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डॉ. बलदेव की ग्यारह
कहानियाँ
गाँव
गाँव
को छोड़े हुए वर्षों हो गए हैं। उस दिन वह अकस्मात नहीं मिला
होता तो किशोरावस्था की सच्ची घटना जो स्मृति के अंधकार में एक
परमाणु-सी खो गई थी- वह सहज यों ही सूरज की पहली किरण से दमकती
ओसविन्दु सी कौंध-कौंध नहीं उठती, अपने से बाहर प्रतिकिरणों को
फेंकती हुई। और तब इस मधुर स्मृति के बीचोंबीच शायद ही
स्लोपायजन-सा असर करती हुई एक नितांत बाहियात किस्म की नई
संस्कृति के अस्तित्व का पता नहीं चलता, जिसके रंग में
उच्चवर्गीय समाज तो आकंठ डूबा ही है, साथ ही जिसके बदरंग कीचड़
में निम्न मध्यवर्ग भी धंसता जा रहा है। इस स्पंजनुमा सभ्यता
के कीटाणुओं को तब खुर्दबीन में भी देख पाना असम्भव होता।
लेकिन इस स्मृति खंड ने मुझे इस तड़क-भड़क दुनिया के खोखले
प्रवेश में जैसे ढकेल दिया है।
मेरे बालसखा नोखेराम को फुलुवा की सम्पत्ति चाहिए थी वह मिली
पर जैसे आई थी वैसे ही बीमारी, शराब, जुआ, सट्टा और रंडीबाजी
में चली गई; किन्तु फुलुवा की सम्पत्ति तो कुछ और ही है और वह
अभी तक सुरक्षित है। स्त्रोतवाले कुएं का जल जितना ही खींचोगे
उतना ही निथरेगा, आपकी प्यास बुझने के बजाय भले ही बढ़ जाय-
चाहे दूर से ही आप उसकी शीतलता महसूसते रहिए या उस पर कंकड़
फेंकते रहिये....उसे गंदलाने का प्रयास कीजिए पर ज़ल तो जल है,
निर्मल और पवित्र......उसकी निर्मलता या पवित्रता पर विश्वास
आप कीजिए या न कीजिए वह आपके उसुल की बात है। हाँ उसकी रक्षा
के लिए जगत की आवश्यकता स्वयंसिद्ध है। नौजवान वेवा फुलुवा को
पतिरुपी कवच चाहिए था- वह जैसा चाहती थी वैसा ही
मिला.....मेड़ुवा। माता की किशोरवस्था में जन्म लेने वाले
पुत्ररत्न । कुल को चाहिए स्वतंत्रता..आज़ादी और वह उसे
“स्वतंत्रता” जैसी आधी अधूरी नहीं, प्रत्युत पूरी मिली।
वास्तव में उनका वह छोटा-सा मकान एक तरह से उन तीनों का
रैन-बसेरा है, कौन क्या खाता है, कहाँ जाता है, कितना कमाता
है, कैसे उड़ाता है और कब वापस आता है इत्यादि या इसी प्रकार
के अन्य प्रश्नों से किसी को किसी प्रकार का सरोकार नहीं हैं,
और न ही किसी के काम में टीका-टिप्पणी करने या बाधा पहुँचाने
का उपक्रम ......हाँ उन्हें अपने तीनों के एक साथ होने साथ
सुड़कते हैं। यह व्यवस्था फुलुआ की ओर से ही होती है। इसे वह
पति और पुत्र के प्रति अपना
‘पुनीत कर्त्तव्य’
समझती है। इसके साथ ही वे एक दूसरे की लम्बी चौड़ी दुनिया से
बेखबर होते हैं...यदि किसी को कुछ कहना भी है तो इसी
वक्त.....वह भी अति आवश्यक हुआ तो...अनावश्यक बातों में उलझकर
वे इस समय चाय का लुत्फ़ ख़राब नहीं करना चाहते और न ही उनके
पास इतना वक्त होता है। वे न तो भविष्य की कोई योजना बनाते, न
वर्तमान को सोचते और न ही भूत का अवलोकन करते ।
‘काल
सापेक्षता’ के लिए उसकी भाषा में कोई शब्दार्थ
निश्चिय नहीं हो सका है। वे जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह
उनकी नितांत निजी होती हुई भी निजी नहीं हैं वरन इस महानगर की
तंग गलियाँ है....जिस भाषा की चीख कभी कभी मीलों फैले
झुग्गियों के चिथड़े-चिथड़े तक खरोंच कर विखेर देती है- शहर
की गन्दी नालियों में इतनी भयानक बाढ़ आ सकती है इस पर आपने
कभी सोचा है जनाव
?
