vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कहानी ।।

 

               डॉ. बलदेव की ग्यारह कहानियाँ

 

अव्वल दर्जे का धूर्त

 

साहब......कौन ? सकलू ! मैंने झाँकते हुए कहा । साहब; उसका स्वर लड़खड़ा रहा था। क्या हुआ रे । साहब प्रिंसपल साहब सर्किल साहब के बंगले के सामने नंगे खड़े हैं। नंगे”? हाँ साहब एकदम नंगे हैं और खाँस-खँखार रहे हैं ।आश्चर्य तो नहीं पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि स्थिति इतनी जल्दी बिगड़ती चली जायगी। मैंने फिर पूछा- तुमने अपनी आँखों से देखा है। हाँ साहब वह शर्म से गड़ा जा रहा था। आगे पूछा- अलसेसियन खुला हुआ है, या बंधा हुआ खुला हुआ है, साहब और डरा हुआ बरामदे से घूर रहा है

 

उस समय दिसम्बर की सुबह थी और मुश्किल से छः बज रहे होंगे । मैं बाहर सड़क पर पहुँचता कि देखता हूँ चन्दूभाई निर्विकार भाव से इंस्पेक्टर और दो कांस्टिबल पीछे-पीछे ऐसे चले जा रहे हैं मानो उनका कोई रुका हुआ महत्वपूर्ण काम इस समय पूरा होने जा रहा हो। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि चन्दूभाई किस गरम ईंटों से बने हुये हैं कि भयानक ठंड में भी गर्मी छुपाये हुए हैं। दिन और रात-भर वे इसी हालत में रहे । घोर आश्चर्य......गर्मी में भी सूट लगाने वाले चन्दूभाई शायद ठंडकता महसूस कर रहे थे। शायद नहीं । कुड़कुड़ाने के बजाय वे तमाम अफ़सरों तथा पोलिस वालों की बहु-बेटियाँ गिना रहे थे। पोलिस वालों को लोगों ने उन्हें कई वार पाजामा पहनाने की कोशिश की । पर वे उतार फेंकते ।

 

दरअसल इस वहशीपन की शुरूआत कई माह पहले से हो गई थी। इसी सिलसिले में चन्दूभाई एक के बाद अनेक अपराध करते गये; या अपराधों के आरोप उन पर लगते गये । पिछले दिनों पखवारे भर अपने कमरे में अंदर से कुण्डी चढ़ाए बंद रहे । बाहर उनकी एक भी आवाज़ नहीं आ रही थी । सभी को शंका हो रही थी कि वे सोसायट कर लिये  होंगे। परन्तु दरवाज़ा खोलने या और कुछ उपाय करने की गुंजाइस शेष न थी। उनके लिये कुछ करना यानी अपने आप को मुफ़त में मुसीबत में डालना।

 

इस घटना के अगले दिन अचानक ही उनका दरवाज़ा खुला। उनका पिछले तेरह महीने का पे-स्लिप ए.जी. से आडिट होकर आया था। वे परेशान से नज़र आ रहे थे। दरवाजा बंद करते कि पोलिस के सिपाही आ धमके और उनको कई वारन्ट एक साथ थमा दिये । वे पावती में हस्ताक्षर करने से इन्कार कर रहे थे। उनके रिक्वेस्ट पर भी उन्हें गेट-आउट कर रहे थे। अंत में दो गवाहियों से हस्ताक्षर लेकर उन्हें लौटना पड़ा। उन्हें-पे-स्लिप का इंतजार नहीं था, न ही भुगतान की चिंता । वे दोपहरी भर फिर बंद रहे। शाम को वही मैरुन कलर का कोट बिना कमीज़ के पहने हुए, एक लंवा सा-जूता हाथ में रखे, दूसरा पहने हुए बाहर निकले। उस समय उनका चेहरा बड़ा ही कुत्सित दिखाई दे रहा था। और अन्डरवियर कोट के नीचे जैसे झूल रहा था, सड़क पर खड़े होकर आने जाने वालों को इशारा कर बोल रहे थे। यू सी दीस इसू यू नो आई एम प्रिंसपल आँप जूनियर कालेज, यू मस्ट नाट फॉरगेट आई वाज एमएमसी इन एग्रीकल्चर कालेज, यू नो.....यूसी......व्हाट इज दीज.........।

