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रद्दी में भी साहित्य का साक्षात्कार- पद्मश्री
रमेश चंद्र शाह
रायपुर
। भोपाल निवासी,ख्याति लब्ध
हिंदी कवि, आलोचक, चिंतक और ललित निबंधकार पद्मश्री रमेश चंद्र
शाह ने कहा कि उनका साहित्य से साक्षात्कार उस समय हुआ जब
उन्हें रद्दी के ढेर में भारत-भारती मिली। प्रेस क्लब में
आयोजित कविता पाठ कार्यक्रम के दरमियान उन्होंने इस बात का
खुलासा किया । उन्होंने कविता को समग्र भावों की अभिव्यक्ति
बताते हुए कहा कि जो कवि अपनी रचना से स्वयं चकित नहीं होता वह
अपने श्रोताओं को इसकी अनुभूति नहीं करा सकता है । उन्होंने
अपने बचपन की स्मृतियों का ज़िक्र करते हुए बताया कि उनके पिता
की आँखों में साहित्य की चरम अनुभूति के प्रत्यक्ष दर्शन तब
हुए जब वे प्रेमचंद की कृति रंगभूमि को वापस करने उनके पास आए
थे । इस अवसर पर श्री शाह ने अपने जीवन, समय, लक्ष्य, कविकर्म
के बारे में भी विस्तार से बताया ।
कविता के मंचन के बारे में उनका अभिमत
था कि कविता का अर्थ खुला रहता है जबकि कविता के मंचन से उसका
दायरा सँकरा हो जाता है । इस दृष्टि से कविता का मंचन सदैव
सार्थक हो यह आवश्यक नहीं है । गीता को महानतम् काव्य बताते
हुए उन्होंने कहा कि आज भी मंदिरों के पुस्तकालय में गीता जैसे
धार्मिक काव्य के साथ व्यवहारिक ज्ञान की पुस्तक हितोपदेश भी
मिल जाती है ।
श्री शाह ने पश्चिमी साहित्य और भारतीय
साहित्य को समकालीन बताते हुए इसके पास आने की बात भी कही ।
भारतीय साहित्य को इससे अभिभूत बताया । अपने काव्य-पाठ में
उन्होंने अपनी प्रथम कविता
‘तुम्हारी
कहानी’
और
‘दोस्त’,
‘कामवाली’,
‘कछुए
की पीठ’,
‘एलीजी’,
‘हज़रतनुंह’,
‘चिंता’,
‘स्मरण’,
‘नामकाट’,
‘उसने
कहा’,
‘तीन
समाचार’,
‘कवि’,
‘काम
की बात’,
‘एक
अकस्मात’,
‘पुकार’,
‘कोई
नहीं छूता’
आदि चर्चित कविताओं से राजधानी के साहित्यिक बिरादरी का मन मोह
लिया ।
‘एकत्र’
के इस आयोजन में संस्था प्रमुख व आलोचक
राजेंद्र मिश्र, साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल, डॉ. शोभाकांत
झा आदि सहित बड़ी संख्या में राजधानी के बुद्धिजीवी,
साहित्यकार और पत्रकार मौज़ूद थे ।
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