वाकई इन बातों की जानकारी मुझे बाद में तब हुई जब नोखेराम के
जबर्दस्त आग्रह पर, मैं साइकिल की घन्टी बिना बजाये, पोजिशन की
परबाह किए बगैर उसी तंग गली के एक छोटे से मकान के सामने खड़ा
हो गया था, झुग्गियों के बीच मकान वह अकेला ही था...तब क्या
सोचकर गया था कि नोखे बालसखा है या उन तीनों को एक साथ देख
लेने की ललक
? या अतीत में एक छलांग मारने का साहस
? कुछ नहीं कह सकता.....मन में कहीं चोर
दुबका भी था। वक्त ने साथ दिया.....
दो मिनट की देरी होती तो फुलुवा नहीं मिल पाती । वह बाहर से
संकल चढ़ा रही थी....अकस्मात् खाकी वर्दीं में
अप्रत्याशित....अज़नबी को देखकर उसकी साँस ऊपर की ऊपर और नीचे
की नीचे रह गई। वह बुरी तरह से घबरा गई थी । कहीं कुछ न कुछ
गड़बड़ा गया है- उसकी आशंका या तो पुत्ररत्न कुलपत को लेकर हो
सकती थी या कि सेठजी को लेकर....क्षणभर में उसके माथे पर उगते
पसीने से मैं समझ गया कि कुछ न कुछ दाल में काला अवश्य हैं।
उसे इस हालत में और ज़्यादा देर रखना उचित नहीं था मैंने पूछा-
पहचाना ?
अब वह भय मिश्रित आश्चर्य से मेरे चेहरे को भूले हुए पाठ जैसा
पढ़ने लगी। मैंने सिर से टोप उतार दिया- पर अब भी वह पहचानने
में विकल मति हो रही थी। एक हल्की-सी मुस्कान उसके होंठ के
कोने में खिल गयी और वह कूक उठी- रम्मू
! मैने कहा हाँ । हट दोगले कहीं के, मैं तो डर के मारे मर गयी थी। राम
रे !
