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परछाइयों के मेले
हम अकेले नहीं हैं अस्ताचल पर
साथ हैं परछाइयों के मेले हैं ।
दोपहरियों के दिये धुएँ-कब, कैसे
उम्र की शाम तक चले आये
किसी धुएँ से, किसी परछाई से पूछा जाए
वक़्त की दूरियाँ तो भी
पर अधूरा नहीं था कोई दर्द
कितने एक से लगे, जब हमने दर्द दोहराए
इन धुओं की उम्र भी है, क़द भी है
कई नामों से हैं ये, कई लकीरों में फैले हैं ।
परछाईयों के मेले हैं ।
आख़िरी अँधेरों की दस्तकों तक
हमने रोशनियों के सपने ढो लिये सच्चाईयों ढो लीं
व़क्त के आईने में जब पुराने चेहरे चमके
कभी हम रो दिये कभी परछाइयाँ रो दीं
शायद ये आख़िरी धुआँ है किसी पहले दर्द का
हमने तो सभी दर्द
बड़े सिलसिले से झेले हैं ।
परछाइयों के मेले हैं ।
महेश संतोषी
ई-2/284,
अरेरा कॉलोनी, भोपाल
मध्यप्रदेश – 452016
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