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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।।ज़िंदगी के रंग।।

 

 

 

कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं


किशोर दिवसे

 

बेटा....शायद कोई याद कर रहा है तुझे इसीलिये इतनी हिचकियाँ ले रहा है....चल जा पानी पीकर आ...बचपन में माँ के कहे हुए शब्द आज भी याद हैं। और पानी पीने से पहले जाने-अनजाने कितनों को याद कर लिया था उन दिनों में । नौजवानी ने कदम बढ़ाये और जवानी के दौरान भी छेड़खानी के अंदाज़ में ही सही इन हिचकियों के साथ ही अपनों को याद करने का इतना प्यार भरा तरीका मुझे नहीं लगता हमारे देश के अलावा किसी और अगह सोचा भी जा सकता है।

 

हिचकियाँ...पानी का गिलास और बहाना ही सही अपनों को याद कर लेना...सोचिये तो सही किसके मन में सबसे पहले यह विचार आया होगा कि हिचकी आई है । चलो अपनी नज़रों से दूर...चहेतों को याद तो कर लें। नई पीढ़ी के मेरे नौजवान दोस्त पता नहीं, हिचकियों से जुड़ा यह रेश्ता छू पाते हैं या नहीं जो अवसर मन को गुदगुदा जाता है। भूले-बिसरे लोगों को अगर इसी बहाने याद भी कर ज़रा देखिये तो सही कितना मज़ा आता है।

 

इसका मतलब यह हुआ कि मुझे हिचकियाँ नहीं आती यानी मुझे कोई याद ही नहीं करता- गंजी चाँद पर हाथ फेरते हुए दद्दू ने कहा लगता है सब लोग मुझे भूलते जा रहे हैं इसलिये हिचकियाँ आनी बंद हो गई हैं । इसी बीच दद्दू को हिचकी आई और दो घूँट पानी से हलक तर करते ही उनका कंठ खुल गया-

 

हिचकियाँ इसलिये अब मुझको नहीं आतीं हैं

रफ़्ता रफ़्ता वो मुझे भूल गया है शायद ।

किशोर दिवसे

जन्म-15,सितम्बर,1956। शिक्षा-बीएस.सी, बी.जर्नलिज़्म। कुछ वर्षों तक गुरू घासीदास विवि, बिलासपुर के पत्रकारिता विभाग में व्याख्याता रहे । मराठी, हिंदी और अँग्रेज़ी अनुवाद में गहरी रूचि । पत्रकारिता और रचनात्मक लेखन में निरंतर सक्रिय हस्तक्षेप। विगत 28 वर्षों की पत्रकारिता के दौरान व्यावसायिक अनुवाद के साथ-साथ, बाज़ारवादी दौर में दम तोड़ती संवेदनाओं को बचाने की ज़िद वाले व्यक्तित्व । वेब-पत्रकारिता से भी संबद्ध रहे । 84 से हिंदी दैनिक 'नवभारत' बिलासपुर संस्करण में वरिष्ठ उपसंपादक। छत्तीसगढ़ी लोककथाओं का अनुदित अँग्रेज़ी संस्करण प्रकाशित ।

संपर्क

जनता क्वार्टर, EWS-67, नेहरू नगर,  बिलासपुर - 495001, छत्तीसगढ़ 

अब यह तो दद्दू ही जानें कि कौन भूला और किसने याद़ रखा दद्दू को । पर इस हिचकियों के पीछे विज्ञान के भी अपने क़ायदे-कानून हैं। लेकिन एक बार ज़रुर है कि हिचकियों से किसी को याद करने की बात कभी विज्ञान के दिमाग में भी नहीं आई थी। कभी-कभार ऐसा भी हुआ है कि ज़िंदगी का सफ़र पूरा होने को होता है और डूबती नब्ज़ वाले की अधूरी इच्छाएं क्या-क्या है बूढ़े-बुजुर्ग फटाफट याद करने लगते हैं।

 

 हिचकियों पर होते इस ज़िंदगी के ख़ात्मे पर किसी ने कहा भी है- झुटके दे के तार तोड़े जा रहे हैं साज़ के। इंसान अगर बीमार हो तब भी कई बार हिचकियाँ आती हैं। साथ ही मरीज़ की तीमारदारी में लगे लोग यह सोचने लगते हैं कि आखिरी हिचकियाँ ले रहा है बीमार कहीं......।

 

