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डॉ. बलदेव की ग्यारह
कहानियाँ
मंगलू चोर
मंगल
सिंग को कोई नहीं जानता । मंगलू चोर को सब जानते हैं। लूटमार
के उसके सैकड़ों किस्से बहुतों की जुबान पर है। मंगल सिंह
भरे-पूरे किसान का लड़का था। ज़मीन की मामूली सी विवाद पर भाई
मारा गया। ज़मीन से बेदखल होने पर मंगलसिंह बागी हो गया। उसके
नाम से ज़मीदारों की नींद हराम होने लगी । मंगलू जब भी मौका
पाता सेठ-साहूकारों, मालगुजारों और ज़मींदारों के यहाँ चोरी
करता । चोरी का माल वह गरीब और ज़रूरतमन्द लोगों में बाँट दिया
करता था। जनश्रुतियों में मंगलूचोर आज भी जिन्दा है।.....वह
ऊँची-ऊँची हवेलियों को फर्लांग जाता है। उसके छूते ही ताले टूट
जाते हैं। बिना चाबी की तिजोरियाँ खुल जाती है। पीले चावल
छिड़कते ही घर मालिक मूक दर्शक हो जाता है। जितनी आवश्यकता
होती उतनी ही उठाकर ले जाता । शाम को फिर खाली हो जाता ।
माखूर-गुडाखू, चोंगी-बीड़ी, भाँग-गाँजा दारू जैसे नशे से वह
दूर रहता। निंगोटी का भी वह सच्चा था। गरीब लोगों में उसकी
पूजा होती थी । लोग उसे फ़रिश्ता समझते थे। लेकिन
सेठ-साहूकारों, ज़मीदारों के लिए वह एक काँटा था। दूर-दूर तक
वह अब मंगलू चोर के नाम से पुकारा जाने लगा।
खाने-पीने, रहने-सोने का उसका कोई
ठौर-ठिकाना नहीं था। रात के अंधेरे में जिस गरीब-किसान का
दरवाज़ा खटखटाता, वहाँ जो मिलता उससे ही पेटपूजा कर रात के
अन्धेरे में गायब हो जाता था। चोरियाँ वह रात में ही करता था ।
कहते हैं उसे नींद नहीं आती। दगाबाज़ या मुखवीरों के लिए तो वह
यमराज ही था। कोई गरीब को सताता, वह सूंघ ही लेता और
दूसरे-तीसरे दिन उसके हौसले ठिकाने लग जाते । एक-दो माल-गुजार
तो उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते थे। ज़मीदार हुकुमसिंह के
बहनोई साहब बेरीस्टर थे। उन्होंने अँगरेज़ी सरकार से लिखा-पढ़ी
की । जिस जंगल में वह कभी-कभी विश्राम करता था, उसके आस पास
रंगरूटों का कैम्प लगा। गाँव से छीनकर मूर्ग-बटेर लाते, काटते
और शराबखोरी शुरू हो जाती । रात को जलसा जैसा दृश्य नज़र आने
लगा। मंगलू चोर मशक की नाई कैसे तो रेशमी झालरों वाले कैम्प
में घुसा। मेजर साहब खर्राटे भर रहे थे। टेबिल पर रखी लैम्प की
बत्ती मंगलू ने तेज की। एक नज़र साहब-बहादुर के चेहरे पर
दौड़ाई। फिर आहिस्ते से साहब बहादुर की कलाई से घड़ी और अँगुली
से हीरे जडे़ सोने की अँगूठी उतार ली। वह छावनी में कब आया कब
घुस कर वापस हुआ किसी को पता नहीं चला।
सुबह साहब बहादुर उठे। हाथ-मुँह धोया।
कलई सूनी थी । गद्दे पर देखा....आसपास देखे कहीं पता न चला कि
अचानक ही उनका ध्यान अँगुली पर गया। अँगूठी गायब थी।
साहब-बहादुर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए....किसी से कुछ....कहा
नहीं और दिन-भर अनुमान करते रहे, कौन हो सकता है किसकी हिम्मत
है, उनका शक रंगरूटों पर था।
शाम को साहब बहादुर चुरुट पीते आराम
कुर्सी में पसरे हुए थे। इतने में ही एक संतरी आया।सलाम बजाया।
अर्ज किया- हुजूर आपसे मिलने कोई आदमी आया है। अच्छा उसे ले आ,
आगंतुक ने साहब बहादुर की बंदगी की । साहब बहादुर गजट में आँखे
गड़ाए हुए बोले - हाँ बोलो क्या बात है
?
हुजूर माई बाप। हाँ, कहो। आपसे कुछ गुज़ारिश है। मुझसे
?
क्या बात है
?
हुजूर सरकार के यहाँ कुछ चोरी-वोरी हुई
है क्या
?
