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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   व्यंग्य

 

 मुर्गा और आदमी


आर.के.भँवर

 

     ड़क पर चहलकदमी करता हुआ एक मुर्गा परेशान दिख रहे आदमी को रोक कर बोला .. क्यों गुरू, हमीं क्या कटने के लिए पैदा हुए हैं। छुरी हवा में लहराई और हम हो गये जिबह। आखिर ये सब कब तलक चलेगा ?

 

        आदमी ने, जो पहले से ही और वाकई परेशान था, उसकी बात सुनते ही कुकुड़ू- कूं की ओर मुखातिब हुआ, देखो भाई तुम सिर्फ एक बार कटते हो और हमारे हिन्दू संस्कारों के अनुसार तुम संसार में आवाज़ाही के बंधनों से मुक्त हो जाते हो। पर मै तो रोज-बरोज कटता हू। किस-किस के वास्ते और कब-कब कटता हू .. ये बताना इतना आसान  नही। कटने पर मेरी परिस्थितिया नही देखी जाती, कटवाने वाले का फरमान सुना जाता है।  अब तो कटने की आदत पड़ गई है। सच बताऊँ मुर्गा भाई, पहले पहले बहुत दिक्कत हुई थी। इसके बाद तो कटने की आदत पड़ गई है। तुम शायद न जानते होगे, इस मामले में मेरी प्रेरणा तुम ही हो मुर्गा भाई।

 

         दो कदम पीछे हटकर मुर्गा कुछ नाराजगी से बोला, क्या बके जा रहे हो तुम। मै किसी के लिए प्रेरणा नहीं, तुम अपना काम जैसे चला रहो हो, चलाओ, अरे मुझे तुम्हारे से क्या लेना-देना ! कसाई से मेरा सम्बंध जन्म जन्मांतरों का है, किसी योनि में वह मुर्गा बनता है तो किसी योनि में मै कसाई। ये सब हमारे यहा चलता रहता है। पर तुम्हारी जात में हमें कुछ संदेह रहता है। तुम्हारे यहा करनी और कथनी में गहरी खाई है। इसलिए आदमी जो कहता है, वो करता नहीं। ऐसा हमारे यहा नही होता। अब देखो मै सीधे कसाई के पास कटने के वास्ते जा रहा हू। कटूगा भी और अपनी आगे की पीढ़ी के लिए रास्ता भी साफ करूगा।

 

         आदमी इस बार झल्लाया, ये जो तुरत दान महा कल्याण वाली थिरेपी है, इसमें कोई खास दम नही। इसमें कोई संघर्ष नही है। उत्तजना नही है। अगूठा दिखाने का मौका नही है। और फिसलने पर हर-हर गंगे कहने का गोल्डेन चांस नही है। अब ये क्या है कि बात की बात में गये और छुरी के तले धार-धार हो गये। शी... शी इतनी खामो कटाई, क्या फायदा मिला। अरे मरो तो शहादत मिले, ऐसे लोगों को ढेर पैसा देकर मरो जो मरने पे कह सके कि इनकी भरपाई अब नही हो सकेगी, इसीलिए हम एक बार नही बार-बार कटते हैं। ये अलग बात है कि बार-बार कटने की हमारी नियति है।

 

         मुर्गा फिर बोला तुम लोग बाथरूम में गिरने को भी शहादत मान लेते हो और रेल की पटरियों से छेड़छाड़ करने को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। अब क्या कहा जाए, तुम्हारी जात  और तुम्हारा सोचसाच कुछ अलग ही है, जिसमें अपना भला अपनी सिध्दि, भई वाह, अब फिसलने पर हर गंगे नही, बल्कि अपन की ये स्टाईल है। आजादी के छह दक में हमसे, कुत्तो भाई, सांप जी, गिध्द जी, बगुला जी, लोमड़ी बहिन से तुमने कुछ न कुछ लिया है, और उसके बदले उन्हें कुछ भी दिया नही है। ये सब तुम्हारी प्रगति की सीढ़ियां बनी है। अब ये डर लगने लगा है कि इनकी तुलना कहीं आदमी से न होने लगे।

आर.के.भँवर

सी-501/सी, इंदिरा नगर
लखनऊ, उत्तरप्रदेश
 

 

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