तुम तो पहलवान हो गये- और क्या जानती कि तुम दरोगा बाबू हो गये
हो दरोगा। शब्द के उच्चारण में एक कम्पन थी- परेशानी भी। मैंने
पूछा- नोखे और कुलपत अभी तक सो रहे हैं क्या
? अरे तड़के ही लालचाय पीकर अपने-अपने अड्डे
में चले गए हैं और इतना कहकर वह धकेलती हुई मुझे अन्दर ले गयी
।
और हम अन्दर पहुँचते कि उसके पीछे फूहड़ हँसी सुनाई दी। कलेजे
में रोंदे-सा चल गया । उसके पीछे एक और आवाज़ उभरी- छिनाल को
शर्म नहीं । वह मुझे कमरे में छोड़ झटके से बाहर निकली कि
सबकुछ शांत-सा हो गया। मुझे खाट पर बैठा वह सामने ज़मीन पर बैठ
गई, फिर उठी और एक भरपूर नज़र डालकर मुस्करा उठी...कुछ न बोल
पाने के कारण इधर-उधर अटपटाने लगी। बैठने को कहा तो वह ग्लास
लेकर बाहर दौड़ी । देखता हूँ - अक्षय सौंदर्य शालिनी गौरवर्णा
फुलुवा मेरे सामने अभी भी खड़ी-खड़ी मुस्करा रही हैं....वहीं
रंगरूप । कुछ भी क्षीण नहीं हुआ है।
किन्तु दूसरे ही क्षण उसकी चमड़ी कुछ सख्त दिखाई देने लगी,
बाजुओं में झुर्रियाँ पड़ गयी हैं...लेकिन इससे क्या उसके
सौंदर्य में कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा है। कुएं का जल कहीं
गंदला हो हो सकता है। दूध लाकर चटपट चाय तैयार कर लेती है। हाथ
में चाय लेते वक्त, मेरी अंगुलियाँ न मालूम क्यों काँप जाती
है। और उसकी चुहल फूट पड़ती है...डरपोक....हम दोनों फिर ठठाकर
हँस पड़ते हैं...क्षणान्त देखता हूँ उसकी पलकें भींग गयी हैं।
दृष्टि पड़ते ही वह फफककर होंठ काट लेती हैं...हँसने का प्रयास
करती हुई। रसोई में भाग जाती है। लौटने पर देखता हूँ आँसुओं से
धुली गौरवर्णा और निखर गयी है...एक क्षण में वह कितना रोयी
होगी ? वह शायद जल्दी में हैं...इसलिए क्या कहे, न कहे सोच नहीं पाती...।
उसकी कहानी तो नोखे से सुन चुका था...वही कहानी आगे-पीछे
खिसकाकर फुलुवा सुना गई। वह भी मेरे बारे में कुछ पूछती कि एक
बुढ़िया दरवाज़े पर आई और झिड़ककर बोली- गाड़ी का समय नहीं हुआ
क्या ?
जल्दी चल, नहीं तो चौपट ही जायेगा...एक तेरे कारण । वह बुढ़िया
मुझे देखे बिना बोले जा रही थी लेकिन किसी के होने का भान होते
ही जैसे अधूरे वाक्य के अन्दर ही गटक गयी। फुलुवा का चेहरा
ज़र्द होकर कठोर हो गया था... खिसियाकर वह बाहर निकली। फिर
मेरे सामने मुझसे कुछ सुनने की प्रतीक्षा करने लगी । लगा वह कह
रही हो...मुझे जरूरी काम है माफ़ करना। उन लोगों के धन्धे से
वाकिफ़ न होता हुआ भी मुझे सन्देह था । दूसरे दिन फिर आने को
कहकर आँगन पर खड़ी मोटर साईकिल उठाया कि फुलुवा भी बाहर आकर
साँकल चढ़ाने लगी। लौटते वक्त देखा आठ दस पेट बढ़ाई हुई औरतें
और सिर पर गठरी लिए तीस चालीस बूढ़ी औरतें फुलुवा का अगोरा कर
रही है। मुझे देखकर पहले तो भयभीत हुई । पर मेरा शरमाया चेहरा
देखा, तो एक दूसरे की और देखकर हँस दी।
मैं पश्चाताप कर रहा था कि व्यर्थ वहाँ क्यों गया परन्तु
बालसखा का आग्रह क्या ऐसे ही टाला जा सकता था और वह भी वर्षों
बाद मिलने पर...अब सोच रहा हूँ... उससे भेंट ही क्यों हुई
?
