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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। नवगीत ।।

 

 

पुश्तैनी हक़ उनका

 

एक ग़रीब दलित की बेटी

उठा ले गये गुंडे।

 

जोड़े हाथ, गिड़गिड़ायी

पर, तिलभर

माथ न ठनका

दुराचार फिर किया

कि जैसे

पुश्तैनी हक़ उनका

गाड़ दिये असहाय

देह पर

दुष्कर्मों के झंडे ।

 

कहने को अछूत थी

पर, वह

भारत की नारी थी

जहाँ उसे अपनी मर्यादा

जीवन से प्यारी थी

घूम रहे छुट्टे

फिर भी

प्रभु लोगों के मुस्टंडे ।

 

हुई शिकायत, जबरों ने

धन-बल से

साक्ष्य मिटाया

पंचायत, थाने, न्यायालय

कहाँ न्याय

मिल पाया ?

भस्म हुई अपमान-

चिता में

जला लकड़ियाँ-कंडे ।

श्यामलाल शमी

एस.ए.-143, शास्त्रीनगर

गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

  ◙◙◙

 

 छंदकार

माह के छंदकार

राज मलकापुरी

- सच बोलने का तज़ुर्बा

- प्यार जताने को ग़ज़ल कहता हूँ

- पेड़ साया ज़ुदा नहीं करते

- हम तो शायर हैं

- करो वक़्त का इलाज़

नवगीत

सोम ठाकुर

महेश संतोषी

श्यामलाल शमी

डॉ. यथोधरा राठौर

यश मालवीय

दोहा

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

 

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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