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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। नवगीत ।।

 

 

 

दोहे प्यार भरे

 

सरल, सरस, सुन्दर, सहज, जीवन का आनन्द।

प्यार तुम्हारा यू बसा, ज्यों गुलशन में गंध

 

ना नजरों ने कुछ कहा, नहीं लबों का साथ।

फिर जाने हम किस तरह, समझ गए हर बात।

 

दिल तुझ तक ले जा रहा, मुझको हर पल खींच।

तडपाएगा कब तलक, परदा अपने बीच।

 

पहले सिमटी दूरिया, उपजा फिर विश्वास।

मुझको तुझमें मिल गया, अपना सा अहसास।

 

इक दूजे का हम अगर, बन जाए आधार।

हर मौसम मधुमास हों, हरसूं उठें बहार।

 

बदली सारी चाहतें, बदल गया व्यवहार।

डूबा तेरे प्यार में, भूला सब संसार।

 

तू भीतर की रोशनी, तू आगन की धूप।

दिखता है हर रूप में, मुझको तेरा रूप।

 

यादों की परिकल्पना, वादों का संसार।

अनुपम है ये साधना, अद्भुत है ये प्यार।

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

हरियाणा टिम्बर स्टोर

काठ मण्डी, चरखी दादरी

भिवानी, हरियाणा

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 छंदकार

माह के छंदकार

राज मलकापुरी

- सच बोलने का तज़ुर्बा

- प्यार जताने को ग़ज़ल कहता हूँ

- पेड़ साया ज़ुदा नहीं करते

- हम तो शायर हैं

- करो वक़्त का इलाज़

नवगीत

सोम ठाकुर

महेश संतोषी

श्यामलाल शमी

डॉ. यथोधरा राठौर

यश मालवीय

दोहा

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

 

 

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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