वर्षों बाद मिलने परसों औपचारिकतावश मुझे भी बुलाना होगा सोचता
हूँ क्या तहेदिल से उसे कभी बुला पाऊँगा या वह स्वयं किसी दिन
आ टपका तब क्या उससे मिल पाऊँगा
? मुझमें और बालसखा में यह कौन-सा अन्तर इन
पन्द्रह वर्षों में आ गया है। जिसके कारण मुझे मात्र मिलने से
ही पछतावा हो रहा है। यह मैं नहीं समझ पा रहा हूँ और इच्छा
होते हुए सोच नहीं पाता । पहले तो नोखे को इस हालत में देखकर
मुझे ग्लानि हुई। नोखेराम कितना सूख गया है। वही नोखेराम जो
किशोरवय में हम सब साथियों से अधिक स्वस्थ और सुन्दर दिखाई
देता था, अलमस्त...फक्कड़ मनमौजी नोखेराम, अब इस तरह कैसे
पिलपिला-सा हो गया था कि आखिर फुलुवा से मुलाकात क्यों हुई,
फिर सोचा- हुआ तो कौन-सी गलती हो गयी- क्या इसलिए कि उसका
चरित्र संदिग्ध है- तब भी तो था- आज पूर्णवयस्कता और किशोरवय
में मुझमें कितना फ़र्क पड़ गया कि अब इस तरह की भावना पैदा हो
रही है...पहले तो उसे एक नज़र देख पाने के लिए बालसखा और मैं
तालाब में घंटों तैरते होते फूल और पोखरा तोड़ते, कमल का नाल
मोड़कर स्नान करती हुई फुलुवा की ओर फेंकते तव दोपहरी सूनी
होती और तब उस छोटी- पोखरी में इने-गिने लोग ही रह जाते ।
फुलुवा मालगुजार के यहाँ से घर आती और तुरन्त घर से फिर सीधे
तालाब...तैरते-तैरते....बगल की घाट की ओर डुबकी लगाकर दूर निकल
जाते। लगता उसकी गोरी पिंडलियाँ हाथ में अब आई तब आई । फिर दम
टूटते-टूटते लौटते हुए, लहरों पर सिर निकाल देते । वह मुग्धा
तब देर तक नहाती रहती । तब शायद नोखे भी कल्पना नहीं कर पाया
होगा कि उसकी दूर की भाभी उसकी पत्नि बन जायेगी । एक दिन, और
उसे प्राप्त करने का किशोर साध भी पूरी हो जावेगी।
दिन भर निठल्ला रहने वाला नोखेराम गाँव छोड़कर इस महा-नगर में
आ बसा है अब भी निठल्ला है, कोशिशें भी बेकार जाती हैं
............घूमने को आज भी महानगर की गली-गली की खाक छानता
रहता है। पहले तो उसने भी यही सोचा था कि किसी के सेलून में लग
जाएगा परन्तु वह कहीं न खफ़ सका । क्योंकि उसमें वह टैक्ट नहीं
था जो नौकरी पेशे के नाई में होना चाहिए।
एक से एक आकर्षक सेलूनों के रहते, फेरीवाले नोखेराम को कौन
पूछता ?
कहीं कोई देहाती मजदूर मिल गया तो ठीक न
मिला तो भी.. परन्तु वह अखाड़े में पहुँचेगा ही...भले ही उसे
एक जून का भोजन न मिले, परन्तु दम के बिना वह जी नहीं सकता।
बीड़ी के धुंए से घबराने वाला नोखेराम बहुत बड़ा चिलमची हो गया
था....मुझे ताज्जुब हो रहा था । ग्यारह बजे कचहरी के सामने
बरगद के नीचे उस्तरा खोलकर बैठ जावेगा ....भला तब भी उसके पास
कौन आवेगा
? ऑफ़िस के अंदर भरी दोपहरी कहीं कोई बुला
ले, दूसरी बात है, क्योंकि चम्पी में वह एक ही उस्ताद
है...परन्तु शरारत या असावधानी में भी वह कम नहीं है। इसी कारण
वह भूखों भी मरता है। वैसे घाटे की बात कब सोचता है नोखेराम।
