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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   पुस्तकायन

 

देशांतर - दूर से दूर तलक


चंद्रभूषण

 

       हान उपन्यासकारों के सितारों जड़े रूसी साहित्य के आकाश में कवि कहीं खोकर रह जाते हैं। भारत के पाठकीय संदर्भो में यह समस्या और भी बढ़ जाती है क्योंकि रूसी साहित्य से परिचय यहाँ सोवियत सत्ता के जरिए ही बना, जिसकी प्रचारात्मक दृष्टि में कविताओं के लिए जगह कम ही थी। बाद के अनुवादों में पुश्किन, मायकोव्स्की और त्स्वेतायेवा हिंदी पाठकों को उपलब्ध हुए। हुए। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद दूसरे जरियों से जोसफ ब्रॉद्स्की और छिटपुट कविताओं के रूप में वोज्नेसेंस्की ने भी हिंदी में अपने लिए थोड़ी सी जगह बनाई लेकिन यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि रूसी कविता की धुरी समझे जाने वाले अलेक्सांद्र ब्लोक एक व्यवस्थित और पठनीय संग्रह के रूप में इस साल ही हिंदी में आ सके।

 

दूर की आवाज


कवि : अलेकसांद

अनुवाद : वरयाम सिंह

 
प्रकाशक : शिल्पायन, दिल्ली

मूल्य : 125 रूपये

   

ब्लोक की गिनती प्रतिक्रियावादी खेमे में नहीं होती। क्रांतिकाल में वे बोल्शेविक धारा के करीब थे और उनकी मृत्यु 1921 में, यानी लेनिन के जीवनकाल में ही हो गई थी, जब रूसी सर्वहारा क्रांति ने अपने स्वप्न-पंख नहीं खोए थे। ऐसे में ब्लोक का अनुवाद और पहले न होने की वजह इसके अलावा और भला क्या हो सकती है कि उनकी कविताओं में उखाड़-पछाड़ वाले वाचाल रेडिकल बिंब और कम्युनिस्ट साहित्य में उपलब्ध आसान नारे ढूंढ़ना लगभग असंभव है। अनुवादक वरयाम सिंह ने गैर-कम्युनिस्ट रूसी कवियों के अनुवाद भी खूब किए हैं लेकिन ब्लोक से उनकी मुराद सहज जनपक्षधरता की ही रही है, यह बात उनकी आमुख-टिप्पणी अलेक्सांद्र ब्लोक की काव्य-यात्रा से जाहिर होती है।


     प्रारंभिक टिप्पणी में जाहिर होने वाली ऐसी मुरादें कवियों का कद घटाती हैं और उन्हें पढ़ना दूभर बनाती हैं। विचारधारा की कसौटी पर कसकर अनुवादक ने ब्लोक की आला दर्जे की जो अकेली कविता बारह चुनी है, उसे क्रांतिकालीन रूसी समीक्षकों ने चाहे जितना भी सराहा हो लेकिन किसी भी सूरत में इस कविता की गिनती ब्लोक की अच्छी कविताओं में नहीं हो सकती। जनवरी 1918 में लिखी गई और सूत्र तथा सारवस्तु में परस्पर जुड़ी ये बारह कविताएँ एकबारगी किसी को अराजकता का चित्र खींचती लग सकती हैं। यहाँ रकीब के साथ भाग रही प्रेमिका को एक कथित क्रांतिकारी अकारण गोली मार देता है और उसका अवसाद भी अनुवादक द्वारा प्रशंसित आगे बढ़ो, आगे बढ़ो/ श्रमिक जन आगे बढ़ो के नारे में खोकर रह जाता है।


