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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। व्याकरण ।।

 

 

एक शब्द

कान


डॉ.गंगा प्रसाद बरसैंया

 

ह एक विचारणीय तथ्य है कि भगवान ने सभी जीव-जन्तुओं को दो-दो कान दिये हैं जब एक से भी काम चल सकता था। इस दृष्टि से उतने सारे कानों का अपव्यय हुआ। कहा जाता है कि भगवान ने कोई चीज़ बेकार नहीं बनाई। असल में इसके दो उद्देश्य हो सकते हैं-एक कान खराब हो जाये तो दूसरे से काम चलाया जा सके अथवा जो बात नहीं सुननी उसे इस कान से सुनकर उस कान से निकाला जा सके, यानी अनसुनी कर दी जाये। लोग कहते भी हैं इस कान से सुनकर उस कान से उड़ा दिया। वैसे महत्वपूर्ण बात को कान देकर सुनना और गलत बातों पर कान न देना, अनसुनी करना समझदारों का स्वभाव होता है। कहा जाता है कि जहाँ किसी की निंदा या बुराई हो रही हो तो भले आदमी को कान मूँद लेना चाहिये- कान मूंदि नतु चलिय पराई। कई बातें कानों-कान एक से दूसरे तक पहुँच जाती है। फैल जाती है और लोग अपने-अपने तर्क करते हैं जबकि कई बातों की कानो-कान ख़बर तक नहीं होती । पता ही नहीं चलता। बहुत सारे ऐसे प्रकरण होते हैं जिन्हें लोग गुप्त रखते हैं, उजागर होने से बचाते हैं । कानों-कान खबर तक नहीं होती। क्योंकि एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे कान तक बात पहुँची तो सार्वजनिक हो गई  ‘छठे श्रवणजो परै कहानी तो हानि होती है।

 

कान बड़े काम के होते हैं। वे सुनने के लिये ही नहीं अन्य कार्यों के लिए भी उपयोगी हैं। शिक्षक या वरिष्ठजन कोई भूल होने पर कान पकड़कर दंडित या सचेत करते हैं। भूल पता चलने पर पश्चातापवश हम स्वयं अपने कान पकड़ते हैं और संकल्प करते हैं कि अब ऐसी भूल न होगी। कान उस संकल्प के साक्षी बनते हैं। बार-बार मना करने पर यदि वही भूल हो तो लोग कान पकड़कर उठक-बैठक कराकर दंडित करते हैं। कान पकड़कर मुर्गा बनाते हैं। यहाँ भी अपराध की प्रवृत्ति रोकने की ही भावना है। कई लोग कान के बड़े कच्चे होते हैं, हर बात को सुनकर वैसा ही मान लेते हैं। अपनी बुद्धि, विवेक से कार्य नहीं करते । कान का कच्चा होना चिन्तन-शून्य, विवेक-शून्य व्यक्ति का लक्षण है। कई लोग इतने चतुर होते हैं कि अच्छे-अच्छों के कान काटते हैं। ऐसे कान काटने वालों से सावधान रहना है, किसी की कुछ सुनते ही नहीं ये कान काटने वालों से एकदम अलग हैं। न सुनने की बहाना बनाये रहते हैं। वैसे इस दुनिया में बहुत सारे कार्य अनचाहे भी करना पड़ता है, इसी को कहते हैंकान छेदाना पडे़गा और गुड़ खाना पडे़गा बच्चों के कान छेदने पर वे रोते हैं, वे इस कष्ट से बचना चाहते हैं, पर गुड़खिलाकर उन्हें फुसलाया जाता है क्योंकि कनछेदन ज़रूरी है।

 

गुरुजी गुरुमंत्र देते हैं, जैसे कान फूँकना कहा जाता है, यह अच्छी बात है पर काना-फूसी किसी को पसंद नहीं। इससे निरर्थक ग़लतफ़हमी उत्पन्न होती है। इधर की बात उधर जाती है।  ‘कान खोलकर सुनना का आशय है-अच्छी तरह से सुनना ताकि कोई भ्रम न हो। इसीलिये  कानों को बंद नहीं करना चाहिये । कान बंद होने से सुनना भी बंद हो जायेगी। कई बार तेज आवाज़ या दर्द से कान फटने लगते हैं। अब कान कोई कागज़ या कपड़ा तो हैं नहीं कि फट जायेंगे, पर मुहावरा बना सो चल रहा है। कभी-कभी वही-वही अप्रिय बात सुनने-सुनते कान पक गये। वैसे जब कान पकते हैं तो उससे कष्ट भी होता और बहरा होने का खतरा भी बना रहता है, लेकिन किसी की बातें सुनकर कानों का पकना कुछ और ही बात है। जहाँ हमारे कान अप्रिय बातों से बचते हैं वहीं प्रिय बातों को सुनने के लिए कान तरसते भी हैं। हम तुरन्त कहते हैं उनका गायन सुनने, उनकी बातें सुनने को कान तरस रहे हैं। उसके लिये कानों में उत्सुकता बनी रहती है जो जिज्ञासा का बोध कराती है। कई बार हम उधर ही कान लगाये रहते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे कान में कोई कीड़ा बुलबुला रहा है। यह उत्सुकता का ही कीड़ा है। कई लोगों के कान दूसरों की निंदा सुनने के लिए भी खुजाते रहते हैं । हमें इससे बचना चाहिए कोई कहे कि कौवा कान ले गया तो हमें उसे मानने की बजाय अपना कान टटोलना चाहिये।

  

हमें पूरा प्रयास करना चाहिए कि न तो कोई दूसरा हमारे कान पकड़े और न हमें स्वयं अपने कान पकड़ना पड़ें। दोनों बातें अच्छी नहीं हैं।

  डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

एम.आई.जी. 12

चौबे कॉलोनी, छतरपुर, मध्यप्रदेश 

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