vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। अपनी बात ।।

 

 

 

 ।। घर में संसार ।।

जिसका घर नहीं होता, उसका पड़ोस नहीं होता । जिसका पड़ोस नहीं होता, उसकी बस्ती नहीं होती । जिसकी बस्ती नहीं होती, उसका गाँव नहीं होता । जिसका गाँव नहीं होता, उसका संसार नहीं होता, भले ही वह संसार में क्यों न हो । ऐसे लोगों की हथेलियों में ठौर-ठिकाने की रेखाएँ क्षीण होती हैं । सुबह यहाँ, शाम न जाने कहाँ ! यह यायावरों के लिए नियति और साधु-सन्यासियों की नियति हो सकती है, पर मैं ठहरा कुटुंबी । मेरे लिए घर से बढ़कर कोई नियामक नहीं, घर से बड़ा कोई नियामक नहीं । बुध्दि समूची पृथ्वी को घर मानने को तैयार है, विवेक का कबीर भी घर जारने के लिए सहमत हुआ जाता है, पर मन का क्या करूँ ? वह है कि जब-तब घर में जा रमने लगता है । ऐसे में अथर्ववेदी आवाहन का मधुर गान कानों में गूँजने लगता है :

येषामध्येति प्रवसन् येषु सौमनसो बहु:

गृहानुपह्वयाम यान् ते नो जानन्त्वासत:

(प्रवास में रहते हुए हमें जिनका बराबर ध्यान आया करता है, जिनमें सहृदयता की खान है, उन घरों का हम आवाहन करते हैं। ये बाहर से आये हुए हमको जानें)


दरअसल मन एक विहंग है और घर आत्मीय डाल-डगालियों से लदी संपन्न तथा बारहमास फलने-फूलने वाला निरापद गाछ । उड़ान चाहे कितनी ऊँची न हो, अनचीन्हे आकाश में ठहरा नहीं जा सकता, रहा नहीं जा सकता । घोंसले के रचाव के लिए गाछ का भू-गोल जरूरी होता है ।


मेरा मन गाँव का ठेठ घरेलू मन ठहरा । आपको उस तक पहुँचने के लिए शहर की नीरस भीड़ में गुम चुके अपने मन को ढँढ़ना होगा । फिर मेरे मन के साथ घर तक पहुँचने के लिए आपको कोस भर पैदल भी चलना पड़ेगा । वह भी टेढ़े-मेढ़े सँकरे डगर से । कितनी बार एक पग नीचे होगा और दूसरा पग ऊपर, कह नहीं सकता । खेत की दुबली मेड़ों पर कभी न चलें हों, तो थोड़ी अधिक सावधानी चाहिए । चूके तो धड़ाम, सीधे अरहर की कटी हुई ख्रूटियों के ऊपर, यानी भीष्म पितामह की शर-शैय्या । फिर मुझे न कहना कि अर्जुन, धरती को भेद कर तृप्त करो । सच-सच बतायें, हरा-भरा चनाबूट देखकर तबीयत मचल रही है न ! बिना पूछे छूना मत । बचपन में मुझे एक बार बहुत डाँट पड़ चुकी है । भाला (झोपड़ी) में गया, बबा होंगे । चलो वहीं चलें, देखने पर बड़े चाव से खिलायेंगे, वह भी पुआल में होरा भूँजकर । यह रहा मेरा गाँव का सीवान। जरा ठहरो भई ! ग्राम देवता ठाकुर देव को जोहार लें । चलिए-चलिए, गाँव के आखिरी छोर में है मेरा घर । आप शायद समझ गये होंगे कि दीन-हीन यह भवन ही गाँव का स्कूल है । यहाँ मैं जिनसे पढ़ा, उन्हीं के साथ बाद में कुछ साल पढ़ाया भी । अब तो मेरे पढ़ाये हुए लड़के डॉक्टर, वकील, अफसर बन चुके हैं । वो ऽऽदेखिए...जामुन का पेड़, मेरे बचपन का संगी । पके फल इतने रसीले और मनबोधी कि पथिक क्षणभर ठहर कर दो चार जामुन जरूर बिनते, फिर आगे की सुधि लेते हैं । आषाढ़ की बूँदा-बाँदी और जामुन का टीपुर-टापुर दोनों में होड़ लगी रहती कि कौन अधिक श्रेष्ठ संगीतकार है ? अरे! मैं तो भूल ही गया हमारे पाँव अब पड़ोस की ओर हैं । पड़ोस यानी आधा घर । पड़ोस यानी आधी दुनिया । पड़ोस मनुष्य के लिए सबसे समीप का संसार है । पड़ोस एक अनिवार्य कविता है, घर से विस्थापित और शहर में स्थापित (?) लोगों को सांत्वना देती, ढ़ाढस बँधाती हुई कविता:

घर में एक पड़ोस रहता है

जैसे नदी में जल

देह में आत्मा

पुलक में होता है जब कभी पड़ोस

गमक उठता है घर

उधर कोई रुदन

उदासी चाप जाती इधर

घर से दूर चले जाने का मतलब

पड़ोस से दूर चले जाना

और घर की ओर लौटने का मतलब

पड़ोस के रास्ते से होते हुए

घर लौटना

 

ठीक चीन्हा आपने । जो सदैव अपने बच्चों की बाट जोहती रहती है, वह कोई नहीं, माँ होती है और जहाँ भी माँ होती है वहाँ एक घर तो होता है । माँ घर की प्रस्तावना है, संसार की संभावना है । भवानीनंदन माँ की प्रदक्षिणा में पृथ्वी की प्र्रदक्षिणा सिध्द कर देते हैं । मेरे एक आलोचक मित्र हैं । उनकी आपत्ति है कि मेरे अपने लेखन में मातृभाव का अत्तिरिक्त आग्रह है, जो मेरे पाठकों के लिए संभव है, ऊबाऊ साबित हो । अब मैं उन्हें कैसे बुझाऊँ कि माँ व्यक्तिवाचक नहीं भाववाचक अनुभूतियों का अनुप्राणित बिम्ब है, जिसके सदावर्ती आलोक से मैं क्या, हर भावुक इन्सान अपने पथ के ऍंधियारों को छँटते हुए देखता है । मातृभाव प्रकारान्तर से गृहभाव ही है । भई ! मातृ-चर्चा से जड़ों की ओर स्मरण कराने का पावन कार्य ललितनिबंधकार न करे, तो और कौन करे ? आखिर ललित निबंध का विधा-चरित्र क्या है । सच्चे अर्थों में ललित निबंध भी घर है, जिसमें भारतीयता निवसती है । ललित निबंधकार वही बन सकता है, जो घर की आत्मा की थाह लगा सके । बिखरते हुए उन घरों का चित्रांकन कर सके । घर से दूर कहीं परदेश में पापी पेट के सवालों मे उलझे हुए लोगों तक उसके गाँव वाले जर्जर घर की पाती हबरा सके । ललित निबंधकार ई-मेल वाले अनात्मीय संचार के युग में भी वह डाकिया है, जो गाँव-घर की चिठि्याँ खुद पहुँचाता है, पढ़कर सुनाता है, समझाता भी है।माटी की भीत, खपरैल छाजन, ऑंगन, गोबर से लिपा-पुता ऑंगन । ऑंगन के कोने में चबूतरा, चबूतरे पर हरी-भरी गाछ तुलसी, तुलसी के बाजू से भोलेबाबा, साथ में नंदी वृषभ । छोटी-सी गुहाल, गुहाल में काली गाय और बाँ-बाँ करती बछिया। बाड़ी में अमरूद रुख और कुऑं, मंदार, गेंदे, मधुमालती के दो-चार पौधे। पूजा घर से बिला नागा सुबह-शाम-गमगमाती जंगली धूप की गंध और माँ की मंगल अभ्यर्थना: 'जय तू मंगला माँ गो जय हर चण्डी तोते सुमिरिले माँ गो विपद जे खंडी ।'दिन भर पहाड़ी झरने-से हँसते-हँसते हम, हम यानी बड़े भैया, छोटी बहन और मैं साथ में गौरैय्या का छोटा परिवार । हममें और गौरैय्यों में अंतर इतना ही था कि वे पितृविहीन नहीं थे और हम नाना-विहीन नहीं थे । शाम ढलते ही उनके पिता घोंसले में लौटने की ताकीद करते और हमारे नाना देर रात तक स्कूल के सबक में रहने की ताकीद कराते ।


