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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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इस अंक में पढ़िये

कविताएँ

त्रिलोचन नीलाभ कुमार अंबुज विश्वरंजन

प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज' विपिन चौधऱी  सीमा सोनी

 

 

छंद

माह के छंदकार - राज मलकापुरी की ग़ज़लें

नवगीत - सोम ठाकुर, महेश संतोषी, श्यामलालशमी, डॉ.यथोधरा राठौर, यश मालवीय

दोहा - अरुण मित्तल 'अद्भुत' के दोहे

 

 

 भाषांतर

पंजाबी उपन्यास

रेत - हरजीत अटवाल - अनुवादः सुभाष नीरव - भाग 3

बुआ ही मुझे बताती कि कितने जोर-शोर से मेरे लिए लड़का ढूँढ़ा जा रहा था। जहाँ कहीं कोई बताता, डैडी और ताऊ जी कार लेकर दौड़ पड़ते। पर कोई भी लड़का उन्हें पसन्द नहीं आ रहा था। बुआ बड़े प्यार से मेरी गाल पर हाथ फेरते हुए कहती, “हमारी बेटी के लिए तो कोई राजकुमार ही चाहिए।"....

   

 

व्याकरण

एक शब्द - कान - डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया

 

 

संस्कार

आलोचक की भूमिका - अशोक वाजपेयी

लेखक के मुकाबले आलोचक की हर साक्षात्कार दुहरा साक्षात्कार होता है। वह साहित्य का सामना करता है, इसमें रसे-बसे जीवन का और सीधे जीवन का भी। वह आलोचक बेकार है जिसके लिए साहित्यानभव जीवनानुभव-जैसा उत्कट, ऐंद्रिय और सच न हो।....

एक नये समीक्षक को सलाह(पाँचवा भाग)  - जार्ज बर्नार्ड शॉ 

 

मूल्याँकन

दुःख की बदली ही नहीं चिंतन का सागर भी-डॉ. उर्मिला शुक्ल

निराला की तरह महादेवी जी का गद्य साहित्य भी अपने समय से आगे की बात कहता है। श्रृंखला की कडियाँ में महादेवीजी स्त्री पराधीनता के कारणों को न केवल  तलाशती हैं वरन समाधान भी देती हैं और ऐतिहासिक साक्ष्यों को आधार बनाकर स्त्री स्वातंत्र्य की हिमायत करती हैं।....

 

विचार वीथी

समय, समाज और सरोकार - संजय द्विवेदी

देह और भोग के सिद्धांतों पर चलकर मुक्ति की तलाश भी बेमानी है। भारतीय चेतना में मनुष्य अपने समय से संवाद करता हुआ आने वाले समय को बेहतर बनाने की चेष्टा करता है। वह पीढ़ियों का चिंतन करता है, आने वाले समय को बेहतर बनाने के लिए सचेतन प्रयास करता है। जबकि बाजार का चिंतन सिर्फ आज का विचार करता है।....

प्रगतिशीलता के नाम पर रिश्तों की तिज़ारत- नासिरा शर्मा

(वरिष्ठ कथाकार की महिला-विमर्श पर खास आलेख)

 

प्रसंगवश

तसलीमा नसरीन से कौन डरता है? - संजय द्विवेदी

लेखन को लेखन के स्तर पर ही काटा जाना चाहिए। किसी भी संवाद का जवाब विवाद नहीं होता, किसी भी लेखन का जवाब लेखक का सर नहीं होता। लेखक अपने समय के सच को अपनी नजर से व्याख्यायित करता है। यह ज़रूरी नहीं कि दूसरे भी उस विषय वस्तु को उसी ही नज़र से देखें या सहमत हों। तसलीमा से सहमत होना ज़रूरी नहीं है।....

कथोपकथन

वरिष्ठ लघुकथाकार अशोक लव से बातचीत- सत्यप्रकाश

कवि सम्मेलनी कवियों की मानसिकता देखकर वितृष्णा हो गई। मंचों पर बड़ी-बड़ी आदर्शों की रचनाएँ पढ़ने वाले कुछ कवि व्यावहारिक जीवन मे निकृष्टतम निकले । कुछ दुकानदारी मानसिकता के निकले। कवि-सम्मेलन जोड़-तोड़ के कवियों के योग्य ही रह गए हैं। बहुत कम कवि ही सम्मानपूर्वक जी रहे हैं।

लोक-आलोक

हाय ! नर्मदा क्वांरी रह गईं जी - डॉ. विमल कुमार पाठक

 

बचपन

दो बाल कविताएँ - भावना कुँअर

 

शेष-विशेष

(हमारे नियमित स्तम्भकार)

इन दिनों....

अपनी खुशी अपना गर्व - विश्वनाथ सचदेव

जीवन के रंग...

कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं - किशोर दिवसे

तकनीक...

बालेन्दु का कारगर यूनिकोड विकृति संशोधक - प्रशांत रथ

परदेश की सांस्कृतिक डायरियाँ...

