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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई, 2007

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   श्रद्दांजलि

 

भौंडसी के बाबा अलविदा


निर्मल रानी

 

भारतवर्ष में जहाँ सात जुलाई 2007 को दिन, महीने तथा वर्ष के रूप में 7 की संख्या एक साथ पड़ने का जबरदस्त जश्न मनाया जा रहा था, जहाँ देशवासी इसी रात ताज महल जैसी नायाब धरोहर को दुनिया के 7 अजूबों में शामिल होने का जश्न मना रहे थे, वहीं इसी दिन की अगली सुबह अर्थात् 8 जुलाई भारतवासियों के लिए अत्यन्त मनहूस व दु:खदायी साबित हुई। 'युवा तुर्क' के नाम से भारतीय राजनीति में अपनी पहचान रखने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर 80 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गए। आज भारतीय नेताओं में दाढ़ी ने एक फैशन का जो रूप अख्तियार कर रखा है, उसके जन्मदाता चन्द्रशेखर ही थे।

 

बलिया के इब्राहीम पट्टी गाँव में एक जुलाई 1927 को एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर हड्डी के कैंसर से पिछले कांफी समय से पीड़ित थे। इस बीमारी के सिलसिले में गत् 3 महीने से वे नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती थे। वे यहाँ  3 मई को दाखिल हुए थे। अपने जीवन के अन्तिम सप्ताह में वे आई सी यू में रहे। आंखिरकार अपनी इस जानलेवा बीमारी से जूझते हुए 7 महीने निरन्तर अस्पताल में रहकर 8 जुलाई को प्रात: 8:45 पर चन्द्रशेखर ने काल के समक्ष समपर्ण कर डाला।

 

इसमें कोई शक नहीं कि इस देश में तमाम प्रतिभावान नेताओं ने जन्म लिया। परन्तु उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के बलिया जिले के इस युवा तुर्क की राजनीति के अपने अन्दाज ही निराले थे। साफगोई, स्पष्टवादिता, सत्य को सत्य तथा झूठ को झूठ कहने का अदम्य साहस रखने वाला यह महान नायक संसदीय परंपरा का जबरदस्त हिमायती था। दृढ़ संकल्प एवं गहन चिंतन, धर्म निरपेक्षता, निडरता जैसे आभूषण उनके व्यक्तित्व के प्रमुख आकर्षण थे। वे संसद में जब कभी बोलने के लिए खड़े होते थे, उस समय पूरा सदन बिल्कुल खामोश अवस्था में चन्द्रशेखर के एक-एक शब्द को बहुत गौर से सुनता था। वे हमेशा दलीय सोच से ऊपर उठकर चिंतन करते थे। अपनी इसी विशेषता के चलते वे प्रत्येक राजनैतिक दलों में लोकप्रिय थे। 1962 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए थे। इसके अतिरिक्त वे बलिया जिले से 10 बार सांसद चुने गए। संसद में अपनी बेबाक शैली की बदौलत ही उन्हें 1995 में सर्वश्रेष्ठ सांसद चुना गया था।

 

चन्द्रशेखर अपने जीवन में पहले कभी मंत्री नहीं बने। वे सीधे तौर पर 1990 में प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे। उन्होंने सात महीने तक प्रधानमंत्री का पद संभाला। वर्तमान प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में उनके आर्थिक सलाहकार नियुक्त किए गए थे। विचारों से कभी समझौता न करने वाले इस महान नेता के सात महीने के प्रधानमंत्रित्व काल में अयोध्या की बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि जैसे अति विवादित मुद्दे के समाधान हेतु जितने प्रयास किए गए थे, उतने प्रयास किसी भी प्रधानमंत्री के समय में नहीं किए गए। उस दौर में एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि सम्भवत: नासूर जैसी अयोध्या समस्या बहुत जल्द हल हो जाएगी। परन्तु इसके पहले कि मन्दिर-मस्जिद समस्या का कोई समाधान निकल पाता चन्द्रशेखर की सरकार का पतन हो गया।

 