गर्दिश के दिनों में, जब हर कोई मुँह फेर लेता है, एक घर ही है, जो अशरण को शरण देता है । कम-से कम हमारे अपने घर के लिए मेरा दावा सोलह आना सच है। घर को 'हमारा अपना' कहने की खास वजह है पहला यह कि घर को हम सभी भाई-बहन अपना मानकर आदर देते हैं । दूसरा यह कि नींव से छत तक की रचना-यात्रा के साक्षी हम सब हैं । माटी-पानी, बाँस-बल्ली हर चीज पर हमारी नन्हीं हथेलियों के निशान अंकित हैं । घर के रग-रग में मन के र्स्वाप्नल हस्ताक्षर हैं । उस दिन नानाजी ने पतरा देखकर मुहूर्त निकाला था । गैंती-फावड़े का श्रीगणेशनाद और नारियल-लाई-गुड़ का स्वाद मुझे आज भी स्मरण हो आता है । पराश्रय जैसा दारुण दुख नहीं, स्वाश्रय जैसा मधुर सुख नहीं । हम तीनों भाई-स्कूल से लौटकर वहीं जुट जाते । कभी मिट्टी में पैंरा, भूसा, पानी सानकर पैरों से रौंदते, कभी गोल-गोल लौंदे बनाकर दीवार उठाने वाले मजदूरों का हाथ बॅटाते । काँड़ पर बाँस पीटने वालों को खीलें देने का काम मैं करता, तो छोटी बहन छिटककर नीचे बिखरे हुए खीलों को एकत्र करती । बड़े भैया टेड़े-मेढ़े खीलों को हथौड़ी से सीधा करते । दुर्दिन टेढ़े-खीले ही हुआ करते हैं, जिसे बिना श्रम और आत्मविश्वास के धार-दार दिनों में रूपायित नहीं किया जा सकता । पिताजी की असामयिक मृत्यु से बुरे वक्त ने अपने पंजे में लगभग दबोच लिया था । यह नानाजी थे, जो हमें अपने साथ गाँव ले आये थे । कुछ दिन साथ ही खाये, साथ ही सोये, और आज हमारे अपने घर का सपना आकार ले चुका था । नानाजी के चेहरे पर कर्तव्यनिष्ठा का असीम भाव तैर रहा था और माँ की सजल ऑंखों से बेघरवार होने की दुश्चिंता सदा-सदा के लिए विदा ले रही थी।


