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इस अंक में पढ़िये
कविताएँ
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त्रिलोचन
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नीलाभ
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कुमार अंबुज
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विश्वरंजन
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प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज'
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विपिन चौधऱी
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सीमा सोनी

छंद
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माह के छंदकार
-
राज मलकापुरी
की ग़ज़लें
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नवगीत -
सोम ठाकुर,
महेश
संतोषी,
श्यामलाल‘शमी’,
डॉ.यथोधरा
राठौर, यश
मालवीय
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दोहा -
अरुण मित्तल
'अद्भुत'
के दोहे

भाषांतर
पंजाबी
उपन्यास
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रेत
-
हरजीत अटवाल - अनुवादः सुभाष नीरव - भाग
3
बुआ ही मुझे बताती कि कितने जोर-शोर से
मेरे लिए लड़का ढूँढ़ा जा रहा था। जहाँ कहीं कोई बताता,
डैडी और ताऊ जी कार लेकर दौड़ पड़ते। पर
कोई भी लड़का उन्हें पसन्द नहीं आ रहा था। बुआ बड़े प्यार से
मेरी गाल पर हाथ फेरते हुए कहती,
“हमारी
बेटी के लिए तो कोई राजकुमार ही चाहिए।"....

व्याकरण
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एक शब्द -
कान
-
डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया

संस्कार
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आलोचक की
भूमिका
-
अशोक वाजपेयी
लेखक
के मुकाबले आलोचक की हर साक्षात्कार दुहरा साक्षात्कार
होता है। वह साहित्य का सामना करता है, इसमें रसे-बसे
जीवन का और सीधे जीवन का भी। वह आलोचक बेकार है जिसके
लिए साहित्यानभव जीवनानुभव-जैसा उत्कट, ऐंद्रिय और सच
न हो।....
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एक नये समीक्षक को
सलाह(पाँचवा भाग)
-
जार्ज बर्नार्ड शॉ

मूल्याँकन
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दुःख
की बदली ही नहीं चिंतन का सागर भी-डॉ. उर्मिला शुक्ल
निराला
की तरह महादेवी जी का गद्य साहित्य भी अपने समय से आगे की बात
कहता है। श्रृंखला की कडियाँ में महादेवीजी स्त्री पराधीनता के
कारणों को न केवल
तलाशती हैं वरन समाधान भी देती हैं और ऐतिहासिक साक्ष्यों को
आधार बनाकर स्त्री स्वातंत्र्य की हिमायत करती हैं।....

विचार
वीथी
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समय, समाज और
सरोकार
-
संजय द्विवेदी
‘देह
और भोग’
के सिद्धांतों पर चलकर मुक्ति की तलाश भी बेमानी है।
भारतीय चेतना में मनुष्य अपने समय से संवाद करता हुआ
आने वाले समय को बेहतर बनाने की चेष्टा करता है। वह
पीढ़ियों का चिंतन करता है, आने वाले समय को बेहतर
बनाने के लिए सचेतन प्रयास करता है। जबकि बाजार का
चिंतन सिर्फ आज का विचार करता है।....
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प्रगतिशीलता के नाम पर रिश्तों की तिज़ारत- नासिरा शर्मा
(वरिष्ठ कथाकार की
महिला-विमर्श पर खास आलेख)

प्रसंगवश
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तसलीमा नसरीन से कौन डरता है?
-
संजय द्विवेदी
लेखन
को लेखन के स्तर पर ही काटा जाना चाहिए। किसी भी संवाद
का जवाब विवाद नहीं होता,
किसी भी लेखन का जवाब लेखक का सर नहीं
होता। लेखक अपने समय के सच को अपनी नजर से व्याख्यायित
करता है। यह ज़रूरी नहीं कि दूसरे भी उस विषय वस्तु को
उसी ही नज़र से देखें या सहमत हों। तसलीमा से सहमत
होना ज़रूरी नहीं है।....

कथोपकथन
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वरिष्ठ
लघुकथाकार अशोक लव से बातचीत-
सत्यप्रकाश
कवि
सम्मेलनी कवियों की मानसिकता देखकर वितृष्णा हो गई। मंचों पर बड़ी-बड़ी
आदर्शों की रचनाएँ पढ़ने वाले कुछ कवि व्यावहारिक जीवन मे निकृष्टतम
निकले । कुछ दुकानदारी मानसिकता के निकले। कवि-सम्मेलन जोड़-तोड़ के
कवियों के योग्य ही रह गए हैं। बहुत कम कवि ही सम्मानपूर्वक जी रहे
हैं।
लोक-आलोक
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हाय
!
नर्मदा क्वांरी रह गईं जी -
डॉ. विमल कुमार पाठक

बचपन
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दो
बाल कविताएँ -
भावना कुँअर

शेष-विशेष
(हमारे
नियमित स्तम्भकार)
इन दिनों....
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अपनी खुशी अपना गर्व
-
विश्वनाथ सचदेव
जीवन के रंग...
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कौन याद करता है हिचकियाँ
समझती हैं
-
किशोर दिवसे
तकनीक...
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बालेन्दु का कारगर
यूनिकोड विकृति संशोधक
-
प्रशांत रथ
परदेश की
सांस्कृतिक डायरियाँ...
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इटली से -
सुनील दीपक
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मॉरीशस की डायरी -
विनय
गुदारी
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नेपाल की चिट्ठी -
कुमुद अधिकारी
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न्यूजीलैंड की चिट्ठी
-
रोहित कुमार
‘हैप्पी’
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अमेरिका की
धऱती से -
लावण्या शाह
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आईना
-
राहुल उपाध्याय

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