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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कहानी ।।

 

               डॉ. बलदेव की ग्यारह कहानियाँ

 

भैंस

राम जी का परम हितैषी गोवर्धन । जनखा स्वभाव । इस घर से उस घर ठलहा बैठना उसका काम। भूरी भैंस की तारीफ़ करता वह कभी नहीं अघाता । दोनों हाथ हिला हिलाकर कहता- गाँव में एक से बढ़कर एक भैंस हैं। लेकिन राम जी के भैस की धोवन । छोटे छोटे कमान जैसे सींग, खड़े कान, चौड़ा माथा, कुंदे कटोरा सी आँखें उठे हुए, पखउरा बड़े बड़े कूला, पसर भर पहिरन लम्बी पूँछ में उज्जर चंवर। झउहा जैसै काचर मूठे में न आने वाली (थन), टेंटी-चिकून पीठ, मक्खी फिसल जायेगी खुर के ऊपर सुपैदी।

 

उसे देखकर ईर्ष्यालुओं की छाती में साँप लोटते थे। अपनी भैंस की तारीफ़ सुनते राम जी की छाती गज भर हो आती और गँवहिन का मन हुमस-हुमस जाता। मारवाड़ी की लार टपकने लगती । सेठाणी दरवाज़े की ओर से पूछती- के भैसगो बच्चों सो के। सेठ तौल में काँटा मारता जवाब देते-न हमने पूछ ली से।

 

भूरी भैस राम जी की गिरस्ती का एक मात्र सहारा । गँवहिन के समायके का आखिरी चिन्ह  । प्राणों का आधार । न उसके बिना भूरी भैंस रह सकती और न वह भूरी भैंस के बिना। भूरी की सेवा में गँवहिन को अखंड सुख और संतोष मिलता । राम जी भरे-पूरे परिवार मे पैदा हुआ था। लेकिन समय का फेर। कभी वह दुखी होता, तो गोवर्धन उसे समझाता- भाई बड़े परिवार में जन्म लेना पुरखों का भाग है, लेकिन बड़प्पन निभाते रहना बड़ा कठिन होता है। यह भाईयों के बँटवारे में राम जी को पाँच एकड़ ज़मीन मिली थी । पाँच एकड़ होना याने गाँव में बड़ों में गिनती होना । उसके बाड़े में साहब सिपाही रुकते मालपुवा छनते, पहुने भी बहुत आते, सबका आदर सत्कार होता।

 

सभी भाई जी तोड़ कमाते थे। उनका बड़ा ठाठ था। उनमें ऐसी एका थी कि किसी की मज़ाल नहीं उस परिवार की ओर आँख उठाकर देख ले। लेकिन परिवार में एक न एक नालायक निकलता ही है। अलग होते ही सभी की पोल खुलने लगी। राम जी सबसे छोटा था। सबका दुलरूवा था। जिम्मेदारी से भी दूर रहता था। अलग होते ही वह और स्वतंत्र हो गया। गाँव में नाचा कौन कराएगा ? राम जोड़ रामायण मण्डली का मैनेजर कौन ? राम जी गाँव में जितने बेकार काम सब राम जी के जिम्में।

 

 कभी पनिया कभी सूखे अकाल से गाँव उजड़ने सा लगा। राम जी का परिवार भी बढ़ता गया। धीरे-धीरे वह कर्ज़ से लदता गया। भाई-भतीजों के पास उसने थोड़े-थोड़े करके ज़मीन बेंच दी तब भी राम जी को न गम न फिक्र । उसकी आदत में कोई अन्तर नहीं।

 

अब घर में चार वर्तन । एकड़ भर खेत और भूरी भैंस । भूरी भैंस न होती तो ? कभी-कभी राम जी सोचता । कचोट होती । इसके बाद भी वह आलसी और शौंकीन होता गया। कभी घर में कुछ काम करता । कभी नहीं करता । उसकी मर्जी । यह सब देखते हुए गँवहिन चुप रहती। एक भी शब्द नहीं बोलती । रात दिन वह जाँगर पिटती, कूटती-पीसती और सबका जैसे-तैसे पेट भरती । वह घास काटती, भैंस को धोती। दूध तक दुहती।

 

शाम-सुबह मिलाकर भूरी पाँच सेर दूध देती । गँवहिन सुबह का दूध बेचकर नमक मिर्च तेल लाती। गिरस्ती चलाती। शाम का दूध, अधभूखे तरूपरिया बच्चों को पिलाती, दूध जमाती और मही बाँटती । गँवहिन के तरुपरिया पाँच बच्चे । भगवान के दिए......बाबू-बेटी की जगह भूरी भैंस। गँवहिन के सुख का क्या कहना। गरीबी में भी सुख का अनुभव । जेठानियाँ देख-देख कूढ़ती और ताना मारती थी। गँवहिन भी दो टूक सुनाकर सबको चुप करा देती। वह गर्वीली भी कम न थी। भूख मर जाती लेकिन दूसरों के सामने हाथ कभी नहीं पसारती थी। मेहनती इतनी कि बच्चों को कभी भूखे सोने न दे।

