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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कहानी ।।

 

               डॉ. बलदेव की ग्यारह कहानियाँ

 

बलवा

ल शाम खड़कसिंह गाड़ी से उतरे। वहीं रूके नहीं । सीधे घर पहुँचे। गंगाराम अम्मा सहित घर पर नहीं था। खंड़कसिंह को सामने देख चाची दरवाजे के पीछे छिप गयी। जब घर से बाहर कोई नहीं निकला तब खड़कसिंह खाँसने-खखारने लगे। चाची ने देखा एक बज रहे हैं। कामकाज में वह दक्ष तो थी ही, समझदार भी कम न थी। डेकची में चाय चढ़ाती हुई बोली सुबह ही पुलिस अम्मा और आपके भाई को थाने ले गयी है। बाहर खड़े मत रहिए। जल्दी भीतर आ जाइए। चाची झटपट एक कप चाय खाट पर बैठे जेठ की ओर सरका दी। इतने में ही धनसिंह, दलवीरसिंह, धरमलाल और ननकू सिंह हथियारों से लेश भीतर दाखिल हुए । डेकची छोड़ा और पानी डालकर चाची टूटे-फूटे कप में चाय ढालने लगी।  

 

ननकूसिंह आगे बढ़कर सभी को चाय देकर खुद पीने लगा। कंपाने वाली ठंड थी। चाय से कंठ गरम हुआ, अब रणनीति पर विस्तार से चर्चा शुरू हुई। खड़कसिंह ने कहा पुलिस पीछे लगी हुई है। ......शंकर फरार है। सुना है विपक्ष उसे अपनी टिकट पर चुनाव लड़वायेगा, इसलिए उसका हौसला पहले से ज़्यादा बुलंद है। पुलिस असली अपराधी को जानकर भी निरपराध लोगों पर जुल्म कर रही है। भाई गंगाराम और अम्मा भी नहीं लौटे हैं। डर है पुलिस उन्हें भी गिरफ्तार न कर चुकी हो। परन्तु इससे जान की सुरक्षा है। धरमलाल ने कहा अब और गिरप्तारी नहीं होने देंगे । हमारा कोई वकील लगने को भी तो तैयार नहीं है, क्या करे क्या न करें। समझ में नहीं आता। पुलिस हमारी भाषा नहीं समझती । शासन के समक्ष हम अपना पक्ष कैसे रखें, उपाय सोचा जाये । धनसिंह उत्तेजित हो रहा था। हाथ मलता हुआ भीष्म प्रतिज्ञा सा कर बैठा- मैं शंकर का सिर काटे बगैर चैन से नहीं मर पाऊँगा। ननकूसिंह ने तपाक से कहा, ताकि उसका सारा जुल्म पुलिस हम लोगों के सिर पर मढ़ सके। और बचे-खुचे लोग भी हवालात में सड़ते रहें। खड़कसिंह इशारे से सबको शान्त करते हुए गंभीर स्वर में बोले- मात्र एक शंकर के मरने से समस्या का हल नहीं होगा। यहाँ कई शंकर पैदा होते रहेंगे। हमें कानून को हाथ में नहीं लेना चाहिए। अन्यथा जनता का विश्वास हमारे ऊपर से उठ जायेगा । लोग हम पर ही शक करेंगे जैसा कि पुलिस कर रही है। हमारी निःस्वार्थ सेवा, स्वयं का अनुशासन अकारज हो जायेगा। अच्छा हो हम इसी सत्र में शासन के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए ज्ञापन दें। हो सकता है इससे हमारे कुछ निरपराध साथी बेदाग छूट जाएँ, वैसे आसन्न संकट से निपटने के मैंने कुछ उपाय कर लिये हैं। 

 

रणनीति तय हो रही थी बीच में गंगासिंह भाई सहित हाँफते-हाँफते दरवाजे को पीटते हुए चीखने लगा। चाची ने लपककर दरवाजा खोल दिया और वह एक भारी-भरकम लट्ठा लेकर दरवाजे पर डँट गयी। उसके मुँह से इतना ही निकल पाया दादा शंकर नंगी तलवार लिए साथियों सहित इधर ही आ रहा है और धम्म से फर्श पर गिर पड़े । इतने में ही जोरों का धमाका हुआ, सब चौकन्ने हो गए। खड़कसिंह के होंठों पर हल्की सी मुस्कान खेल गयी उसकी आँखे चमक-चमक सी गयीं। किए गये प्रण और दिए गये समय के अनुसार शंकर दलबल सहित गंगासिंह को गाली गलौज करता आँगन तक जा धमका। आज वह गंगासिंह का गला काटकर चाची को उठा ले जाएगा । बाहर से आया सशस्त्र पुलिस दल उसी के इंतजार में अन्धेरे में छिपा था। गंगासिंह को ललकारता शंकर दरवाजे के सामने पहुँचा, रणचण्डी चाची उस पर टूट पड़ी लट्ठ के प्रहार से कोई भी गुण्डा अन्दर नहीं घुस पाया। पीछे से पुलिस ने उन लोगों को धर दबोचा।  छोटा सा युद्ध सा छिड़ गया। 

 

दूसरे दिन सुबह अखबारों में बड़े-बड़े शब्दों में लिखा था - शहर के आतंक का  पर्याय शंकर । उसके तीन साथी पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए उसके सिर पर एक लाख इनाम घोषित था। 

 

बेर चढ़ते तक चाची की लाश दरवाज़े पर तफ़्तीश के लिए पड़ी रही, अखबार में उसकी कुर्बानी का कोई उल्लेख नहीं था।

डॉ. बलदेव

स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,

छत्तीसगढ़

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