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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। हलचल ।।

 

 

 

श्री डूंगरगढ में 1857 की क्रांति पर केन्द्रित राज्य स्तरीय सेमिनार सम्पन्न

 ऐतिहासिक व सांस्कृतिक पड़ताल का शिद्दत-भरा प्रयास

  बीकानेर।राजस्थान। राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, श्रीडूंगरगढ़ (बीकानेर) तथा राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में ''1857 की क्रांति'' पर केंद्रित दो दिवसीय राज्य स्तरीय सेमिनार का उद्धाटन 14 अक्टूबर, 2007 को स्थानीय सार्वजनिक पुस्तकालय सभागार में प्रात: 11 बजे हुआ ।  मंच पर आसीन अतिथियों डॉ. अजित गुप्ता, नंद भारद्वाज, प्रो. रजनीकांत पंत, डॉ. जीवन सिंह एवं संस्थाध्यक्ष श्याम महर्षि ने मा सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर सेमिनार को प्रारंभ किया । सेमिनार के प्रारंभ में स्वागताध्यक्ष लॉयन महावीर माली द्वारा अतिथियों व सम्भागियों का भाव मीना स्वागत किया गया ।

संस्थाध्यक्ष श्याम महर्षि ने संस्थानिक गतिविधियों का प्रगति ब्यौरा प्रस्तुत करते हुए सम्भागियों का आह्वान किया कि वे मन, कर्म व वचन से एकाकार होकर दो दिवस के विभिन्न सत्रों में होने वाली विशद् चर्चा में भाग लेकर सेमिनार को सार्थक व स्मरणीय बनाने में सहभागी बने ।

राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की सरस्वती सभा के सदस्य एवं सेमिनार संयोजक रवि पुरोहित ने दो दिनों में होने वाले विभिन्न सत्रों में होने वाले कार्यक्रमों, पत्र वाचनों का ब्यौरा देते हुए बताया कि सेमिनार मे समूचे राजस्थान से 5 दर्जन से अधिक इतिहासविद्, शिक्षाविद्, साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, विचारक, चिंतक व संस्कृतिकर्मी भाग ले रहे है ।

पुरोहित ने 1857 की क्रांति की तात्कालिक परिस्थितियों का संक्षिप्त परिदृश्य प्रस्तुत करने के बाद विषय-प्रवर्तन हेतु अलवर से आये इतिहासविद् व लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार डॉ. जीवन सिंह को आमंत्रित किया । 

डॉ. जीवन सिंह ने विषय प्रवर्तन के दौरान अपने उद्बोधन में कहा कि किसी सत्ता या संघ विशेष द्वारा लिखवाया जाने वाला इतिहास इतिहास न होकर स्मृति ग्रंथ या स्मारिका सदृश ही होगा ।  इस प्रायोजित लेखन में ऐतिहासिक परिदृश्यों की वास्तविकता का शुमार सम्भव नहीं हो सकता ।  इसलिए अंग्रेज़ इतिहासकारों द्वारा 1857 की क्रांति को महज एक सैनिक विद्रोह, धर्मान्धों का ईसाईयों के विरूध्द विद्रोह या बर्बरता व सभ्यता के बीच युध्द माना जाना उसकी आजीविका व परिस्थितिजन्य परिस्थितियों का परिणाम मात्र था ।  उन्होंने कहा कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के दौरान राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और सैनिक क्षेत्र में अनेक ऐसी प्रवृत्तिायों का उदय हुआ, जिन्होनें भारतीय जनता को कम्पनी के शासन का प्रबल विरोधी बना दिया ।  यही वह कारण था कि 1857 में भारतीय जनता की सहनशीलता व धैर्य चुक गया तथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में विद्रोह हुआ, जिसमें किसानों, कामगारों, कारीगरों, सैनिकों आदि हर वर्ग के लोगों में लाखों की तादाद में भाग लिया ।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि दूरदर्शन निदेशक नन्द भारद्वाज ने अँग्रेज़ इतिहासकार ट्रेवेलियन, लारेन्स, होम्स, ई.आर.रीज के विभिन्न व्यक्तव्यों के समानान्तर वीर सावरकर, भारतीय इतिहासकार अशोक मेहता, डॉ. आर.सी. मजूमदार के आधार तथ्यों का जिक्र करते हुए कहा कि 1857 की क्रांति से पूर्व जो संस्कृति अँग्रेज़ों ने नष्ट की, उसे क्रांति के समय पुन: समृद्ध बनाने व देश को समग्र रूप से सुदृढ़ करने के प्रयास किए गए।  उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान की देश के रूप में जो पहचान है, वह अँग्रेज़ों ने ही बनाया था ।  कालान्तर में सभ्यता का संचार हुआ, तभी भारत शक्ति के रूप में आज समूचे विश्व के समक्ष मौजूद है ।

