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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। ग़ज़ल ।।

 

 

परछाइयों के मेले

 

हम अकेले नहीं हैं अस्ताचल पर

साथ हैं परछाइयों के मेले हैं ।

 

दोपहरियों के दिये धुएँ-कब, कैसे

उम्र की शाम तक चले आये

किसी धुएँ से, किसी परछाई से पूछा जाए

वक़्त की दूरियाँ तो भी

पर अधूरा नहीं था कोई दर्द

कितने एक से लगे, जब हमने दर्द दोहराए

 

इन धुओं की उम्र भी है, क़द भी है

कई नामों से हैं ये, कई लकीरों में फैले हैं ।

परछाईयों के मेले हैं ।

 

आख़िरी अँधेरों की दस्तकों तक

हमने रोशनियों के सपने ढो लिये सच्चाईयों ढो लीं

व़क्त के आईने में जब पुराने चेहरे चमके

कभी हम रो दिये कभी परछाइयाँ रो दीं

शायद ये आख़िरी धुआँ है किसी पहले दर्द का

हमने तो सभी दर्द

बड़े सिलसिले से झेले हैं ।

परछाइयों के मेले हैं ।

   महेश संतोषी

ई-2/284, अरेरा कॉलोनी, भोपाल

मध्यप्रदेश – 452016

  ◙◙◙

 

 छंदकार

माह के छंदकार

राज मलकापुरी

- सच बोलने का तज़ुर्बा

- प्यार जताने को ग़ज़ल कहता हूँ

- पेड़ साया ज़ुदा नहीं करते

- हम तो शायर हैं

- करो वक़्त का इलाज़

नवगीत

सोम ठाकुर

महेश संतोषी

श्यामलाल शमी

डॉ. यथोधरा राठौर

यश मालवीय

दोहा

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

 

 

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