हिचकियों और यादों से जुड़ी बातों के रास्ते दद्दू और मैं कुछ दूर निकल पड़ते हैं तफ़रीह के लिए। सिमटते मैदान के कोने में खड़े आम के पेड़ की डाल पर बुलबुल और एक फुनगी पर फैयाज़ के होने का अहसास मिठास भरी कूक से होता है। पत्रकार भाई ! कहीं इस बुलबुल के स्वर में फैयाज़ से विछोह की व्याकुलता तो नहीं छिपी है ?”-दद्दू ने मुझसे सवाल किया ! “न तो मुझे पक्षियों की बोलियों का ज्ञान है और न ही मैं ऑर्निथालॉजी का विशेषज्ञ लेकिन कहानियाँ और उपन्यास मैंने जीभर कर पढ़े हैं और बुलबुल और फैयाज़ के जरिये प्रेमी जोड़ों की कल्पना की गई है । - मैंने कहा।

  

तब कहीं यह कूक फैयाज़ की याद में आ रही हिचकी तो नहीं - दद्दू ने मुझे फिर टोका। अपने बाल नोंच लेने को जी चाहा था दद्दू के इस सेंस ऑफ एस्थेटिक्स पर । फिर भी आज के युवा दोस्तों के इर्द-गिर्द मौजूदा माहौल को याद कर मुझे एहसान दानिश का यह शेर याद आता है-

दो जवां दिलों का ग़म दुरियाँ समझती हैं।

कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं।

 

पता नहीं सचमुच कोई रिश्ता इन हिचकियों और किसी की यादों में है या नहीं लेकिन इनके बारे में डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक से ज़रूर पूछना पड़ेगा। अब यदि डॉक्टर ने हिचकियों को बीमारी बताकर आपका इलाज करना शुरु कर दिया तब दोष मुझे मत दीजियेगा क्योंकि जब भी मैं अपने दिल से बातें करता हूँ मेरा दिल-ए-नाशाद यही करता है -शायद उस शोक़ ने भूले से याद किया है मुझे।

 

आज की तारीख में कितने घरों ने इस रेशमी रिश्ते को याद रखा है कि किसी को हिचकी आई और तपाक से किसी ने कहा क्यों, कोई याद कर रहा है क्या तुम्हें ? हो सकता है दिल बहलाने को ही यह कहा गया हो लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता कि कितने रिश्तापसंद लोग होंगे उस ज़माने के जिनके मन में यह ख्याल आया कि हिचकियाँ आई हैं, कहीं कोई याद तो नहीं कर रहा ? आपस में कभी अपनों से बातचीत कर पूछिये और जानिये इस बारे में कि हर उम्र के लोग हिचकियों के बारे में क्या सोचते हैं ? नई जनरेशन को हिचकियों का अनूठा तिलस्म मालूम भी है या नहीं ? मुझे तो लगता है कि इंसान चाहे आयु के किसी भी दौर से गुज़र रहा हो, जब भी मौत सामने आये, रिश्तों की मिठास इतनी गहरी होनी चाहिये कि उसमें डूबकर अलविदाई के समय भी हर कोई अपने अज़ीज़ से यही कहे कि-

 आख़िरी हिचकी तेरे जानू पे आये

मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ।

 

लीजिये ....बातों ही बातों मे मैं और दद्दू तफ़रीह पूरी कर घर लौट आये। घर के सामने ही उसी बिजली के खम्भे के पास लड़खड़ाता हुआ एक आदमी हिचकियाँ ले रहा होता है। बदबू का तेज झोंका नथुनों से जैसे ही टकराया दद्दू ने आलाप लिया अख़बारनवीस । यह हिचकी दारू-ज्यादः होने की है या कोटा कम पड़ जाने का सिग्नल !”

 

मुझे इसकी जानकारी सचमुच नहीं है दद्दू कहकर जैसे ही मैं अपने घर मे दाखिल होने को था मैंने देखा दद्दू हिचकियाँ ले रहे थे। फौरन मैने कहा- घर  जाओ दद्दू लगता है भाभीजी याद कर रही हैं।

 

सुबह सोकर उठता हूँ। चाय की प्याली के साथ शुक्रवार की सुबह अख़बार के पन्ने पलटने लगता हूँ। अरे ! यह क्या ...मुझे हिचकी आती है- सच बताइये !कहीं आप मुझे याद तो नहीं कर रहे हैं ?

 

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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