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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। कहानी ।।

 

               डॉ. बलदेव की ग्यारह कहानियाँ

 

रेड़

क्षा आठ के बाद गनेसी आगे नहीं पढ़ सका। माँ बाप गरीब थे। वे एक किसान से यहाँ काम करते थे। किसान के तीन बच्चे पढ़ते थे। गनेसी भी उनके साथ शाला जाकर पढ़ता था । देखरेख की देखरेख । पढ़ाई की पढ़ाई । परीक्षा का परिणाम निकला - किसान के लड़के फेल। गनेसी अव्वल दर्जे में पास । अब गनेसी किसके बलबूते शहर जाकर पढ़े। 

 

गनेशी अब भेड़-बकरी चराता है। गाँव के सामने हरे-भरे खेत । पीछे छोटी-सी पहाड़ी। उसकी ढ़लान पर सघन हरियाली। वहाँ भेंड़-बकरी बड़े मज़े से चरते हैं । ढलान के बाद जंगल शुरू हो जाता है। गाँव के कई बच्चे पहाड़ पर चढ़ते हैं। गनेसी उन्हें समय-समय पर पढ़ाता है। इसके लिए साक्षरता मिशन उसे हर महीने कुछ पारिश्रमिक भी देता है। वह मैट्रिक की तैयारी भी कर रहा है। 

 

पहाड़ी की ढलान से लगे जंगल में हिंसक जानवर कभी-कभी दिखते थे। इसलिए ज़्यादा भय नहीं था। लेकिन एक दिन एक लकड़बघ्घा चोर-सा आया और एक बकरी उठा ले गया। तब से गनेसी सचेत रहता था। आज उसके हाथ में फिर किताब है । पेड़ के सहारे खड़े-खड़े वह किताब पढ़ रहा था। इतने में ही सन-सन खर-खर की आवाज़ होने लगी। उसकी नज़र रेड़ की ओर गयी। उसने देखा भेड़ एक दूसरे से सटकर चक्राकार घूम रहे हैं। माएँ मेमनों को सींग से हरकतें केन्द्र की ओर ठेल रही थी। बकरियाँ अलग-थलग खड़ी मूक भाव से भेड़िए की ओर देख रही थी। भेड़िया कुछ ही दूरी पर था । गनेशी ने देखा  उसकी जीभ लपलपा रही है। अगिन सा लार टपक रहा। डर में किताब उसके हाथ से छूट गयी। भय में वह चिल्ला भी नहीं सकता था। एक बार भेड़िया रेड़ के नज़दीक आया भी तब तक रेड़ बिजली की गति पकड़ चुका था। उस समय रेड़ तेज धार विशालकाय चक्र जैसा दिखाई देता था। भेड़िए की दाल नहीं गली। अचानक ही वह अलग खड़े वकरे पर झपटा और खींचकर जंगल में गायब हो गया। भेड़िया जब ओझल हो गया तब गनेसी चीखने-चिल्लाने लगा। भेड़िया आया, भेड़िया आया। गाँव वाले दौड़े पर वहाँ कोई भेड़िया नहीं था। अब रेड़ एक दूसरे को चूमने-चाटने लगे थे। उनके चेहरे पर विजय का भाव स्पष्ट था । गनेसी अब पशु-पक्षियों से भी शिक्षा लेने लगा है।

डॉ. बलदेव

स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,

छत्तीसगढ़

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