गाँजे के नशे में उसे और कुछ सोचने की फुर्सत नहीं रह जाती ।
उसने उसे पूरी तरह सोख डाला है और और असमय ही वह बुढ़ा गया है।
उस दिन उसे मैं कदापि नहीं पहचान पाता और मुझे कल्पना भी नहीं
थी कि बड़े-बड़े ख्वाब देखने वाला नोखे से दुर्दिन में मुलाकात
होगी।
अचानक यों हुआ कि एक दिन सेकण्ड शो जाते समय मेरे कुतूहल का तब
ठिकाना न रहा जब नाका के पास एक आकर्षण-हीन सेलुन ने मुझे
आकर्षित किया । वहाँ नाई द्वारा एक आदमी को अजीब ढंग से मुड़ते
देख ...वह खोपड़ी के आधे भाग पर दायें हाथ से छुरा चला रहा था
और बायें हाथ के अंगूठे से उसकी एक आँख दबाया हुआ था उसकी
ऊंगलियाँ कपाल पर चिपकी हुई थी। इससे भी ज़्यादा आकर्षण का
केन्द्र वह लालटेन थी जिसे मुड़ाने वाला एक हाथ से पकड़े हुए
नाई के निर्देशानुसार अपने चेहरे के दायें-बायें ले जा रहा था।
कोशिश करने पर भी मेरी हँसी नहीं रुकी तो किसी की प्रतीक्षा की
मुद्रा में खड़ा हो खाँसने-खखारने लगा और ताज्जूब मुझे देखते
ही नाई अपने क्लाईन्ट को छोड़कर उस्तरा लेकर मेरी ओर लपका ।
पहले तो मैं घबराया और सोचा, तमाशा देखने का फल भोगना ही
पडे़गा ही फिर उसकी वही पकौड़ी छनती-सी कड़ी-कड़ी आवाज़ सुनकर
आश्चर्यचकित हो गया, वह उछल गया, बोला- रम्मू भैया
!
आप यहाँ ? मै उसे मुश्किल से पहचान पाया । मन हुआ
बालसखा से तत्काल लिपट जाऊँ पर ठिठक-सा गया और सतर्क हो गया कि
कहीं वही मुझसे न लिपट जाय, जैसे कि हम दोनों की आदत थी मैं
कदम पीछे हटता हुआ पूछा नोखे, तुम
! अब वह थम-सा गया। हम दोनों को अपनी गलती
महसूस हुई, यह गाँव नहीं है और हम भी शायद वही नहीं है, शायद
हम दोनों को ही उस स्थिति से गुजरने का दुख हुआ। वह सम्हल गया
और खेद के स्वर में बोला- भैया क्या करूँ गलती माफ़ करो । दिन
को तो कहीं नहीं चलता इसलिए शाम को इसी हरिजन कालोनी में आ
जाता हूँ खर्चा निकल जाता है। मन में प्रश्न उठा - छूत की
भावना अब भी तुम्हारे मन में है
?
उत्तर भी शीघ्र ही मिल गया- छूत नहीं पर, कटिंग बड़े सेलूनों
में सस्ती भी तो नहीं है। फिर मँहगाई की छूत क्या उससे कम है
?
जो सस्ते में निपट जाय वही ठीक। फिर नोखे ही बात को आगे खींचने
लगा-क्या कहें रम्मू भैया, गाँव में नहीं चला तो यहीं आ गया ।
यहाँ भी वही भूखमरी फिर भी वहाँ से ठीक है, फिर कुछ याद करता
हुआ बोला- तुम यहाँ क्या करते हो। मैंने अपना पेशा बता दिया
तुम शब्द सुनने का इधर आदी न रहा इसलिए नोख पर बेहद गुस्सा आया
। परंतु आत्मीय क्षणों में गुमान देर तक नहीं ठहर सका, वह बोले
जा रहा था तभी तो मुझे रोज धोखा हो रहा था। इधर दो-तीन दिनों
से तुम्हें देख रहा था, परन्तु वर्दी में पहचान नहीं पाता था।
फिर वह उदास होकर चुप हो गया । मैं भी घड़ी देखकर अलविदा के
मूड़ में उसे देखने लगा । तब भी वह चुप था। फिर मैंने ही पूछा
तुम कब से हो
?