 

परन्तु आज की व्यस्तता में किस ज़िंदगी को फुरसत है कि वह यह तमाशा एक मिनट को देखे। मिशन की आती हुई लड़कियों को भूखी नज़रों से देखकर वे उनकी ओर लपके कि लड़कियाँ भाग खड़ी हुईं, वे उन्हें गरियाने लगे फिर एकाएक शांत हो गये। अंधेरा होते ही वे पुनः जोर-जोर से गाली बकने लगे, किसको याद कर रहे थे यह तो ऊपर वाला ही जाने। अचानक फिर तेज-तेज चीखने लगे, पड़ोसी इस पर भी जब ख़ामोश रहे तो वे सड़क पर निकल कर सर्किल इंस्पेक्टर के बंगले के सामने खड़े हो गये। चर्चा थी कि उस रात उनकी लड़कियों को गाली बकने लगे । खान साहब शायद दौरे में ही थे, नहीं तो जल्लाद पर्सेनाल्टी के बँगले के सामने चन्दूभाई जैसे नाचीज़ की क्या विसात कि गरियाते रहते। अलसेशियन भी समझदार था.....लोकल कुत्ते भी उन्हें सूंघकर अन्यत्र चले गये थे। यह आश्चर्य की बात थी...क्योंकि ऐसे विशेष क्षणों में तो उन्हें आदतन भौंकना ही चाहिए था। अकस्मात् बुलेट की आवाज़ से वे न जाने कहीं दुवक गये।

 

उन दिनों खान साहब के पांचों बच्चे शाला जाना छोड़ दिये थे। अव्दुल और गफूर तो कभी-कभी बाहर निकल ही जाते, पर लड़कियाँ बिलकुल नहीं। इसके दो कारण हो सकते हैं। एक तो हड़ताली छात्रों का भय दूसरे प्रिंसपल का बहशीपन। पिछले दिनों उपद्रवी जुलूस में वे सम्मिलित नहीं हुए थे। और छात्रों ने उन्हें गद्दार कहकर उनके पिता खान बहादुर के विरुद्ध मुर्दावाद के नारे लगाये थे। पुलिस के नौजवानों ने मार-पीट पर सबसे पहले पहल की और छात्र तो कम थे ही नहीं उन्होंने भी जमकर पत्थर वाजी की । एस. पी. साहब ने बीच-वचाव के लिए माइक पर कुछ बोलना चाहा पर किसी जवान की लाठी उनकी कमर पर पड़ी। सर्किल में पहुँचते ही छात्रों के चपेट में आ गये ....उनकी कमर में जवरदस्त चोट आई थी फिर भी धीरज उनका नहीं छूटा। पुलिस के लिखित रिपोर्ट पर भी चन्दू भाई ने हिरासत में लिये गये छात्र नेताओं को शाला से निष्कासित नहीं किया, बल्कि प्रापर-चैनल के बगैर ही आई.जी. को पुलिस की ज़्यादती की जाँच के लिये लिख दिया। यह घटना उनके सस्पेंड होने के दो चार दिन पहिले ही घटित हुई थी।

 

दरअसल स्थिति और इतनी खराव नहीं होती यदि ठीक समय पर चंदूभाई का केश डिसाइट हो गया होता। उनका केश धीरे-धीरे पेंडिंग होता गया और उसी के समानान्तर वे बौखला कर आक्रामक होते गये । विस्तृत सागर जैसे विभाग में कहाँ क्या हो रहा है, किसे फुरसत......ऑफिसरों के भी तो बाल-बच्चे हैं। वे भला नेता जी जैसे, बिना सोचे-समझे कैसे निकल आते ? सब डंडे बस्ते में रखते आओ आप ही आप सब ठीक हो जायेगा। प्राचार्य चन्दू भाई के व्यवहार से सभी तंग आ गये । नागरिकों का शिष्ट मंडल डी.एस.ई. से मिला तो उन्होंने ऊपर कार्यवाही करने का आश्वासन देकर उन्हें लौटा दिया। इससे स्टाफ मेम्बर्स और छात्रों में तनाव बढ़ता गया। साल भर तक शाला में झगड़े के कारण पढ़ाई बरबाद हो गयी । पिछले फेल हुए भुक्त-भोगी छात्र, प्राचार्य महोदय और शिक्षकों के विरुद्ध भड़के हुए थे.....वे बहाना ढूंढ ही रहे थे कि पिछले माह ग्यारह बजे चंदू भाई शाला के प्रांगण मे झाड़ू लगाते हुए दिखाई दिए । चपरासी यह देखकर दंग रह गया। जब वह साहस करके पास गया तब वे निर्विकार भाव से निहार कर स्वर को मधुर-से-मधुर बनाते हुए बोले- यू नो धनाराम, यू नो आई एम प्रिंसिपल वट आल्सो ए स्वीपर एण्ड आई वान्ट टू सर्व व्बायज।