तुम्हें कैसे मालूम
?
वाह हुजूर भला चोरी करने वाले को मालूम न हो तो किसे मालूम
होगा। अब साहब बहादुर ने गजट रखते हुए सामने खड़े युवक पर नज़र
दौड़ायी- देखा छः-साढ़े छः फीट का छरहरा बदन गोरा-नारा एक जवान
साहब बहादुर को अनुमान लगाते देरी न लगी।
नीचे की ज़मीन उन्हें खिसकती नज़र आयी
फिर भी अपनी झेंप दबाते हुए बोले- अच्छा, तो मंगलू तुम्हीं हो
। जिसकी हमें बहुत दिनों से तलाश थी। हाँ हुजूर, मै ही मंगलू
हूँ, मंगलू चोर। आपकी घड़ी और यह अंगूँठी मैंने ही चुराई है।
लीजिए सम्हालिए इसे। अब गई तो दुबारा नहीं मिलेगी। साहब बहादुर
को आश्चर्य हो रहा था। चारों ओर से संगीन तनी हुई थी। साहब ने
इधर-उधर ताकते हुए पुछा - तुम्हें यहाँ घुसते हुए डर नहीं लगा
मंगलू
?
हुजूर माई बाप से भला क्यों डर लगे
?
साहब ने फिर मंगलू की आँखों में देखा
–साहब
बहादुर समझदार थे। उन्होंने कुछ इशारा किया । तनी हुई संगीने
नीचे झुक गयीं। उन्हें पूरा विश्वास हो गया । पास खड़ा होकर भी
मंगलू उन्हें कुछ नुकसान नहीं पहुँचाएगा। उन्होंने गंभीर स्वर
में कहा- मंगलू तुम्हारे सिर पर सरकार ने एक लाख रूपए का इनाम
रखा हैं। जिन्दा या मुर्दा । मेरे पास तुम्हें अरेस्ट करने के
लिए वारन्ट भी है। तुम्हारे लूट-पाट हत्या की जुमला सूची मेरे
पास है। तुम्हीं ने जमीदार साहब के बेटे को सरे आम नीम के पेड़
में गले में रस्सी डालकर लटकाया था। हुजूर आप अच्छा फरमाते हैं
। मैंने लुटेरों के यहाँ लूट-पाट की है। हत्यारों को ही मारा
है। हुजूर आप चाहें तो हथकड़ी लगा सकते हैं। इतना कहकर सचमुच
मँगलू ने अपने दोनों हाथ साहब की ओर बढ़ा दिए साहब बहादुर की
दिलचस्पी कुछ बढ़ी उन्होंने पूछा- मंगलू तुम तो नेक दिल इन्सान
लगते हो। विश्वास नहीं होता तुमने इतने अपराध किये हैं। लेकिन
तुम्हारे विरूद्ध इतने मामले कैसे जुड़े। हुजूर शुरू में मुझे
झूठे मुकदमे में फसाया गया। मैं निरपराध, सीधा सादा इन्सान था।
आज बदले की आग में हैवान बन चुका हूँ। इसका जिम्मेदार ठाकुर
हुकूमसिंह है। साहब की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी । मंगलू ने
उनके आगे जमींदार का कच्चा-चिट्ठा खोल दिया। हुजूर इस शैतान
ने मेरे भोले-भाले भाई को जान से मारा । आज तक उसकी लाश का पता
नहीं चला, जाने कहा गाड़ दिया। उसने मुझे मेरी पुस्तैनी ज़मीन
से बेदखल किया। हुजूर उसने गाँव की सैकड़ों बहू-बेटियों की
इज्जत लूटी है। जो विरोध किया, उसी को न जाने कहाँ उठवा दिया।
हुजूर मैंने इन सबका बदला ले लिया है। हाँ, मैंने ही जमींदार
के बेटे को सरे आम नीम के पेड़ में फाँसी दी थी।
ये सब तो ठीक है मंगलू लेकिन तुमने
कानून को हाथ में क्यों लिया
?
क्या करें हुजूर । कानून भी तो इन्हीं के द्वारा, इन्हीं की
रक्षा के लिए बनाई गयी है। चाहे ये कितना भी अनाचार करें,
गरीबों की पुकार कौन सुनता है, उन्हें न्याय कहाँ मिलता है
?
यही वज़ह है हुजूर, मेरे जैसे लोगों को चोर डाकू बनना पड़ा।
साहब ने मंगलू की बातों को गंभीरता से लिया। बोले-कुछ पीओगे
नहीं
?