 

सबसे छोटा, दूध जैसे उज्जर। चौड़ा माथा। बड़ी-बड़ी आँखे, कान बड़े-बड़े गोल-मटोल, जोंधरी जैसे दाँत। बासी-पेज जैसे वह दूध भात मचक-मचक कर खाता । आधा कौर मुँह भीतर आधा बाहर । उसे देख गँवहिन की छाती फूल उठती। दूसरे बच्चे खाते-खाते यदि झगरा होते या झूठे से मारपीट होते तो बच्चों को वह अंधा-धुंध कूट देती। जितना दुलार उतनी मार।

 

भूरी बरीक-वयानू । साल भर में बच्चा दे देती थी। तब भी माह भर उसे बिना दूहे छोड़ दिया जाता था। तब कभी-कभी चूल्हा उपास की नौबत आ जाती। ऐसे कठिन समय में बटकी, लोटा बर्तन-भाँडे पड़ोस के परिवार में बेच दिये जाते थे। एकदम सस्ते में । राम जी का तर्क था। घर की चीज़ घर में रहे। इससे इज्जत भी बनी रहेगी। लेकिन इससे गँवहिन को बड़ा कष्ट होता था, वह बड़बड़ाती तो राम जी उसे कूटने लगता। इन्हीं बातों को लेकर एक दिन गँवहिन बच्चों को लेकर मायके चली गयी। अब राम जी को बड़ा सुभीता हुआ। बैठे ठलुवे उसके यहाँ डेरा डालने लगे। गाँजा, माखुर .....और कभी-कभी दारू का दौर शूरू हुआ। इसी बीच एक दिन तहसीलदार फौज फटाका सहित गाँव में में आ धमका । किसी के नाम दो साल का किसी के नाम तीन साल का लगान नहीं पटा था। राम जी जैसे लोगों के पास पाँच-पाँच साल के लगान बाकी थे। तकाबी अलग। राम जी अकाल के बहाने बच जाता था। लेकिन अबके साहब बडे कड़े मिजाज़ के हैं। तकावी और लगान मिला करके राम जी के नाम साढ़े सात सौ निकल रहे थे।

 

गाँव के सरपंच दलाल नम्बर एक और पटवारी कूटना नम्बर दो था। वे दोनों साहब के टेबल पर पाँच-पाँच दस-दस, डिफाल्टरों को पकड़ कर लाने लगे। राम जी को सामने हाथ जोड़े देखा। साहब गरजे- क्यों अभी तक क्यों नहीं आया था। क्या हम तेरे बाप के नौकर हैं, जो रूके रहेंगे। तुम्हें चौबीस घंटे का मुहलत देते हैं, प्रबन्ध कर लो नहीं तो कुड़की हो जाएगी। राम जी गिड़गिड़ाया । पर कौन सुनता, इधर उधर दौड़ा। भाइयों के पास हाथ पसारा। उनका भी हाथ खाली था। अब लक्ष्मीनारायण के सिवाय और कोई दिखाई नहीं दिया। गाँव भर गहने, बर्तन भाँडे सभी उसके यहाँ गिरवी रखते हैं। राम जी को अपनी ओर आते देखा तो रंगे स्यार के अन्दाज में बोला- आओ, आओ राम जी, इधर कहाँ भटक गए ?

 

आपके पास ही आया हूँ सेठ जी। पहले राम जी के परिवार की खूब इज्जत करते थे। आज जो कुछ है इसी परिवार की बदौलत हैं, वह अपरिचित सा बोला। गिरवी के लिए कुछ बचा है राम जी। सब तो उसी के यहाँ रख दी गयी है। राम जी क्या जवाब देता । उधर से गोवर्धन को आते देखा तो उसकी धुकधुकी बढ़ गयी। गोवर्धन ताड़ गया था। वह भी सेठ से बिनती कर देखा, पर वह पसीजा नहीं। इतने में ही दरवाज़ा के ओट से सेठाइन की मोटी सी आवाज़ आई-तैं घारे भैंसण क्यों न बेच्चे से।

 