      ब्लोक इससे बड़े, कहीं ज्यादा बड़े कवि हैं और खास बात यह कि अनुवादक की खास काव्य-दृष्टि के बावजूद उनका यह बड़प्पन हिंदी अनुवाद में भी उभरकर सामने आया है। बारह कविता को ही लें तो उसे पढ़ने के बाद और कुछ किसी को भले न याद रहे लेकिन रूसी सर्वहारा क्रांति के दिनों का पुराना सबकुछ मटियामेट कर डालने के उत्साह और कौतूहल से भरा, थोड़ा कुंदजेहन, खतरनाक, ठंडा सिसियाता मौसम उसकी स्मृति में जरूर छप जाएगा। लेकिन निश्चय ही ब्लोक की महान कविताएँ इस संग्रह मेंबारह से पहले हैं। हिम और तुषार की ठिठुरन भरी ठेठ रूसी पृष्ठभूमि में आस्था, प्रेम और मृत्यु के चटख सूफियाना रंगों से रंगी ब्लोक की कविताएँ भले ही अपने प्रतीकवाद में प्रतिक्रियावादी हों, लेकिन ब्लोक खुद में जो कुछ भी हैं, यहीं हैं। देखिए, सितंबर 1898 में 18 साल की उम्र में लिखी गई उनकी एक कविता का पहला पद-रात में जब सो चुके होते हैं भय/ अंधकार में जब छिप जाता है शहर/ कितना होता है संगीत ईश्वर के पास/ और कितनी ध्वनियाँ इस संसार में... कुलीन बौद्धिक पृष्ठभूमि के अलेक्सांद्र ब्लोक का क्रमश: रूसी क्रांति के नजदीक पहुँचना किसी राजनीतिक विचारधारा के साथ उनके संपर्क का नतीजा नहीं है। मध्यवर्ग की दृष्टिगत संकीर्णता, उसके आ॓छेपन, उसके अघाएपन से निरंतर मोहभंग उन्हें क्रांति के नजदीक ले जाता है।तृप्त लोग’, ‘मित्रों के लिए... और मृत्यु नृत्य जैसी ब्लोक की न जाने कितनी कविताओं में कदम-ब-कदम उनकी इस यातना को महसूस किया जा सकता है। ‘...सुख-संपत्ति में बन गए पशुतुल्य/ हँसते हैं हम पागलों की तरह/ और नशे में धुत देखते हैं सड़क से/ तबाह होना अपने घरों का/ जिंदगी और दोस्ती में गद्दार/ धनी हम मात्र अर्थहीन शब्दों के/ क्या करें? कर रहे हैं रास्ता साफ/ दूर भविष्य के अपने बच्चों के लिए...


      ब्लोक की कुछ कविताओं का अनुवाद अगर उर्दू या फारसी में कर दिया जाए तो शायद वे रूमी जैसे किसी सूफी शायर की याद दिलाने लगें। बहुत बाद में एक और महान रूसी कवि जोसफ ब्रॉद्स्की के काव्य में भी ठीक ऐसे ही रंग दिखाई पड़ते हैं। मसलन, ब्लोक की एक कविता मैं ढूंढ रहा हूँ मशालें के अंतिम पद देखें- मैं चल रहा हूँ, ठंडी पड़ती आ॓स चमक रही है तुम्हारी याद में/यहाँ, इस झोपड़ी में खुली वेणियां बैठी हैं छिपे दोस्त के इंतजार में/ मुझे पिलाआ॓ कोई खुशबूदार दवा, मर जाने दो मुझे किसी मीठे जहर से/ कि मैं भी डूब सकूँ तुम्हारे आनंद में/ याद रख सकूँ सदा के लिए यह रात... अपनी बिंबात्मकता में अद्वितीय माने जाने वाले व्लादिमीर मायकोव्स्की के साथ ब्लोक की कविताओं का तुलनात्मक अध्ययन इस लिहाज से दिलचस्प होता कि दोनों का रचना-समय लगभग एक ही है। यह और बात है कि क्रांति के दिनों में जो सुपरस्टार का रूतबा मायकोव्स्की को हासिल था वह ब्लोक तो क्या किसी कवि को नसीब नहीं हुआ, हालांकि आत्महत्या के दूसरे छोर तक पहुंचाने वाली इसकी यातना भी मायकोव्स्की को ही भुगतनी पड़ी। देखने लायक है कि समय और कथ्य की समानता के बावजूद इन दोनों कवियों की कविताओं में कुछ भी साझा नहीं है। दूर से आकर दूर तक जाने वाली आवाज की तरह ब्लोक की प्रतिध्वनियां पूर्वी यूरोप की कविताओं में आज भी सुनाई देती हैं, लेकिन कुछ तो बात है जो यह सौभाग्य मायकोव्स्की को प्राप्त नहीं हुआ।(रा.सा.से)

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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