जयपुर के प्रोफ़ेसर रजनीकांत पंत ने मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए कहा कि आदमी इतिहास के साथ पैदा होता है और इतिहास ही मौत के विरूद्ध सशक्त दस्तावेज साबित होता है ।  उन्होंने कहा कि 1857 की क्रांति के समय धर्म निरपेक्षता का जो स्वरूप हमें देखने को मिलता है । उस जैसा उदाहरण शायद अखिल ब्रह्माण्ड में और कहीं देखने को नहीं मिलेगा ।

अध्यक्षीय व्यक्तव्य देते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की अध्यक्षा डॉ. अजित गुप्ता ने कहा कि अतीत के पन्नों में भावी भारत की समृद्धि, सुरक्षा और सुदृढ़ता के मानक छुपे हुए हैं ।  इसलिए आज की पीढ़ी को हमारे इतिहास से रूबरू होकर सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरक्षण की दिशा में प्रयास करने चाहिये ।  यदि हम इसी तरह अर्थवाद की अंध दौड़ में भागते रहे तो हमारा वजूद संकट में पड़ जाऐगा । इसलिए आवश्यक है कि हम 1857 की क्रांति के समूचे परिदृश्य को हमेशा अपनी आों में सुरक्षित रखें । यदि हमने सांस्कृतिक विद्रूपवाद के इस दौर में इस मामले में जरा भी कताही बरती तो परिणाम बडे भयावह होंगे ।  डॉ. गुप्ता ने युवा शक्ति को आहवान किया कि वह 1857 की वह आग, वह शिद्दत, वह सजगता, वह साम्प्रदायिक सौहार्द और अपने वजूद की स्थापना व स्वातंत्र्य की वह सजगता आठों पहर, चौबीस घड़ी बनाये रखें ताकि भू-मण्डलीकरण की इस आपा-धापी में हमारी वैयक्तिक पहचान, राष्ट्रवाद की संवेदना और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखा जा सके ।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में 'राजस्थान साहित्य में 1857 की क्रांति' विषय पर साहित्यकार भवानी शंकार व्यास 'विनोद' ने पत्रवाचन किया ।  व्यास ने कहा कि क्रांति की लपटें किसी आमंत्रण-पत्र की प्रतीक्षा नहीं किया करती, वे तो स्वत: स्फूर्त होती है ।  जलजले तिथि देख कर नहीं आया करते ।  आजादी समर्पण भाव की माग करती है, आत्म समर्पण की नहीं ।  राजस्थान के विभिन्न साहित्यिक ग्रंथों का ज़िक्र करते हुए उन्होने कहा कि आऊवा की कीर्ति गाथा, कविवर बाकीदास और भरतपुर महिमा सदृश मूल्य समूचे राजस्थान साहित्य में भरे पड़े हैं ।

1857 के स्वातंत्र्य समर-सार्ध्दशती का विस्तृत विवरण देते हुए जयप्रकाश राजपुरोहित ने समग्र परिदृश्यों का विशद विवेचन किया ।  डॉ. अनिला पुरोहित, प्रो. चम्पा अग्रवाल, संजय पुरोहित, ब्रह्माराम चौधरी, संतोष विश्नोई आदि ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए ।  अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए डॉ. नरपतसिंह सोढ़ा ने राजस्थान साहित्य को क्रांति का अग्रदूता और साहित्यकारों को प्रेरक बताया ।  उन्होंने कहा कि राजस्थान की माटी में प्रेरणा स्वत: उद्भूत है और क्रांति काल में यही प्रेरणा समूचे देश में लहू बन कर बहने लगी थी ।  सत्र का संयोजन साहित्यकार सत्यदीप ने किया । 

 सेमिनार के प्रथम सत्र के बाद सभी सम्भागी आयोजक संस्था के निर्माणाधीन 'संस्कृति भवन' को देखने पहुचे।  भवन की भव्य छटा ने अतिथियों को अभिभूत कर दिया।

सेमिनार के दूसरे दिन 15 अक्टूबर 07 को प्रात: 9 बजे प्रारम्भ हुए सत्र में पत्र वाचन करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रणवीर सिंह (जयपुर) ने कहा कि क्रांति वर्ष के आते-आते राजस्थान के राजाओं ने ही नहीं, हिन्दुस्तान की 530 रिसायतों में राजाओं ने अपनी तख्तोताज़ को बचाने के लिए इज्जत, खुदी और वजूद को ईंस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों सौंप दिया । 

