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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। ग़ज़ल ।।

 

 

हम तो शायर हैं

 

अपने माहौल का दामन नहीं बेचा करते

घर हो आबाद तो आँगन नहीं बेचा करते ।

 

ख़ार चुभ-चुभ के लहू चूस लें सारा लेकिन

हम वो माली हैं जो गुलशन नहीं बेचा करते ।

 

हम तो शायर हैं, सुनाते हैं एकता की ग़ज़ल

हरम-ओ-दैर की गुलशन नहीं बेचा करते ।

 

क़लम के वार से करते हैं झूठ को घायल

फ़न की तलवार का आहन नहीं बेचा करते ।

 

सर कटा कर भी जलाते हैं शहादत के चराग

हम वफ़ादारों का कुंदन नहीं बेचा करते ।

 

हम अपने ख़ूं से बुझाते हैं आग नफ़रत की

कभी फ़साद का इंधन नहीं बेचा करते

 

चोट खाकर भी दिया करते हैं ख़ुशबु सबको

अपने इख़्लाक का चंदन नहीं बेचा करते ।

 

टुकड़ों टुकड़ों में बिखर कर भी राज सच बोले

झूठ जो बोले वो दर्पण नहीं बेचा करते ।

   राज मलकापुरी

तारिक मंज़िल, मीनार आर्ट

ओम नगर, जरहाभाटा, बिलासपुर

छत्तीसगढ़ 495001

 ◙◙◙

 

 छंदकार

माह के छंदकार

राज मलकापुरी

- सच बोलने का तज़ुर्बा

- प्यार जताने को ग़ज़ल कहता हूँ

- पेड़ साया ज़ुदा नहीं करते

- हम तो शायर हैं

- करो वक़्त का इलाज़

नवगीत

सोम ठाकुर

महेश संतोषी

श्यामलाल शमी

डॉ. यथोधरा राठौर

यश मालवीय

दोहा

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

 

 

 

 

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