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सृजनगाथा
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वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007
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।। बचपन ।।
चंकी बंदर
चंकी बन्दर बड़ा शैतान
रोज उमेठे सबके कान।
रामू ने फिर जुगत लगाई
चंकी की कर दी कुडमई।
अब चंकी जी मुँह छिपाये
मेम साहब से कान खिंचाये।
सजी पकृति
सूरज चमक रहा है खूब़
मोती माला पहने दूब।
रंगबिरंगे कपड़े पहने
फूलों के भी क्या हैं कहने।
झरनों को भी है वरदाऩ
गायें सदा वो मीठा गान।
भावना, कुँअर
कंपाला, युगांडा
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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
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