हुजूर । ये सब मैं कभी नहीं छूता। अच्छा साहब बहादुर ने ठहाका
लगाते हुए कहा- मंगलसिंह । शेर का शिकार हम खुले मैदान में ही
करते हैं। अच्छा अब तुम जा सकते हो। मंगलू ने साहब को फौजी
सैल्यूट बजाई और सबके सामने शेर जैसा वह आहिस्ता आहिस्ता
संगीनों की छाया से दूर हो गया । सबके लिए यह अभूतपूर्व अनुभव
था।
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दूसरे
दिन इलाके में यह खबर आग की लपट जैसी फैल गयी। फौज पकड़ने आई
थी। लेकिन मंगलू चोर फौज का घेरा तोड़ भाग गया। यह मंगलू और
साहब बहादुर दोनों के लिए अपमानजनक बात थी। दूसरे तीसरे दिन
साहब बहादुर का ट्रान्सफर हो गया।
पन्द्रह दिन बीत गए। ज़मींदारों की फिर
मीटिंग हुकुमसिह की हवेली में हुई। रात हवेली के पिछवाड़े कंस
बध खेला जा रहा था। दर्शक दीर्धा ठंसा ठंस भरी हुई थी। दूर-दूर
से बड़े नामी-गिरामी लोग बैलगाड़ी जीप आदि में आए थे। रात के
दस बजे होंगे, दो बड़े बड़े पोलर गैस जल रही है खूब उजाला है।
संगीत की स्वर लहरी में हल्की-हल्की हवा बहने लगी। सहसा ही हवा
तेज हुई और आँधी पानी में बदल गई। गैस बस्ती बुझ गयी । घने
अन्धेरे में एक चीख सन्नाटे को चीर गयी। दर्जनों छोटी-बडी
टार्च रोशनी फेंकने लगी। देखा ज़मींदारिन दहाड़ मारकर रो रही
है - हाय मै लूट गयी मैं बरबाद हो गयी। ज़मींदार साहब दौड़े ।
बार-बार पूछने पर जमींदारिन इतना ही बोल पाई- मुन्नी को गोदी
से छीनकर कोई इधर भाग गया है। अनुमान लगाने में देरी नहीं हुई
चारों ओर एक ही नाम बजबजा रहा था- मंगलू चोर मंगलू चोर। सभी
दहशत में आ गए।
बच्ची सुबह तालाब के किनारे तड़पती हुई
मिली । उसका मुँह कुछ ऐसा दबाया गया था कि मुँह सदा के लिए
टेढ़ा हो गया। गले और हाथ-पैर से रत्न जड़ित आभूषण निकाल लिए
गये थे। यह अपमान हुकुमसिंह के लिए जी-जान से बड़ा था।
शाम गुडी बैठी, घनघोर चर्चा हुई। इलाके
भर के जमींदारों के लठैत और पहलवान पुरानी हवेली में जमा हुए ।
जाल बिछाया गया । खड़ी दोपहरी थी जंगल में दूर दूर तक से सोये
हुए शेर के खर्राटे की आवाज़ सुनाई दे रही थी। अनुमान सही
निकला। मंगलू चोर यहीं कहीं सो रहा है। मकोय की घनी झाड़ी के
नीचे घास पत्तर पर मंगलू सो रहा था। जोर का हल्ला हुआ- कूदो,
पचास-साठ आदमी एक साथ कूद पड़े थे मंगलू के ऊपर । मंगलू को
सम्हलने का मौका न लगा। उसने प्रतिकार बेकार समझा । प्रेम से
रस्से में बंध गया।
शाम हो रही है। हाँक पड़ चुका है। गुड़ी
के बीच मंगलू एक खंम्भे से जकड़कर बाँध दिया गया है। सोलह वर्ष
से बड़े लड़के सयाने जा रहे हैं। आदेश के अनुसार पांच-पाँच
पनहीं(जूते) मंगलू को मार रहे है। मुँड चिथड़ा हो रहा है ।
सिर, नाक, मूँह से खून निकल रहा है। अब अघोरी की पाली है-
अघोरी बीस वर्ष का भरा-पूरा जवान । मंगलू के आगे जाकर वह ठिठक
सा गया। इधर हुकुमसिंह का हुकुम बज रहा था- मारों साले को, ए
छोकरा क्या देखता है रे, मार साले को । मंगलू खड़ा था। अघोरी
तू भी मार बेटा। अघोरी की आँखे ..................एक बार उस
वीर मूर्ति की ओर उठी। उसने मन ही मन नमन किया। दुबारा उसने
जलती आँखों से हुकुमसिंह को देखा- चिनगारियाँ झर गयी।
हुकुमसिंह का सिंहासन डोलने सा लगा। उसे दो-दो मंगलसिंह दिखाई
देने लगे। फिर अघोरी ने अपनी लम्बी भुजाओं और चौड़ी छाती में
मंगलू को भर लिया । इसके बाद मंगलू की ओर दुबारा देखने की किसी
की हिम्मत नहीं हुई।
डॉ. बलदेव
स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,
छत्तीसगढ़
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