यही दो-तीन साल से। लगातार अकाल के कारण लोग गाँव छोड़कर बाहर
चले गए....मेरा धंधा जब बिलकुल नहीं चला तो वहाँ क्या करता
भैया ?
वह व्यक्ति अब भी अपने म्लान मुख के आसपास लालटेन लाता, ले
जाता रहा, शायद आइने में अपना बिजुअल देखने का प्रयास कर रहा
था। अब तक वह एक-दो बार खाँसकर हमारा ध्यान उधर अपनी ओर खींच
चुका था परन्तु नोखे का ध्यान उधर जाए तब न
? मेरे ध्यान जाने से क्या फायदा, खोपड़े का आधा भाग घुटा हुआ
होने के कारण वह विदूषक जैसा दिखाई देता था। मुझे फिर हँसी आने
लगी। अब वह आदमी ऊब रहा था । उसकी हालत देखकर नोखे से मैंने
कहा- पहले इनका काम कर लो । मैं कल इसी समय तुम्हें यहीं
मिलूँगा। तब मजे से बातें होंगी। अभी कहाँ जा रहे हो भाया
? सेकेंड शो प्रताप में । कब आये थे
? अरे तुम्हें तो बताना ही भूल गया, पिछले
माह यही हेड आफ़िस में मेरा ट्रांसफ़र हो गया है। सिन्धी
कालोनी में अभी क्वाटर मिला है। मैं पिक्चर के मूड में हो चुका
था परन्तु वह इस तरह छोड़ने को तैयार नहीं था और मेरा परमप्रिय
बाल-सखा उस समय वर्षों के बाद मिलने पर भी बेहद बोर किस्म का
आदमी लग रहा था। वह सीधे नुक्कड़ की पानवाले के पास गया और पान
के साथ सिगरेट लेकर लौट तब तक वह निरीह कातर पशु जैसा व्यक्ति
मुझे अपराधी नजरों से घूर रहा था और इस हालत में मैं हँसी नहीं
रोक पा रहा था। लालटेन को वह उसी मुद्रा में रखे हुए था लेकिन
इस समय घूमा-फिरा नहीं रहा था । पान खाकर जेब में हाथ डालकर
फिर जाने का उपक्रम करने वाला तो वह फिर सामने खड़ा हो गया।
फिर मुझे लाचार होकर पूछना पड़ा- क्यों नोखे
!
रधिया मामी ठीक तो है न
?
वह इस प्रश्न से अधीर हो उठा, बोला- अरे भैया। वह खम्हन पटेल
को लेकर भाग गई । तब दूसरा बनाया, वही फुलुवा भऊजी को और वह
मुस्कुरा उठा । फुलुवा को
?
हाँ । आखिर भगाकर ले ही आया
?
मेरे प्रश्न का उत्तर उसने सहज ही भाव से दिया- नहीं भैया के
जीते जी यह अधर्म कैसे करता ।
भाई के मरने के बाद तो उसका घर मुहल्ले के धींगरों का अड्डा बन
गया था। और जब मुहल्ले वालों को पता चला कि बेवा फुलवा को गर्भ
हो गया, तो उन्होंने गाँव छोड़ने को मजबूर कर दिया लेकिन
मुज़रिम का पंचायत कुछ न कर सकी। कारण तो तुम जानते ही हो ।
मालगुजार के मरने के बाद वाला मारवाड़ी ही गाँव का सर्वेसर्वा
हो गया। फुलुवा भी उसी रात दवा खा ली थी, मुश्किल से बची, पर
सदा-सदा के लिए बाँझ-सी हो गयी । इस समय नोखे का स्वर पीड़ा से
भरा हुआ था। बोला- भैया, परिवार की लक्ष्मी को कहाँ
फेंकता....मैंने उसे चूड़ी पहना ली और पंचों के मुँह पर तमाचा
मार दिया । इससे हमारा कम नुकसान नहीं हुआ
?