इटली से - सुनील दीपक

मॉरीशस की डायरी -  विनय गुदारी

नेपाल की चिट्ठी - कुमुद अधिकारी

न्यूजीलैंड की चिट्ठी - रोहित कुमार हैप्पी

अमेरिका की धऱती से - लावण्या शाह

आईना - राहुल उपाध्याय

      

संपादकीय

घर में संसार - जयप्रकाश मानस

जिसका घर नहीं होता, उसका पड़ोस नहीं होता । जिसका पड़ोस नहीं होता, उसकी बस्ती नहीं होती । जिसकी बस्ती नहीं होती, उसका गाँव नहीं होता । जिसका गाँव नहीं होता, उसका संसार नहीं होता, भले ही वह संसार में क्यों न हो । ऐसे लोगों की हथेलियों में ठौर-ठिकाने की रेखाएँ क्षीण होती हैं । सुबह यहाँ, शाम न जाने कहाँ ! यह यायावरों के लिए नियति और साधु-सन्यासियों की नियति हो सकती है, पर मैं ठहरा कुटुंबी ।...

 

ललित निबंध

चन्द्रमा मनसो जातः - शिवप्रसाद सिंह

असल में चन्द्रमा सृष्टि का इतना महत्त्वपूर्ण तत्त्व है कि इसकी उपेक्षा की ही नहीं जा सकती। सूर्य और चन्द्र या सोम इन्हीं दो तत्त्वों के विमर्श, संघर्ष और समन्वय से सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है। सोम तत्त्व बहुत ही महत्त्वपूर्ण दार्शनिक पारिभाषिक शब्द है। यह सामान्यतया शीतलता, जल, दुग्ध, औषधि- जैसे स्थूल तथा ममता, दया, वात्सल्य, शालीनता यानी तमाम सौकुमार्य जैसे सूक्ष्म तत्त्वों का स्त्रोत है।........

आज मुझे तुलसी बहुत याद आते हैं - विजय कुमार दुबे

 

कहानियाँ

इस बार चौदह रचनाओं के साथ

उड़ान - रूपसिंह चन्देल

उसका सौंदर्य व्यतीत की बात हो चुकी थी। पत्र-विहीन पुराने दरख्त की भांति वह सामने थी । आँखों के नीचे गहरे नीले धब्बे, सूखा-सिकुड़ा चेहरा, पिचका शरीर, धूसर-सीमित छोटे बाल...मैं कैसे पहचान सकता था ! कभी विश्वविद्यालय कर्मचारियों में अपने सौदर्य के लिए चर्चित रही कोई युवती बावन वसंत में इतना-ढल-गल जायेगी, असोचनीय था ।....

एक और सुदामा - सुषमा मुनीन्द्र

एक सीधी - सादी परिपूर्ण जिंदगी - बिंदु भट्ट

एकाग्र - कहानीकार डॉ. बलदेव की 11 कहानियाँ एक साथ

(मंगलू चोर, अव्वल दर्जे का धूर्त, गाँव, राजा साहब, बलवा, रेड़, भैंस,  नया आश्रम, बूढ़ा देव का कोप, केंचुल, जोर-ज़मीन का)

 

लघुकथाएँ

तमाशा और लोग - कैलाश वनवासी

नल और नाला - आनंद बहादुर

और वह - रूप देवगुण

रिटायर्ड - डॉ. मधु सन्धु

 

व्यंग्य

बेताल कथा - सुयोग्य वित्तमंत्री - गिरीश पंकज

 

 

कृति-समीक्षा

आँखन देखी / दुर्गाप्रसाद अग्रवाल/

है यहाँ भी जल /विजय सिंह नाहटा / देवी नागरानी

 

 

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)

कविता कोश - ललित कुमार

सर्वेश्वरदयाल और उनकी पत्रकारिता -शोध- संजय द्विवेदी

सैरन्ध्री - खंडकाव्य - मैथिलीशरण गुप्त

 होना ही चाहिए आँगन  - कविता - जयप्रकाश मानस

प्रिय कविताएँ - भगत सिंह सोनी

 

 

हलचल

(देश-विदेश की प्रमुख सांस्कृतिक गतिविधियाँ )

पुस्तकों की थोक ख़रीदी हेतु लेखकों की प्रविष्टियाँ आमंत्रित

अमेरिका के वेंकटेश शुक्ला को अप्रवासी सम्मान

पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

श्री डूंगरगढ में 1857 की क्रांति पर केन्द्रित सेमिनार सम्पन्न

महाकवि कालिदास के ग्रंथों का पद्यानुवाद

रद्दी में भी साहित्य का साक्षात्कार - पद्मश्री रमेश चंद्र शाह

श्वेत पक्ष हैं आत्मकथाएँ, श्याम पक्ष है ''मधुशालाएँ''

छत्तीसगढ़ी के लिए संघर्ष अभी प्रारंभ हुआ है-पवन दीवान

फिजी में सभी स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई अगले साल से शुरु

न्यूयार्क में बहुभाषी कवि सम्मेलन संपन्न