चौबीस घंटे बीत गए। राम जी मचकुरी से गोहराने लगा। उसने आँख दिखाकर एक धुड़की दी और मूर्गा काटने लगा। उधर टहलू ने बोली की हाँक लगाई- राम जी वल्द नन्दलाल, रकबा नम्बर......राम जी दौड़कर टहलू के पाँव में गिर गया। घंटे भर का मोहलत दे दे, रूपिया पहुँचा रहा हूँ। हाँक बंद कर दे। टहलू और मुस्तैदी दिखाने लगा मुँह फाड़कर और जोर से हाँक लगाने लगा । पाँच रूपये का नोट देख आखिर चुप हुआ। वह भी गोवर्धन के चिचौरी करने पर । आखिर भैंस के पाँच सौ तीस रूपये तय हुए। बिक्रीनामा में दस्तखत करते समय राम जी का कलेजा फटने-सा लगा। उसे चक्कर-सा आने लगा। बड़े घर की इज्जत का सवाल था । ले देकर सरकारी संकट टला ।

 

जिस समय भैंस की रस्सी खोली गई राम जी बुक्का फाड़कर रोने लगा । उसके सामने बच्चों का मासूम चेहरा झूल गया। आज से वे अनाथ हो गए। भैंस एक बार राम जी की ओर कातर दृष्टि से देखने लगी, फिर हुकारने सी लगी, मानों गँवहिन को पुकार रही हो। इसी में नौकर का पैर खुंदा गया। उसने गुस्से में आकर दो बेंत जड़ दी । लकीर-सी खिंच गई पीठ में ।

 

पशु-पक्षी आदमी से ज़्यादा समझदार होते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो आज भूरी तहलका मचा देती। उसे पकड़ने छेंकने वाला गँवहिन के सिवाय और कोई नहीं था। मार खाकर भूरी ने एक बार फिर राम जी की ओर देखा ।...........आँसुओं से भीगी चार आँखें मिली। मूक जानवर ने राम जी का हृदय एक ही क्षण में पढ़ लिया । चुपचाप बिना खींचतान के वह नौकर के पीछे पीछे चल पड़ी।

 

राम जी की-भैंस बिकने की खबर बिजली जैसे गाँव भर फैल गयी। गँवहिन का मायके पड़ोसी गाँव में था। ख़बर मिलने पर पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ, फिर कोई अनजान शंका से उसका हृदय घिर गया, जी हुमकने लगा । बच्चों को छोड़ अकेली वह बाघिन सी छुटी।

 

कार्तिक का महीना। झुलसती दोपहरी राम जी जनम का भूखमर्रा पहली बार वह भूख को भूल गया था। क्या-क्या तो वह सोचने लगा। कभी छत को देखे, कभी दीवार को, कभी फर्श को । गोवर्धन के बहुत कहने पर उसने भाँडें में बासी निकाली । अभी पहला कौंर मुँह में जा नहीं पाया था कि गँवहिन आँगन में आ धमकी । वह फन बाढ़े नागिन-सा दिख रही थी। घरवाली का चेहरा चण्डी-सा देखकर राम जी अबक हो गया। कौर नीचे छूट गया। गँवहिन गरजने लगी भूरी कहाँ हे ? राम जी सन्न, नागिन अब फुँफकारने लगी। मैं पूछ रही हूँ भूरी कहाँ हे राम जी क्या जवाब दे। अब तूफान उठ खड़ा हुआ । गँवहिन बासी का हंडिया उठाकर पटक दी। चिमटा उठाई राम जी के उपर फेंक मारी। राम जी दौड़कर टुकने में सिर घुपाने लगा। गँवहिन गुस्से में पागल थी अब आयं बायं बकती हुई जो भी हाथ में आया उसी को राम जी के ऊपर फेंकने लगी। देखते देखते लोटा, गिलास, थाली, करछुल, कंड़ाई सब आँगन में उछलने लगे । बेचारा रामजी अपनी रक्षा में बन्दर जैसा कूद-फांद करने लगा। और टोकनी से.........हथियारों की मार को रोकने लगा। अब घर के भीतर कुछ भी न बचा तो आँगन के कोने में पड़े सील को उठाकर पटक दी। राम जी मुश्किल से बचा। गँवहिन भी हाँफ रही थी, अब वह कमर में हाथ धरे समूचे घर की ओर देखने लगी । उसका बस चले तो घर उठाकर राम जी के सिर पर मार दे। विवश हो फफक-फफक कर रोने लगी और धड़ाम से आँगन में ही गिर पड़ी ।

 

उधर संकल तोड़कर आई भूरी दरवाजे पर खड़ी-खड़ी यह तमाशा बड़े मजे से देख रही थी।

 

डॉ. बलदेव

स्टेडियम के पीछे, रायगढ़

छत्तीसगढ़

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