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वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। इटली से ।।

 

 

सरलता से जटिलता की ओर


सुनील दीपक

 

ह शायद मानव मन की स्वाभाविक प्रकृति है कि जटिलता की हर स्थिति को सरल बना कर सोचता है। संसार की हर बात को हिस्सों में बाँटना, हर हिस्से का एक नाम रखना और हर नाम से उस हिस्से के गुण अवगुण समझने की कोशिश करना, यही सरलीकरण का काम है। ताकि नाम देख कर ही समझ जाईये कि क्या बात हो सकती है और उस पर अधिक न सोचना पड़े, न दिमाग लगाना पड़े। इस तरह आधुनिक, पुरातन, वामपंथी, रुढ़िवादी, फासिस्ट, मार्क्सवादी, साम्राज्यवादी, अच्छा-बुरा जैसे नामों के लेबल हैं हमारे मन में जो हर स्थिति पर एक दूसरे पर लगाने की कोशिश करते हैं । कठिनाई यह है कि लोगों और स्थितियों की सच्चाई अपने दिये हुए नामों की सरलता से कहीं अधिक जटिल होती हैं।

 

पिछले दशकों में हिंदी फ़िल्मों का विकास में इस सरलता के जटिलता में बदलते स्वरूप का संकेत मिलता है। एक जमाना था जब नायिका सीधे-साधे कपड़े पहनने वाली घरेलू नारी होती थी, नायक अच्छा आदमी होता था, प्राण और के. एन. सिंह जैसे लोग स्पष्ट ही बुरे व्यक्ति यानी खलनायक होते थे, महमूद या प्रेमनाथ हँसाने वाले विदूषक होते थे और हेलेन या बिंदु पश्चिमी लिबास में नाचनेवाली, शराब पीने वाली खलनायिकाएँ होती थीं। आज नायक, खलनायक, विदूषक की यह श्रेणियाँ आपस में घुलमिल सी गयीं हैं और फ़िल्मों के पात्र अधिक जटिल हो गये हैं।

 

जटिलता से यह कठिनाई है कि सोचना भी अधिक पड़ता है पर अंत में कुछ समझ भी नहीं आता कि कौन सही है कौन गलत, क्या सोचें या क्या करें।

 

यही सोच रहा था जब कुछ दिन पहले मेधा पाटकर जी यहाँ हमारे शहर में एक सभा में आईं और वह कलकत्ता के पास सँगूर में हो रहे संघर्ष और पश्चिम बँगाल की वामपंथी सरकार के दमन के बारे में बता रहीं थीं । तब नंदीग्राम में सीपीआई मार्क्सवादी पार्टी का हमला नहीं हुआ था। मेधा जी ने कहा, "पश्चिमी बंगाल में पिछले तीस सालों से भी अधिक समय से वामपंथी सरकार है । हम लोग वामपंथी दलों के साथी रहे हैं। विश्व सामाजिक फ़ोरम और अन्य जगहों पर हमने साथ साथ ही नवउदारवादी नीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठायी है । पर पश्चिम बंगाल सरकार में भी परिवर्तन आ रहा है। हम लोग उद्योग मंत्री से मिले, मुख्य मंत्री के सामने अपने प्रश्न रखे और हम लोग हैरान हो गये जब वह बोले कि हम नवउदारवादी आर्थिक प्रणाली में और क्या कर सकते हैं? हमें भी कम्पनियों से समझौता करना पड़ता है। जो ज़मीन वह चुने, हमें वही मानना पड़ता है, हम उनके लिए ज़मीन नहीं चुन सकते, नहीं तो वह किसी दूसरे राज्य में चले जायेंगे। हम वामपंथी नेता से इस तरह की बात सुन कर दंग रह गये ।"

 

