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हम तो शायर हैं
अपने माहौल का दामन नहीं बेचा करते
घर हो आबाद तो आँगन नहीं बेचा करते ।
ख़ार चुभ-चुभ के लहू चूस लें सारा लेकिन
हम वो माली हैं जो गुलशन नहीं बेचा करते ।
हम तो शायर हैं, सुनाते हैं एकता की ग़ज़ल
हरम-ओ-दैर की गुलशन नहीं बेचा करते ।
क़लम के वार से करते हैं झूठ को घायल
फ़न की तलवार का आहन नहीं बेचा करते ।
सर कटा कर भी जलाते हैं शहादत के चराग
हम वफ़ादारों का कुंदन नहीं बेचा करते ।
हम अपने ख़ूं से बुझाते हैं आग नफ़रत की
कभी फ़साद का इंधन नहीं बेचा करते
चोट खाकर भी दिया करते हैं ख़ुशबु सबको
अपने इख़्लाक का चंदन नहीं बेचा करते ।
टुकड़ों टुकड़ों में बिखर कर भी
‘राज’
सच बोले
झूठ जो बोले वो दर्पण नहीं बेचा करते ।
राज
मलकापुरी
तारिक मंज़िल, मीनार आर्ट
ओम नगर, जरहाभाटा, बिलासपुर
छत्तीसगढ़
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495001
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