 

आज का मिडिलच्ची चपरासी धनाराम बेचारा क्या समझता। वह झाड़ू के लिये हाथ बढ़ाता कि चंदू भाई ने उसी झाड़ू से उसकी मरम्मत शूरू कर दी। इस तमाशा को देखकर लड़के हो-हो करने लगे। चपरासी बचकर घबड़ाया हुआ दूर खड़ा हो गया। अब एक लड़के को नई शैतानी सूझी और उनके सामने जाकर ट्विस्ट करने लगा। इससे वे उस लड़के को चार तमाचा जड़ दिये। फिर क्या था छात्र उनपर मधुमक्खियों से टूट पड़े । बड़ी देर तक चंदू भाई मार खाते रहे परन्तु उनका शरीर विधाता ने गढ़ा था किसी धातु का गढ़ा था । उन्होंने हाय हू कुछ भी नहीं की। फिर जादुई ढंग से स्टाफ़ के मेम्वरान एक-के-बाद एक प्रकट होते गये और लड़के विखरते गये। पिछले माह भी एक अन्य शिक्षक को मार पड़ते वक्त यही दृश्य नज़र आया था। चंदू भाई की कुहनी, दाढ़ी आदि फूट गयी थी और जबड़े से खून निकल रहा था। स्टाफ़ रुम में तथा प्राचार्य कक्ष से दुराये जाने पर उन्हें गाली बकते हुये वे एस.डी.ओ. के पास पहुँचे। उस समय दिन के बारह बज रहे थे और साहब थे.........खांटी सरदार.........मिस्टर अरोरा । वे भी उनकी अधिकाश गतिविधियों से वाकिफ़ हो चुके थे। ज्यों-ज्यों उन्हें राहत दिलाने का प्रयत्न करते त्यों-त्यों उनकी हरकतें बढ़ती गयी। सस्पेड होने पर अकाउंट संबंधी चार्च़ देने पर कहा-सुनी हो गई थी। उनके साथ कलेक्टर को भी अपमानित होना पड़ा था। दरअसल जब वे स्वयं किसी दूसरे जूनियर कालेज में लेक्चरार थे तभी की घटना उन्हें ले डूबी। पी.एस.सी. में रिजेक्ट होने के कारण उनको जूनियर कॉलेज में कृषि न होने पर भी नियुक्ति दे दी गई । उन्हें सप्ताह में दो-चार बार क्लास में एगेन्जमेंट मिलते थे जो उनकी शरारतों के लिये काफी था। आये दिन लड़कियों के शिकायत-पत्र प्राचार्य के पास पहुँचने लगे। प्राचार्य ने पहले मोखिक रूप से समझाया, परन्तु; जब हरकतों से बाज नहीं आये तो एक्शन लेना शुरू कर दिया । एक दिन बातें बढ़ीं और दूसरे दिन दर सड़क से अर्धमृत प्राचार्य को एम्बुलेंश पर अस्पताल भेजा गया। मामला प्रकाश में आने पर भी ठंडा पड़ गया। परन्तु नये स्थान पर पदोन्नत होते ही मामला उठ खड़ा हुआ। पुलिस रिपोर्ट के तहत वे सस्पेंड कर दिए गए। उनके साथ लड़कियों से छेड़-छाड़......आगजनी...हत्या का प्रयास आदि की अनेको घटनाएं जुड़ी हुई थीं। कई और बातों को लेकर विभागीय जाँच भी गुप्त रूप से चल रही थी। लगा तो वे सहसा गुमसुम और उदास हो गये। अकेले-अकेले ही बड़बड़ाते रहते और लोगों का अनुमान था कि वे पागल हो गये। सही लगता था।

