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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। इन दिनों ।।

 

 

अपनी खुशी अपना गर्व


विश्वनाथ सचदेव

 

हमदाबाद में रहने वाले मेरे वे मित्र उन दिन गदगद थे, बार-बार अपने बाएँ हाथ से दाएँ हाथ को सहला रहे थे। उस दिन वे सुनीता विलियम से हाथ मिलाकर आए थे। अंतरिक्ष से हाथ मिलाकर आया हूँ, उन्होंने कहा था और फिर जैसे छाती फुलाते हुए बोले थे, सुनीता हमारे गुजरात की है। उनका यह उत्साह देखने लायक था। सच तो यह है कि अंतरिक्ष बाला सुनीता को लेकर सारा भारत उत्साह में है। सुनीता भारतीय भले ने हो, लेकिन उनके अनुसार, भारतीय मूल की है। सुनीता जन्मी-पली अमेरिका में ही है, लेकिन मेरे उत्साही मित्र और हम सब भारतीयों के लिए यह जानना गर्व का विषय है कि सुनीता विलियम्स के पिता भारतीय हैं और हम सब इस बात से गदगद थे कि अंतरिक्ष में जाने के बाद सुनीता ने अपने दादा-परदादा की धरती पर आना ज़रूरी समझा।

 

हमें सिर्फ सुनीता पर ही गर्व नहीं है। बॉबी जिंदल की उपलब्धियाँ भी हमें अपनी लगती हैं। जिन्दल अमेरिका के लुधियाना राज्य के गवर्नर नियुक्त हुए हैं, और हम खुश हैं कि वे पहले भारतीय मूल के नहीं, पहले अश्वेत हैं जो अमेरिका के किसी राज्य में चुनाव जीतकर गवर्नर बने हैं, यह बात दूसरी है कि भारतीय मूल का अर्थ उनके संदर्भ में इतना ही है कि उनके पूर्वज भारत से अमेरिका गए थे, स्वयं बॉबी तो जन्मे भी वहीं, पले भी वहीं, भारत उन्होंने देखा भी नहीं है। पर हम तो देख रहे हैं न कि एक भारतवंशी अमेरिका राज्य का गवर्नर बना है। गर्व की इसी भावना के साथ हमने संजय मालाकार को अमेरिकी आइडल बनने के करीब पहुँचते देखा था। ऐसा ही कोई सुख हमें तब भी मिला था जब सर नायपॉल को नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ था। लेकिन सवाल उठता है भारतीय नाम के अलावा यह सब कितने भारतीय हैं ? सवाल यह भी उठता है कि इस प्रकार की छद्य राष्ट्रवादिता के लिए कितना स्थान होना चाहिए हमारे जीवन में? ऐसी उपलब्धियों में यदि हम भारत की उपलब्धि देखने लगे अथवा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक मानने लगें, इन्हें तो इसे एक ऐसी भावुकता ही कहा जाएगा जो अच्छी लगती तो है, पर अच्छी है नहीं।

 

भावुकता से उठकर

आवश्यकता इस भावुकता से कुछ ऊपर देखने-समझने की है, कोई सुनीता या कोई बॉबी भारतीय नाम का भले ही हो, पर है वह उसी देश का जहाँ वह जन्मा पला। उनके होने में भले ही भारतीय जीन्स का हाथ हो, लेकिन उन्हें बनाने में उसी देश का हाथ है जहाँ वे जन्मे पले हैं। इस दृष्टि से देखें तो सुनीता और बॉबी पर गर्व करने का पहला हक अमेरिका का ही है। एक बात और भी है। आज भले ही ऐसे उदाहरण कम देखें, वैश्वीकरण के दौर में आगे चलकर इस तरह के उदाहरणों की संख्या बहुत बढे़गी। सवाल किसी के मूल का नहीं होगा, सिर्फ प्रतिभा के होने और उसके विकास के अवसरों होगा। जो ज़मीन अच्छी होगी, जहाँ खाद-पानी भरपूर मिलेगा, वहीं पौधे पनपेंगे। उसी ज़मीन को उन पौधों पर गर्व भी होगा। हमारी प्रतीक्षा और हमारा गर्व। दोनों, इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम अपने पौधों को पनपने के कितने और कैसे अवसर देते हैं। वैसे, इस बात पर खुश होना स्वाभाविक लग सकता है कि किसी सुरीनाम या किसी मॉरिशस में कोई भारतवंशी राज कर रहा है। अपने किसी नायपॉल या किसी खुराना को अपनी उपलब्धियों के लिए विश्व-सम्मान मिला है। लेकिन खुश होने का स्वाभाविक हक तो हमें तभी मिलेगा जब कोई भारतीवासी विश्व-सम्मान पाने का हकदार बनेगा।

 

उपलब्धियों पर पुर्नविचार

सवाल यह है कि इस दिशा में हम क्या कर रहे हैं ? शिक्षा मे, वैज्ञानिक अनुसंधान में, व्यापार में, खेलों में, कृषि में। उद्योग में, जीवन के जितने भी क्षेत्र हैं, उन सबमें भारतीय प्रतिभाओं को विकसित होने के अवसर बनाने में हमने क्या किया है ? पौधे के विकास के लिए ज़रूरी जिस खाद मिट्टी की जरूरत होती है, उसका रिश्ता इन्हीं बातों से है। यह सवाल हमारे ज़हन में उठना ही चाहिए कि शिक्षा और सोच के क्षेत्र में, संभावनाओं और अवसरों के संदर्भ में हमने पौधों के पनपने की कितनी और कैसी तैयारी की है। किसी सुनीता अथवा बॉबी पर गर्व करना गलत नहीं है, आखिर वे मानवीय उपलब्धियों के प्रतीक हैं, लेकिन यदि हम इस गर्व को अपनी अस्मिता और अपनी पहचान से जोड़ना चाहते हैं तो हमें यह बात समझनी ही होगी कि हम उनसे प्रेरण तो ले सकते हैं, लेकिन स्वयं को उनसे जोड़कर एक झूठी खुशी ही हासिल करेंगे। मेरे एक पत्रकार मित्र इसे उधार की खुशी कहते हैं। ईमानदारी का तकाज़ा है कि हम इसे लौटाने के प्रति भी सजग रहें-यही सजगता अपनी खुशी को प्राप्त करने के लिए भी ज़रूरी है।

 

ज़रूरी इस दिशा में एक जीवंत संक्रियता भी है। यही सजगता और सक्रियता हमें संभावनाओं को साकार करने के योग्य बनाएगी-अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने की चुनौतियों को स्वीकार करने के योग्य बनाएगी। हमारी उपलब्धियाँ तब आकाश छुएंगी जब कोई सुनीता भारत में जन्मेगी, भारत में बनेगी; जब कोई बॉबी भारत की मिट्टी में पल-बढ़कर अपनी क्षमताओं के विस्तार को बातों में ले जाएगी। हमें इसी दिशा में सोचना है, इसी दिशा में बढ़ना है। इस दिशा में जो मंज़िल मिलेगी, वह असली सुख होगा, गर्व करने का सही कारण भी।

  विश्वनाथ सचदेव

संपादक, नवनीत, मुंबई

 

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