी मुझसे सटी-सटी
जा रही है। घक्कम-धक्कम में हम दोनों घसीटे जा रहे हैं, जेनी
को इसमें आनंद है। वह खुली हुई बाहों को मेरी बाहों के पीछे ले
जाती है। एक नुकीला उभार मेरी कोहनी को बार-बार छू रहा है। मैं
उसकी नम अंगुलियाँ दबा लेता हूँ । बहुत मुलायम है फूल सी
नम....वह कसमसा जाती है।
मैं फिर मुड़कर देखता हूँ- अब की बार
उसकी जंजीर का लॉकेट सीधे मेरे सीने पर उलझ गया है। यौवन का
गदराया उभार मेरी आँखों के नीचे है। लेकिन मेरी दृष्टि उस पर
ठीक से गड़ नहीं पाती और न जेनी को रोमांच का अनुभव करने का
अवसर ही दे पाती । जेनी मेरी हैरानी समझकर हँस देती है और गले
में नंगी बाहें डाल देती है। मैं इन्कार नहीं कर सकता । मेरी
निगाहें इस समय तेज़ है। हर चलने वाला आदमी मुझे मेरा सूदखोर
नज़र आता है। मैं भीड़ में छिपना चाहता हूँ ....भीड़ में धसना
चाहता हूँ । मेरे बौनेपन को क्या जेनी नहीं समझती होगी
?
वह मैरून कलर की कार है। मैं उसे उसकी
हार्न से पहचानता हूँ । यह फर्म के सेठ वाकमल की है। मैं
फूट-पाथ में आ जाता हूँ, मगर जेनी फिर सड़क के बीच मुझे खींच
ले गयी है...बड़ी हिम्मती है। इसे मेरा जैसा डर नहीं है, जैसे
गाड़ी में दब जाने की ही इसकी नियति है। हमसे सटकर वह कार आगे
निकल गयी है। पसीने में मेरा अन्दर बाहर भीग गया है। वह पूछती
है- प्रकाश
?
हाँ,
“बड़े
खोये-खोये नज़र आ रहे हो
?
मैं परेशानी में छोटा-सा उत्तर देता हूँ
“नहीं
तो”
। दरअसल काम से कंधा दुख रहा है। वह फिर चुप हो जाती है।
भीड़ हमें घसीटकर बहुत दूर ले आयी है,
हम इस भीड़ से किनारे लग जाते हैं। झील के इस पार पार्क में हम
हैं और हमारे साथ है बासन्ती प्यास, हम उस सुरमई साँझ की तलाश
में हैं जो एक क्षण हमारा अपना निजी हो, बिल्कुल एकान्त और
आत्मीय, मेरा इतना सोचना था कि छतरी के नीचे बैठा हुआ कोई आदमी
फेन्टा की अधूरी वाटल फेंक, पलटकर चहक उठता है-
“हलो
जेनी हाउ”,
“हाउ”
वह बिजली-सी पलटती है और दौड़ कर वाहें फैला देती है। भारी
भरकम अधेड़ उम्र का आदमी उसे पूरी तरह बाँहों में भर लेता है।
उसकी गोरी बाहों में जेनी नीले गुलाब-सी खिल उठती है मैं अकचका
जाता हूँ । यहाँ ज़्यादा भीड़ नहीं । एक ओर दूर तक जा कर
पहाडो़ में खो जाने वाली सड़क, सड़क के किनारे वाले युकिलिप्टस
की कतारें, दूसरी ओर गहरी हरीतिमा और रंग बिरंगे फूलों वाला यह
पार्क । पार्क के पीछे झील और झील के उस पार हर कहीं हरित
वन-प्रदेश औ झाऊ वनों से झरता हुआ मीठा संगीत।
वह अधेड़ उम्र का व्यक्ति जेनी के गालों
को, अंग-प्रंत्यगों को ताबड़ तोड़ चूम लेता है और अपनी विजय पर
मुझे घृणा की हँसी से घूरने लगता है। मुझे अंधेरा घिरता दिखाई