 

चन्दूभाई को जब भी मार पड़ती, मुझे दुःख होता, सोचता- क्या यह आदमी ज़िंदगी भर मार खाता रहेगा। बचपन में ही कितनी मार खाता था तो मारता वह भी था। उन्हें मैं हाई स्कूल के छात्र जीवन से ही जानता हूँ। पिता प्रायमरी स्कूल के मास्टर थे। गरीबी थी और बुरे व्यसन भी । परन्तु; उनका प्रभाव चन्दूभाई पर कभी न पड़ा। वे हमेशा पढ़ाई में तेज रहे । कुशाग्र बुद्धि, सचरित्रता आदि के लिये वे सदा लोकप्रिय रहे। उनके चरित्र पर अब तक कोई भद्दी घटनाएँ नहीं सुनी गयी थीं। बचपन से दोस्त रहे, एक समय ऐसा था जब हम एक दूसरे के बिना न कालेज जाते और न वहाँ से बाहर निकलते ।

 

परन्तु अब तो उनकी अनेक विचित्र घटनाएं सुनकर मिलने में भी मुझे डर लगने लगा। एक दिन रास्ते में मिले थे दोनों अनजान बने बढ़ गये, परन्तु अकस्मात उन्हें क्या सूझा और पलटकर बोल उठे- देखो शिक्षा विभाग में लोग कितने स्वार्थी और ईर्ष्यालु होते हैं कि.....जबकि दूसरे डिपार्टमेंट में लोग बुरे-से-बुरे काम में भी एक दूसरे का सहयोग करते हैं...तुम्हारा क्या ख्याल है। मैंने कहा- आप ठीक कहते हैं। उस समय उनके चेहरे पर संतोष का भाव था। और फिर चुपचाप बिना परेशान किए नमस्ते लेकर चले गये थे।

 

रिंमाड पर छूटने के बाद से ही वे अपने कमरे में बंद हुआ थे बिजली विभाग वाले कनेक्शन काटकर वापस हो गए । पी. डब्ल्यू डी. वाले नोटिस चिपका कर चले गये। पुलिस वाले कई बार लौट गये थे । लोग उनकी ख़ामोशियों पर उन्हें भूलने लगे थे। शाला परिवार को उनकी सर्विस बचने की आशा नहीं थी। प्रभारी महोदय और टीपू लेखापाल रोज उच्चाधिकारियों की डाक बेसब्री से खोलते और पढ़कर निराश हो जाते।

 

परन्तु सुबह की घटना ने शहर भर को चौंका दिया। पेपर में बड़े-बड़े हर्फों में यह समाचार छप गया । इस बार पुलिस ने दफ़ा चौंतीस के अन्तर्गत बंद किया था। स्वयं के पासबुक के आधार पर भी इन बार जमानत नहीं हुई, रात भर कड़ाके की ठंड बर्दाश्त करने के बाद वे दूसरे दिन कोर्ट में पेश किये गये। कपड़ा मुश्किल से पहने थे । कुछ आवश्यक पूछ-ताछ के बाद मजिस्ट्रेट ने उन्हें मेडिकल रिपोर्ट के लिये सर्जन के पास भेज दिया।

 

सर्जन ने उन्हें रिपोर्ट में अस्थिर बुद्धि का व्यक्ति साबित किया। और रांची भेजने का सजेशन भी लिख लिया । इसके तत्काल बाद ही पुलिस की कस्टडी में वे रांची भेज दिये गये।

 

इन चार महीनों में लोग उन्हें एक वार फिर भूल गये थे। परन्तु रांची से सीधे जब कोर्ट में पेश किये गये तो एक वार फिर हवा सरसरा गई। वार मेम्बर्स इस असामान्य औपन्यासिक चरित्र के फैसले के लिये उत्सुक हैं। स्टाफ़ के लोग और छात्र समुदाय भी उपस्थित हैं, मजिस्ट्रेट साहब की कड़ाई से पूरा इलाका परिचित है। कोर्ट का पहला केश मजिस्ट्रेट की टेविल पर पुट-अप कर दिया गया है। अर्दली का गगन भेदी गर्दभ-स्वर से सबके कान के कीड़े झरने लगे हैं।

 

चद्रमणी कुल श्रेष्ठ......राम बगस........टीपू वर्मा वगैरह-वगैरह.............।

चद्नमणी उर्फ चन्दू भाई कटघरे पर खड़े कर दिये गये। मजिस्ट्रेट सर से पाँव तक सरसरी निगाह से उसे देखता है फिर उसका सवाल होता है:-

तुम्हारा नाम चंद्रमणी कुलश्रेष्ठ।

शिक्षा-एम एस.सी.एल.एल.बी.।

तुम्हारा वकील ?