मेधा जी का या नंदीग्राम और संगूर में संघर्ष करने वालों का पश्चिम बंगाल का अनुभव, इण्लैंड में वामपंथी दलों को चुनावों में वोट देने वाले लोगों के आश्चर्य और क्षोभ से भिन्न नहीं था जब इण्लैंड की वामपंथी सरकार ने श्री टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में ईराक युद्ध में अमरीका का साथ देने का निश्चय किया था । लंदन की सड़कों पर हजारों लोग निकल आये थे ईराक पर हमले के विरुद्ध प्रदर्शन करने और बहुत से लोग कह रहे थे कि वामपंथी सरकार जिसे हमें चुना है वह इस हमले में अमरीका का साथ नहीं दे सकती । पर ईराक युद्ध ही क्या, अन्य बहुत-सी सामाजिक और आर्थिक नीतियों में इण्लैंड की वामपंथी सरकार ने रूढ़िवादी दिशा में फैसले लिये हैं । तो फ़िर वामपंथी, रूढ़िवादी जैसे शब्दों के क्या अर्थ रह गये हैं आज?

 

कुछ दिन पहले जब दक्षिण सूडान में सरकारी सिपाहियों से लड़ने वाले क्राँतिकारियों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के दस अफ्रीकी शांतिरक्षकों को निर्ममता से मार डाला तो लोग बौखला गये। जब भी सूडान की बात होती है तो यही बताया जाता है कि इस लड़ाई में एक तरफ दमन और अत्याचार करने वाले सरकारी सिपाही हैं और दूसरी ओर उनके दमन से मरने वाले निहत्थे लोग । पर जब वह "निहत्थे लोग" उतनी ही क्रूरता से शांतिरक्षकों पर वार करते हैं तो इस युद्ध में कौन सही है कौन गलत , हम इस युद्ध में किसका साथ दें, किसकी बात सुनें?

 

यही आज के सचमुच के समाज की जटिलता की चुनौती है। कुछ लोग कहते हैं कि हमें सरलीकरण से दुनिया को देखने की आदत को बदलना होगा , दुनिया जटिल है तो उस जटिलता को समझने की कोशिश करनी होगी, और रुढ़िवादी, वामपंथी, विकासशील, पिछड़ा जैसे लेबलों में कोई अर्थ नहीं बचे। पर इसमें यह खतरा भी है कि हम जानकारी की भूल-भुलैया में खो जायें और समझ नहीं पायें कि कौन सही है, कौन गलत, और क्या करना चाहिये। भारतीय लेखिका अरुंधती राय कुछ सप्ताह पहले इटली में एक सभा में इस विषय पर बोली थीं , "पहले मैं सोचती थी इंटरनेट का विकास दुनिया के दबे हुए लोगों में नयी क्रांति लायेगा, हम एक दूसरे से जानकारी बाँट सकते हैं, दुनिया में क्या हो रहा है यह जान सकते हैं। पर आज जानकारी ही पूँजीवाद है, जिसके पास जितनी जानकारी है उसी के पास ताकत है । और जानकारी जमा करने में हम लोग इस तरह जुटे हैं कि उस जानकारी के जंगल में खो गये हैं। शायद इससे विपरीत दिशा में जाने की आवश्यकता है । मैंने नर्मदा घाटी के विरोध में लगे कुछ समुदायों को देखा है, उनसे बात की है। वह कहते हैं कि हमें कुछ नहीं सुनना । हमें जानकारी नहीं चाहिये, हमें कुछ नहीं जानना या सोचना, हमने फैसला कर लिया कि हम अपनी धरती नहीं देंगे, चाहे कुछ भी हो जाये, चाहे हमारी जान ही क्यों न चली जाये। आज शायद हमें इसी सरलता की ओर लौट जाने की आवश्यकता है ।"

सरलता की ओर वापस जाने का कहना तो आसान है पर जाना कठिन। आज के ईमेल, इंटरनेट, टेलीविजन के युग में जानकारी से आँखें मूँद लेना संभव नहीं और जानकारी हो तो दुनिया की जटिलता की समझ तो बढ़ेगी ही । शायद भविष्य के जननेता वही होंगे जो उस जटिलता की गाँठें खोल कर उसके भीतर छिपे सही गलत के अंतर को जन सामान्य को समझा सकेंगे।

सुनील दीपक

Bologna, Italy  

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