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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   संस्कार

 

एक नये समीक्षक को सलाह


जार्ज बर्नार्ड शॉ 

 

(उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में गोल्डिंग ब्राइट नामक एक युवक नाट्य समीक्षा से संबंधित सिद्धांत के विनियोग की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से अँगरेज़ी भाषा के विश्वविख्यात नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ के समक्ष पत्रों के माध्यम से उपस्थित हुए । शॉ ने उनके मनोबल को ऊँचा किया । शॉ को भी ब्राइट की बालसुलभ भावुकता और उत्कंठा ने प्रभावित किया । गोल्डिंग को दी गई सलाहें बाद में 'ऐडवाइस टु ए यंग क्रिटिक' नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुईं । इस पुस्तक का संपादन डॉक्टर ई.जे.वेस्ट ने किया है । इस कृति की भूमिका उन्होंने 5 सितम्बर 1955 को लिखा थी । 14 वर्ष पूर्व पटना में ए.एन.कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्षा डॉ. सरोज सिन्हा ने इसका अनुवाद किया और अनुदित कृति का नाम दिय़ा - एक नये समीक्षक को सलाह । हम इसे साहित्य हिंत में संपूर्णतः प्रकाशित कर रहे हैं । इस महान कृति का पहला भाग आपने पढ़ा था जून 2006 के अंक में । अब इसे धारावाहिक रूप से आगे पढ़ सकते हैं । प्रस्तुत है इस धारावाहिक की दूसरी कड़ी - संपादक)

 


 

29 फिट्ज्राय स्क्वायर, डब्ल्यू

19 नवम्बर, 1894

 प्रिय महोदय,

 

आपकी चिट्ठी मिली। आश्चर्य हुआ, क्योंकि जब यह मुझे मिली, उसके पहले ही एक सम्पादक को नाट्य-समीक्षक के लिए मैंने आपका नाम भेज दिया था। यह मुझे आर्श्चयजनक लगा कि हम दोनों एक-दूसरे के बारे में साथ-साथ सोचते रहते हैं। फिर भी, एक प्रश्न उठ खड़ा हुआ है - फ्रैंक हैरिक के अधीन द सैटरडे रिव्यू के समीक्षक के पद का प्रश्न । इस स्थिति में यह बहुत साहसिक प्रयोग है, क्योंकि यह काम एक अपरीक्षित व्यक्ति को सौंप दिया गया है। मेरे विचार का स्वागत करने की अपेक्षा हैरिस को मेरी अवहेलना ज्यादा पसन्द है।

 

हर हालत में द सन को पारिश्रमिक के लिए बाध्य कीजिए। फिर, अगर ऐसा हो सके तो इसे जमा होकर तब तक बढ़ते चले जाने दीजिए जब तक यह एक काफी बड़ी रकम न हो जाए जिससे आग्रह करने पर ऐसा न लगे कि बहुत छोटी बातों के लिए आप चिन्ता करते हैं। यों कहिए कि तब तक इस बढ़ने दीजिए जब तक यह रकम 2-3 पौंड न हो जाए। किसी नियमित वाणिज्य अखबार को कोई प्रति मुफ्त मत लेने दीजिए । फिर भी पारिश्रमिक मिल जाने की बहुत आतुरता भी मत दिखाइए । इसे यथास्थिति मान लीजिए कि जो छपने लायक है, उसके लिए पारिश्रमिक तो मिलेगा ही ।

 

मिसेज ज़ारमैन्स प्रोफेशन शीर्षकपौला टैंक्वेरे के प्रभाव का विचित्र उदाहरण है। वास्तविक शीर्षक मिसेज़ वैरेन्स प्रोफेशन है । ग्रेम के मस्तिष्क में कुछ विचारों के ऐसे साहचर्य, जिसके चलते उन्होंने अपना नाम किसी अन्तर्वीक्षक को गलत बता दिया हो, के सिवा मेरे मस्तिष्क मेंजारमैननाम कभी नहीं आया, और न इसके लिए कोई प्रामाणिक तथ्य ही है।

 

द वर्ल्ड से मैंने स्थायी रूप से सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है। इस संगीत- समीक्षा से विदा लेने के लिए एडमेंड एट्स की मृत्यु को बहाना बनाने का मैंने निश्चय कर लिया था । हो सकता है, पाठकों के लिए यह आनन्द का विषय हो, किसी ऐसे लेखक के लिए जो पिछले सात वर्षों तक हर सप्ताह एक ऐसा लम्बा लेख लिखता रहा हो, कोई आनन्ददायक बात नहीं है। द स्कॉटिश म्यूज़िकल मेंथली के आगामी अंक में मेरी एक संगीत-समीक्षा आ रही है। मैं सम्पादक से आग्रह करूँगा कि आपके पास उसकी एक प्रति वे भेज दें।

 

मेरे क्रमानुयायी - श्री हिचेन्स (या जो भी उनका नाम हो) बड़े चालाक और आनन्दमय ढंग से लिखते दिखते हैं। ऑस्कर वाइल्ड या किसी अन्य लेखक से सम्बन्धित हर बात से घृणा करने की आदत आपको छोड़ देनी चाहिए। किसी समीक्षक का सर्वोपरि कार्य यह होता है कि वह लेखक की विलक्षण शैली को परम श्रद्धा के साथ स्वीकार करे। वाइल्ड की मेघा और सूक्ष्म साहित्यिक कार्य-क्षमता बड़ी महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति विशिष्ट होता है, उसके पक्ष और विपक्ष दोनों में हर समय व्यर्थ हल्ला हुआ करता है। यदि आप स्वयं विशिष्टता प्राप्त करना चाहते हैं तो इस प्रकार के शोर से आप अपना मस्तिष्क स्वतन्त्र नहीं रख सकते। मेरे कहने का भाव आप समझ रहे होंगे। सराह, ग्रैण्ड, इब्सन, वैग्नर आदि सबों के साथ, जिनमें विलक्षण क्षमता रही है, ऐसा ही होता है। इस उपदेश के लिए क्षमा करें। उपदेश देने की घुसपैठी मैं करता भी नहीं । मुझे स्वयं यह मालूम है कि हर तरफ से बकवास करने वाले मूर्खों के बीच किसी मौलिक और विलक्षण व्यक्ति के विचारों को बनाने या मान लेने में कितनी कठिनाई होती है।

 

साहस रखें। आपकी बातों से पता चलता है कि समाचार-पत्रों के साथ आपका सम्बन्ध बहुत अच्छा रहा है, लेकिन आपको चाहिए कि आप ड्रामा पर भी कुछ किताबें लिखें। बाद में भले ही आप उन्हें जला दें, लेकिन लिखें जरूर । अनिश्चित भविष्य की परवाह किये बना मैंने पाँच कितावों से लिखना शुरू किया - एक के बाद एक ।

 

स्कूल बोर्ड और वेस्ट्री के चुनाव-कार्यों में बहुत व्यस्त रहा । इसलिए जल्दीबाजी में इतना ही लिख पा रहा हूँ ।

 

आपका विश्वासी

जी.बर्नार्ड शों

 

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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