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सृजनगाथा
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वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007
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।। नवगीत ।।
स्वाभिमानों के जले घर
हर जगह भवदीय हैं
या झूके सर हैं
लोग जैसे उड़ानों के
कटे पर हैं ।
जोड़ते हैं हाथ
घिघियाते हमेशा
दीनता भी हो गई है
एक पेशा
स्वाभिमानों के
जले से हुए घर हैं ।
हर समय दरबार की
संख्या बढ़ाते
काढ़ते हैं खीस
मुस्कानें काढ़ते
होठ अपना काटते से
सिर्फ़ डर हैं ।
साहबों के लिए ही
बंदे बने हैं
शब्द जैसे प्रार्थनाओं के
चने हैं
कहीं सप्तक हैं
कहीं पर मंद्र स्वर हैं ।
यश मालवीय
ए-111, मेंहदौरी,
इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश
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छंदकार
माह के छंदकार
राज मलकापुरी
- सच बोलने का तज़ुर्बा
- प्यार जताने को ग़ज़ल कहता हूँ
- पेड़ साया ज़ुदा नहीं करते
- हम तो शायर हैं
- करो वक़्त का इलाज़
नवगीत
सोम ठाकुर
महेश संतोषी
श्यामलाल ‘शमी’
डॉ. यथोधरा राठौर
दोहा
अरुण मित्तल 'अद्भुत'
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
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