चन्द्रशेखर को कांग्रेस पार्टी ने अपना समर्थन देकर प्रधानमंत्री जरूर बनाया था। परन्तु चन्द्रशेखर की सरकार से कांग्रेस के समर्थन वापसी के जो कारण राजनैतिक क्षेत्रों में महसूस किए जा रहे थे, उनमें राजीव गांधी की जासूसी कराए जाने के अतिरिक्त एक मुख्य कारण यह भी माना जा रहा था कि कांग्रेस नेता इस बात को लेकर चिंतित थे कि कहीं चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में अयोध्या समस्या का समाधान न निकल आए। सांफ है कि आमतौर पर राजनैतिक दलों व नेताओं की दिलचस्पी समस्याओं को जन्म देने, बढ़ाने या बरकरार रखने में अधिक होती है। उन्हें समाप्त करने में कम, बहुत कम या बिल्कुल नहीं। परन्तु चन्द्रशेखर को पूरा देश उस महान नेता के रूप में हमेशा याद रखेगा जिसने कि मंदिर-मस्जिद विवाद को निपटाने के लिए गम्भीर व रचनात्मक प्रयास किए।

 

यह उनकी स्वतंत्र सोच व स्पष्टवादिता ही थी जिसने उन्हें कांग्रेस छोड़ने के लिए बाध्य किया। इमरजेंसी से पूर्व के उस तनावपूर्ण वातावरण में जबकि लोकनायक जय प्रकाश नारायण तथा प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी खुलकर एक दूसरे के आमने-सामने आ गए थे। उस समय चन्द्रशेखर कांग्रेस में ही थे। वे हरगिज नहीं चाहते थे कि इन्दिरा गांधी व जे पी के बीच का तनावपूर्ण माहौल और भी अधिक तनावपूर्ण हो जाए। वे इन दोनों बड़े नेताओं के मध्य सुलह संफाई की राह निकालना चाहते थे। उनकी इस सोच का कारण यही था कि वे देश में स्थिरता व अमन-शांति का वातावरण चाहते थे तथा कांग्रेस व इन्दिरा गांधी का भी हित चाहते थे। अपनी इसी सोच के तहत चन्द्रशेखर ने इन्दिरा गांधी व जय प्रकाश के मध्य सुलह सफाई करवाने की कोशिश की। परन्तु उनके इस ईमानदाराना प्रयास के विषय में इन्दिरा गांधी की चौकड़ी ने इन्दिरा जी को यह समझाने का सफल प्रयास किया कि चन्द्रशेखर का झुकाव कांग्रेस की ओर नहीं बल्कि जय प्रकाश की ओर है। और कुछ कांग्रेस नेताओं की इसी दूषित सोच ने चन्द्रशेखर जैसे महान नेता को अपनी पार्टी से खो दिया। वे उस समय न सिंर्फ कांग्रेस से अलग हुए बल्कि इन्दिरा गांधी की कथित तानाशाहीपूर्ण नीतियों के विरुद्ध कांग्रेस के सामने भी खुलकर खड़े हो गए। परिणामस्वरूप उन्हें भी अन्य विपक्षी नेताओं की तरह इमरजेन्सी के दौरान 19 महीने जेल में बिताने पड़े।

 

जिस प्रकार चन्द्रशेखर को बिना मंत्री बने हुए सीधे प्रधानमंत्री के पद पर बैठने का गौरव हासिल था, उसी प्रकार संगठन के पदाधिकारी के रूप में भी उन्होंने नया कीर्तिमान रचा था। चन्द्रशेखर को उस जनता पार्टी के पहले व आखिरी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी जाना जाता रहा है जिसके गठन के बाद स्वतंत्रता के पश्चात 1977 में पहली बार जनता पार्टी ने कांग्रेस की केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंका था। वे अपने कार्यकर्ताओं में बहुत लोकप्रिय थे। देश के ग्यारहवें प्रधानमंत्री बनने वाले चन्द्रशेखर अपने अधिकांश कार्यकर्ताओं को उनके नाम से जानते व बुलाते थे। 6 दिसम्बर 1992 की बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना से वे भी बहुत दु:खी हुए थे। साम्प्रदायिक शक्तियों को वे देश का सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। धर्म निरपेक्ष विचारधारा के इस महान ध्वजावाहक का रहन-सहन साधू-सन्तों जैसे अति साधारण था। गुड़गाँव के समीप भौंडसी नामक गाँव में उनका एक आश्रम भी था। जिसके चलते उन्हें 'भौंडसी वाले बाबा' के नाम से भी जाना जाता था। नेता के रूप में रहने वाले तथा महान आदर्शों व उच्च विचारों के धनी इस सन्त रूपी महान आत्मा को शत्-शत् प्रणाम एवं श्रद्धांजलि।                                      

                                             निर्मल रानी

163011, महावीर नगर,

 अम्बाला शहर,हरियाणा।

 

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