उसने बतलाया मारवाड़ी ने मकसूदन का कर्जा बताया। फुलुवा मरे
हुए पति का कर्जा नहीं रखना चाहती थी, आखिरकार पाट-पाटकर
पन्द्रह हजार मिला, वह भी मेरी बीमारी और कुलपत की सट्टेबाजी
में चला गया।
कुलपत कौन
?
अरे, वही भैया की तरफ का ।
अच्छा अच्छा, अब क्या करता है
?
बस भैया दिन-रात सट्टा लगाता है और स्टेशन के पास ही बैठा रहता
है। कभी-कभी सेठों का सामान इधर-उधर पहुँचाता है। और फुलुवा
? उस रांड़ का क्या बताऊँ भैया, सब स्वतंत्र हैं।
तब तू क्यों रखा है
?
क्या करूँ घर की लक्ष्मी को कहाँ फेंक आऊँ
?
मेरी कमजोरी इस बुढ़ापे में......।
मुझे हँसी आई। अरे, चालीसे में ही बूढ़ा गया नोखे
?
वह ही-ही कर दाँत निपोरने लगा। ऊँची कुर्सी पर आइने के सामने
बैठा हुआ धैर्यवान व्यक्ति बीच-बीच में खाँस-खाँसकर हैरान हो
चुका था । ओढ़ा हुआ तौलिया फेंक कर आक्रामक को मुद्रा में
हमारे सामने खड़ा हो गया- क्यों, मैं कब से बैठा हूँ
?
नोखेराम हाथ होड़ता हुआ बोला- अरे भैया नाराज क्यों होते है
? ये साहब मेरे गाँव के हैं, पन्द्रह साल
में मिला हूँ। दो मिनट बतिया लिया तो क्या गुनाह किया जो तुम
नाराज हो रहे हो
!
मैंने नोख को सेलून की ओर ढकेला, ये तो ठीक ही कह रहे हैं,
ज़रा इन्हें निपटा दो, बैठा हूँ। वह आदमी बुरी तरह से गुस्सा
गया था पर करता क्या, दूसरी स्थिति होती तो नोखेराम की कब का
मरम्मत कर गया होता। वह आदमी बैठ गया तो नोखे भी छुरा लेकर
भिड़ गया ....फिर वह किसी ख्याल में डूबा काम करता रहा।
मेरा कौतूहल शांत नहीं हो पा रहा था, ओर सहसा ही स्मृति खंड
चलचित्र-सा घूम गया । वही फुलुवा जो रंगरूप में ही नहीं सभी
में अखंड थी और जिसके रूप दर्शन के लिए नोखे के साथ किसी न
किसी बहाने मकसूदन के घर पहुँच जाया करते थे और आग-पानी के
बहाने उसकी अंगुलियों को छूकर एक गहरे रोमांच के क्षणों में,
अनभोगे सुख की कल्पना में डूब-डूब जाते और भी हमारे किशोर उम्र
की हमजोली थे, पर अपनी लालसा में कोई सफल नहीं हो पाते । खूसट
बूढ़े की खँखार दूर से ही सुनकर हम तितर-वितर हो जाते। दरअसल
बूढ़े मालगुजार खुसरूसिंग अपने निजी नाई के लिए इस अक्षय
सौंदर्य शालिनी गौरवर्णां को अपनी छोटी मालगुजारिन को
टहल-चाकरी के लिए लाये थे । मेंहदी लगाते, स्नान कराते, जूड़ा
बनाते, कलूठी छोटी मालगुजारिन उस चांद के टुकड़े को एकटक देखती
रह जाती । उसकी रूपसुधा का पान करती न अघाती ।
दोपहरी होते न होते लड़के गली की चौपाल में बैठे रहते और
नानाविध चेष्टाओं से उसे आकृष्ट करते...और फुलुवा कनखियों से
देखती चली जाती। मकस& |