देता है। मैं उससे आँखे नहीं मिला पाता। मुझे अपनी कमज़ोरी
आफिस के बाहर भी महसूस होने लगती है। मैं विकल हो उठा हूँ अपनी
असहाय अवस्था पर। जेनी मेरी स्थिति समझ मुझे उबार लेना चाहती
है। वह उससे छुटकर मेरा इन्ट्रोडक्शन कराना चाहती है कि मेरा
परिचय वह स्वयं आगे बढ़कर देता है- आप हैं मिस्टर प्रकाश,
हमारे फर्म में अकाउन्ट सेक्शन सम्हालते हैं। मैं अवाक् रह
जाता हूँ । और जेनी प्लीज डोन्ट माइंड, कहती हुई सेठ साहब के
शहजादे के साथ आगे निकल जाती है। वे मोटरवोट में सवार हो गये
हैं। एक बार भक-भक कर इंजन स्टार्ट हो जाती है, झील के वक्ष को
चीरती हुई वोट किनारे लग जाती है। कुछ ही क्षणों में वे हरित
गुल्म लताओं के बीच खो जाते हैं। सूरज का आहत चेहरा झील की
लहरों पर खून उगलता हुआ एक ओर चला जाता है। आकाश के ऊपर झीने
नीले रंग का पर्दा लहराने लगता है। मैं अपनी कापुरुषता को फेंक
चुका हूँ और दूसरी बोट से वहीं पहुँच गया हूँ जहाँ खून के किसी
भी प्यासे को पहले ही पहुँच जाना चाहिए था। मैं आदिम रक्तचाप
से थरथरा रहा हूँ। सहसा मैं रूक गया हूँ । झील में वहीं छाया
तैरती हुई आ रही है जिसे पीछे में छोड़ आया था।
मेरी आँखे जलते हुए प्रश्नों से अब सीधा
साक्षात्कार करना चाहती हैं। वहीं आँखें जेनी को इस समय मौन
ढूँढ रही हैं।सोचता हूँ मुझे इस तरह चोरी-चोरी नहीं आना चाहिए
था। यह तो एक औरत की रूचि का प्रश्न है। उसकी स्वीकृति
अस्वीकृति उस पर ही निर्भर है। सहसा कोई आवाज़ इसी समय उठ खड़ी
हुई, ओह
“अब
छोड़ो तो, छोड़ो भी”
“जेनी
की कराह है। सोचता हूँ कैसे कैसे बेदर्दी लोग होते हैं। स्त्री
को भी अपनी हिम्मत की बात पहले सोचना चाहिए । अचानक ही मेरे
सामने खुले इलेक्ट्रिक वायर-सा वह कुत्सित दृश्य जल उठता है।
सेठ का बच्चा अंधेड़ उम्र का आदमी भाग रहा है। मेरी जलती आँखें
लगातार उसका पीछा कर रही हैं, लेकिन पाँव वहीं जमे हैं। जेनी
उठ खड़ी है। सिंहनी-सी उसकी दृष्टि। स्कर्ट फट गयी है। लाकेट
के नीचे उभरे भागों पर दांत और नाखूनों से निर्मित कल्पना में
उभर आने वाले चित्र मुझे आतंकित कर उठते हैं । जेनी मेरी ओर
हिंस्त्र जानवरों-सी आगे वढ़ रही है। उसकी मारक आँखें....ओफ्फ,
खूंखार हो उठी है। जम्फर खून से भीग गया है। लगता है अभी-अभी
किसी ने इस जगह छुरा भोंका है। एक गाल पर उसका भरपूर तमाचा उभर
जाता है। आँखे खुलने पर देखता हूँ जेनी वहाँ नहीं है। सिर्फ
कुचली हरी-भरी घास है। दूर-दूर घाटियों में किसी के सरपट
दौड़ने के पदचाप हैं।
मैं अपनी असफलता तथा घोर अपमान पर बुरी
तरह पिट गया हूँ। विकल मन तन्हाई में खो जाता है। मैं अपने ही
एकान्त में मौत ढूढ़ने लगता हूँ। वर्षों से जीवन के प्रति