राजस्थान की देशी रियासतों में 1857 की क्रांति' विषय पर पत्रवाचन करते हुए सिंह ने कहा कि तारीख इस बात की गवाह है कि जो चिंगारी 57 में भड़की थी, वो आग आवाम की लगाई हुई थी ।  देशी राजा दूर से नजारा देखते रहें, मगर खुलकर मैदान-ए-जंग में नहीं आए ।  इसी सत्र में '1857 की क्रांति का प्रभाव' विषय पर पत्रवाचन करते हुए डॉ. भंवरसिंह सामौर ने कहा कि इस क्रांति की बदौलत सत्ता ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथो से निकल कर ब्रिटिश संसद के हाथ में आ गई ।  इससे सर्वप्रथम देश का इतिहास प्रभावित हुआ ।  देश के इतिहास का बहाना बना कर अँग्रेज़ों ने दो तरह से हमारे इतिहास पर हमला किया ।  सामोर ने कहा कि क्रांति के बाद देश में किसान आन्दोलन की नींव पड़ी और इसी वैचारिक क्रांति ने देश में सात्विक विचार का व्यापक परिदृश्य और पृष्ठभूमि तैयार करने में अहम् भूमिका निभाई

इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए पुरातत्वविद् डॉ. गिरिजाशंकर शर्मा ने कहा कि क्रांति से सम्बन्धित हमारा अधिसंख्य इतिहास दर्शन लोक मान्यताओं पर आधरित है ।  इसी कारण पुरा-अभिलेखीय पुष्टि का अभाव हमारे समग्र चिंतन को प्रभावित करता है ।  डॉ. शर्मा ने कहा कि तथ्यान्वेषी व सत्यान्वेषी अभिलेखीय साक्ष्यों के आलोक में वैचारिक पुनर्सरंचानाएं नवीन जीवन मूल्यों का दिग्दर्शन करवा सकती है ।  सत्र संयोजन संजय आचार्य 'वरूण' ने किया ।

समापन सत्र में मुख्य अतिथि जनकवि हरीश भादानी ने कहा कि इतिहास को जानने के लिए उसे समझना होगा । 1857 की क्रांति में योगदान देने वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व व कृतित्व को आगे लाना होगा। उन्होंने उपनिषदों व वेदों में समाहित प्रक्षेपण को नहीं पहचानने पर चिंता प्रकट की ।  उन्होंने बताया कि हमने उपभोक्तावाद को पूरी तरह नहीं समझा है । अध्यक्षता करते हुए विद्यासागर शर्मा (गंगानगर) ने कहा कि आजादी की सम्पूर्ण लड़ाई सामाजिकता व संस्कृति की लड़ाई थी । 1857 की क्रांति पूर्णरूपेण सुनियोजित थी । इस क्रांति से जन मानस की विजय हुई । इस पर हमें आत्म विश्लेषण करना होगा । अखिल भारतीयवाद आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है । विशिष्ट अतिथि लोकमत के सम्पादक अशोक माथुर ने कहा कि अँग्रेज़ों द्वारा खेती में तथा किसानों के जीवन में दखल देना सम्भवतया क्रांति का बीज था । नागरिकों की एकता को विभाजित करने की नीति से अँग्रेज़ों ने भारत की शांति को छीना । देश व राजस्थान की माटी में शक्ति का संचार है, परन्तु उसे कुचला जा रहा है । खेती पर आए संकट पर चिंता प्रकट करते हुए कहा कि यह भारत की सम्पूर्ण प्रगति व विकास में सबसे बड़ी बाधा है । उपध्यानचंद कोचर ने 1857 की क्रांति को स्वाभिमान की लड़ाई बताया । उन्होंने क्रांति के समस्त पहलुओं पर चिंतन करने तथा स्वाभिमान को आत्मसात करने का आहवान किया । इस अवसर पर मरूभूमि शोध संस्थान की ओर से प्रकाशित 'ख्यात' पत्रिका का लोकार्पण जनकवि हरीश भादानी, प्रो. विद्यासागर शर्मा (गंगानगर) व दैनिक लकमत के सम्पादक अशोक माथुर ने किया। अंत में संस्था अध्यक्ष श्याम महर्षि ने इस दो दिवसीय संगोष्ठी का आगे भी अनुसरण करने की बात कही। आंगतुकों का आभार मंत्री सत्यदीप ने प्रकट किया एवं संचालन रवि पुरोहित ने किया ।

-रवि पुरोहित, 397, कैलाशपुरी, बीकानेर (राज.) की रिपोर्ट

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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