हम घर रचते हैं, घर हमें रचता है । हमारा घर रचना सभ्यता की निशानी है और घर का हमें रचना संस्कृति की निरन्तरता । अंतर्मन से रचा गया घर जीवन के त्रिविध संतापों से जूझने की सामर्थ्य देता है । घर का स्वभाव प्रत्युपकारी होता है । यही घर का जीवंत सौंदर्य है । घर हमारे होने का प्रथम संबोध है । इसलिए समाजशास्त्रियों ने घर को पहली पाठशाला का सम्मान दिया है । गृहस्थी को भारतीय संस्कृति की नींव के रूप में प्रतिष्ठित देखने के पीछे पंडितों का तर्क अकाट्य है । सप्तपदी में सहभागी पुरुषार्थ का प्रतिज्ञा-भाव अंतर्भुक्त है । घर का बीज-शब्द 'गृह' है, जिसका मतलब ग्र्रहण करना है। किसे ग्रहण करना ? श्रम को ग्रहण करना, कर्म को ग्रहण करना, और श्रमपूर्वक किये गये कर्म से धर्म को ग्रहण करना । पाणिग्रहण मात्र पुरुष एवं नारी का परस्पर हाथ पकड़ना नहीं बल्कि साथ-साथ जीवन के सभीर् कत्तव्यों का अनुपालन करना है । साथ-साथ क्यों, अंतर्लीन होकर समानधर्मा बनना है । रिश्तों की गहनतम गहराई में डुबकी मारना, थाह लगा कर फिर वहीं रम जाना ही गृहस्थी है, जहाँ परस्पर देना ही देना है, लेने की किंचित् आकांक्षा के बिना । गृहस्थ इसलिए सर्र्वोत्तम पुरुषार्थ है, जहाँ त्याग में भी आनंद ही आनंद है । ऐसे गृहस्थ का घर क्यों एक तपोभूमि न बने ? अपना सर्वस्व समर्पण ही साधुता है । साधु बनने का मतलब घर-घाट छोड़कर, जटाजूट बढ़ाकर, भभूत रमाकर एकाकी भटकना नहीं है । गृहस्थ होकर भी साधु बने रहना धर्म के मर्म को उसके मूल में बूझना है । चाणक्य एक कदम आगे बढ़कर गृहस्थ को अभिनंदनीय घोषित कर देते हैं-

सानन्दं सदनं सुताशचं सुधय:कान्ता प्रियालापिनी

इच्छापूर्तिधनं स्वयोषितिरति: स्वाऽऽज्ञापरा:सेवका:

आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्ठात्रपानं गृहे

साधो संगमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाऽऽश्रम:   (चाणक्य नीतिदर्पण -12/1)


देवताओं की शक्ल-सूरत को देखकर मेरी समझ में यही आता है कि वे सब के सब गृहस्थ हैं । स्वर्ग है भी या नहीं, और है तो भी कहाँ है ? मैं इस ओर सोचने-विचारने में उदासीन रहा हूँ , पर मैंने स्वर्ग की परिभाषा जानकार लोगों से सुनी है । स्वर्ग का मौलिक अर्थ है आनंद या उल्लास, वह कोई वस्तु नहीं , जिससे आनंद की प्राप्ति होती है । यदि यही स्वर्ग है, तो एक सच्चा घर स्वर्ग को टॉलस्टाय ने महसूस किया है - घर में मेल होना पृथ्वी पर स्वर्ग-सदृश है ।


घर आदिम स्वप्न है । शुरू में मानव जब घनघोर ऍंधेरी रात में किसी सुनसान जंगल में भयंकर वर्षा तूफान से घिर जाता रहा होगा, बादलों की गर्जन-तर्र्जन और बिजली की लहकन से सहम कर किसी गुफा या किसी वृक्ष के नीचे शरण लेता रहा होगा, तो स्थायी आश्रम-जैसा कोई बिंब उसके मानस में आकार लेने लगा होगा । एकाकी व घुमक्कड़ी जीवन के संत्रास से निजात पाने वह निवास-व्यवस्था की ओर उन्मुख हुआ होगा । घर सामूहिकता की अनुप्रेरणा का प्रतिफल ही है । ऐसी सामूहिकता, जिसकी निरंतरता से सामाजिकता के भाव-बोध को स्वर मिला । इसी भावबोध की स्थिर सहवर्तिता से मन घर तक, घर बस्ती तक, बस्ती गाँव तक, गाँव जनपद तक, जनपद राष्ट,महाद्वीप तक, और महाद्वीप संसार तक पहुँचा । घर संसार की महाजड़ में है। घर सबके केन्द्र में है । जो घर में नहीं होता, वह बाहर हो जाता है । घर का विपर्यय अरण्य भी है, इसलिए घर-त्याग का आशय अरण्य-मोह है । घर से रागात्मकता कूपमंडूकता नहीं । यह मनुष&