व्याप्त अनास्था, घुटन, वितृष्णा, चारित्रिक विघटन, क्षोभ
संगठित हो गए हैं। एक दूसरे का गला दवाती हुई उनकी खौफ़नाक
आवाज़ें कारों के दरवाज़े से, आँखों की खिड़कियों से चिक उठा
उठाकर आ रही है। हर कहीं गुपचुप है। मेरी आँखों में रेशमी
डोरा झूल जाता है। टाई ढीला कर उसका एक छोर मुट्ठी में ले रहा
हूँ। मगर मेरा दूसरा मन इस तरह के विकर्म से डरता रहा है।
आँखों में अंधकार गहन होकर सिमट रहा है। सात की पैसेजर सीटी
देती हुई आ रही है। मेरा नन्हा प्रमोद हाथ हिलाता हुआ रो रहा
है। मैं आँखे मलता हूँ, नहीं, कुछ नहीं हुआ...मैं ईश्वर को
पुकार उठा हूँ। अशुभ विचार कैसे कौन कैसे विजन का निर्माण कर
लेते हैं। पर क्या ये विजन सच नहीं हो सकते । इसके आगे मैं कुछ
नहीं सोच पाता । टाई का छोर ढीला किए पेड़ से उतर आता हूँ और
लोटता हूँ । अब चांद निकल आया है। ....वृक्ष के नीचे कोई वस्तु
चमक जाती है। मैंने अपने से कहा अरे यह तो वही जगह है जहाँ अभी
तक पहले से था, क्रियाहीन वहीं खड़ा हूँ । कब से खड़ा हूँ ।
मैं भभकती हुई चट्टान पर बैठ जाता हूँ चांद अब विलकुल अलग लग
रहा हैं। उजाला हर कहीं बिछा जा रहा है। घड़ी के कोण को आँख और
चांद के बीच स्थिर करता हूँ । एक आकार ग्रहण करता है, काँच में
कैमरे के लैंस जैसा आकार जेनी का है....वह मुस्करा रही है। हम
दोनों गलबहियाँ दिए झरनों में उतर रहे हैं। फुहारों में भीग
रहे हैं। हरी घाटियों में मृगछोने-सा छलागें भर रहे हैं। अब
वहीं पुरानी जगह शिरीष वृक्ष के नीचे बैठे हैं । शिरीष के
लम्बे-लम्बे गुच्छ के गुच्छ दूधिया फूल कंधे पर झुक आए हैं।
जेनी की वही मुस्कान । दूसरा व्यक्ति भारी भरकम शरीर का अधेड़
उम्र का और मैं काँच को फेंक देता हूँ। चट्टान पर वह तड़क उठती
है।
मुझे लग रहा है मैंने अपने इस शरीर को
इस भभकती चट्टान पर कपड़ा-सा उतार दिया है। मन प्राण जैसे
चाँदनी में घुल रहे हैं। मैं ऊँचे पर्वत, गहरी घाटियाँ पारकर
रहा हूँ, झील की लहरों में डूबता-उतराता हूँ। मुक्त पवन में
रंगे पँख खोले हौले-हौले उड़ रहा हूँ । मैं वहीं पहुँच गया हूँ
। कितना चमक रहा था। ओह कितना कुरुप है इसका असली चेहरा। इसकी
छाती पर ज्वालामुखी का मुहाना है। जैसे मेरी छाती पर रिसता हआ
घाव। चन्द्रमा की इन्द्रजालिक दुनिया से लौट आया हूँ। अब मैं
यहाँ वियावान में भटक सकता हूँ, लेकिन अब मुझे आफिस से सीधे
घर जाना चाहिए था। यह महसूस करता हुआ दूर छोड़े हुए कपड़ों से
लिपट अपने शरीर को देख रहा हूँ।
डॉ. बलदेव
स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,
छत्तीसगढ़
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