माई सेल्फ।

कोई तुम्हारे रिश्तेदार हैं यहाँ ?

कहीं भी नहीं।

तुम्हारे पिता का नाम ?

बताना आवश्यक है ?

दोनों की आंखें चार होती है, मजिस्ट्रेट रुकता है फिर आगे सवाल करता है-

तुम्हारी पत्नी ?

नहीं है।

शादी हुई ?

नहीं।

तुम वकील खड़ा करने का मौका चाहोगे?

नहीं ?

क्या तुमने एकाउंटेंन्ट टीपू को रूल से मारा है ?

नहीं।

क्या तुमने प्रभारी प्राचार्य रामचंद तिवारी को दाँतों से काटा है?

नहीं

क्या यह सही है कि तुमने रामबगस नामक छात्र को काँच के टुकड़े से मारा है ?

गलत

क्या तुमको तारीख 15-12-75 की सुबह पुलिस ने सड़क पर नंगा घूमते हुए पकड़ा था।

नहीं। उस वक्त मैं दौड़ रहा था।

क्या तुम उस वक्त नंगे थे

हाँ।

किस कारण ?

इसलिए कि उस समय मैं लेट्रिन गया था, वहाँ पाज़ामा में विच्छू घुस पड़ा, मैंने डर से कपड़ा खोला तो वह बनियान में आ गया.......उसे भी खोला तो......लड़के मुझे देखकर बोर्डिंग से निकलकर दौड़ाने लगा। मैं बचने के लिये भाग रहा था कि पुलिस ने इसी समय पकड़ लिया।

क्या तुमने पुलिस के सिपाहियों को थाने में ले जाते वक्त पीटा और गाली दी है?

नहीं- चन्दू भाई की आँखें आश्चर्य से मजिस्ट्रेट की ओर उठीं और वे सहसा उन्हीं से पूछे बैठे- क्या मैंने ऐसा किया, मजिस्ट्रेट ने जैसे इसे अनसुना कर पूछा-तुम्हारे खिलाफ़ लोग गवाही क्यों देते हैं?

उनको भड़काया गया है।

क्या तुम अपने हक में कुछ और सफाई चाहते हो ?

नहीं…..

चन्दूभाई की आवाज़ में पश्चाताप और दर्द था। मजिस्ट्रेट आँखे नहीं मिला सके। सहसा उसके माथे पर बल पड़े और वह पुनः केश देखने लगते हैं। खास कर सी.एस. और मेटर स्पेशलिस्ट के रिकार्ड और गवाहियों की असबंद्ध गवाहियाँ सरकारी वकील भी इसी ढंग के अनेक प्रश्न करता है और चंदूभाई नपे-तुले शब्दों में यही उत्तर दोहराते हैं। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने कुछ आश्वस्त होकर फैसला सुनाया। अभियुक्त चद्रमणि कुलश्रेष्ठ वल्द चिंतामणी कुलश्रेष्ठ उम्र 40 वर्ष को भारतीय दण्ड विधान की धारा 307,228,29,30,336,34,(6) से आवश्यक एव विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में बाइज्जत वरी किया जाता है। किन्तु; कोर्ट आँफ कन्टेम्ट के तहत सात दीनों की सजा दी जाती है। जो कि अभियुक्त के पिछले दिनों काटे गये कारावास में शुमार है। इससे उसकी नौकरी में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

 

उनकी हथकड़ी खोल दी जाती है। प्रतिपक्षियों के हृदय की धड़कने बढ़ जाती हैं। वकील समुदाय पसीना पोछने लगता है।

 

चंदूभाई सबसे पहले लपक कर मुझसे ही मिलते हैं। मैं सहज ही हाथ बढ़ा देता हूँ। फिर वही उनकी बायीं आँख दब जाती है।

डॉ. बलदेव

स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,

छत्तीसगढ़

◙◙◙

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश