पहले और दूसरे वर्ष का कार्यक्रम
(क)
स्वास्थ्य और सफाई : सरकारी अस्पतालों
में नियम और नैतिकता के अनुसार काम हो। रोगियों को
आवश्यक सुविधाएं मिलें और पैसे या रसूख के बल पर कोई
काम न हो। डॉक्टर पूरा समय दें। दवाओं की चोरी रोकी
जाए। सभी मशीनें काम कर रही हों। जो बिगड़ जाएं,
उनकी
मरम्मत तुरंत हो। बिस्तर,
वार्ड
आदि साफ-सुथरे हों। एयर कंडीशनर डॉक्टरों और प्रशासकों
के लिए नहीं,
रोगियों के लिए हों।
निजी
अस्पतालों में रोगियों से ली जाने वाली फीस लोगों की
वहन क्षमता के भीतर हो। प्राइवेट डॉक्टरों से अनुरोध
किया जाए कि वे ज्यादा फीस न लें और रोज कम से कम एक
घंटा मुफ्त रोगी देखें। सार्वजनिक स्थानों की साफ-सफाई
पर पूरा ध्यान दिया जाए। जहां इसके लिए सांस्थानिक
प्रबंध न हो,
वहां
स्वयंसेवक यह काम करें। रोगों की रोकथाम के लिए सभी
आवश्यक कदम उठाए जाएं। जो काम सरकार न कर सके,
वे
नागरिकों द्वारा किए जाएं।
(ख)
शिक्षा
: सभी स्कूलों का संचालन ठीक ढंग से हो। सभी
लड़के-लड़कियों को स्कूल में पढ़ने का अवसर मिले। जहां
स्कूलों की कमी हो,
वहां
सरकार,
नगरपालिका,
पंचायत
आदि से कह कर स्कूल खुलवाएं जाएं। चंदे से भी स्कूल
खोले जाएं। जो लड़का या लड़की पढ़ना चाहे,
उसका दाखिला जरूर हो। शिक्षा संस्थानों को मुनाफे के
लिए न चलाया जाए। छात्रों को प्रवेश देने की प्रक्रिया
पूरी तरह पारदर्शी हो। किसी को डोनेशन देने के लिए
बाध्य न किया जाए। फीस कम से कम रखी जाए। शिक्षकों को
उचित वेतन मिले।
(ग)
कानून और
व्यवस्था : थानों और पुलिस के कामकाज
पर निगरानी रखी
जाए। किसी के साथ अन्याय न होने दिया जाए। अपराधियों
को पैसे ले कर या रसूख की वजह से छोड़ा न जाए। सभी
शिकायतें दर्ज हों और उन पर कार्रवाई हो। हिरासत में
पूछताछ के नाम पर जुल्म न हो। जेलों में कैदियों के
साथ मानवीय व्यवहार किया जाए। उनकी सभी उचित
आवश्यकताओं की पूर्ति हो। अदालतों के कामकाज में
व्यवस्था आए। रिश्वत बंद हो।
(घ)
परिवहन
: सार्वजनिक परिवहन के सभी साधन नियमानुसार
चलें। बसों में यात्रियों की निर्धारित संख्या से अधिक
यात्री न चढ़ाए जाएं। बस चालकों का व्यवहार अच्छा हो।
महिलाओं,
वृध्दों
आदि को उनकी सीट मिलें। ऑटोरिक्शा,
टैक्सियां,
साइकिल
रिक्शे आदि नियमानुसार तथा उचित किराया लें। बस स्टैंड,
रेल स्टेशन साफ-सुथरे और नागरिक सुविधाओं से युक्त
हों।
(ड.)
नागरिक सुविधाएं
:
नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था करना प्रशासन,
नगरपालिका,
पंचायत
आदि का कम है। ये काम समय पर और ठीक से हों,
इसके लिए
नागरिक हस्तक्षेप जरूरी है। बिजली,
पानी,
टेलीफोन,
गैस आदि के कनेक्शन देना,
इनकी
आपूर्ति बनाए रखना,
सड़क,
सफाई,
शिक्षा,
चिकित्सा,
प्रसूति,
टीका,
राशन
कार्ड,
पहचान
पत्र आदि विभिन्न क्षेत्रों में नागरिक सुविधाओं की
व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय स्तर पर सतत
सक्रियता और निगरानी की जरूरत है। जिन चीजों की
व्यवस्था सरकार,
नगरपालिका आदि नहीं कर पा रहे हैं जैसे पुस्तकालय और
व्यायामशाला खोलना,
वेश्यालय
बंद कराना,
गुंडागर्दी पर रोक लगाना आदि,
उनके लिए नागरिकों के सहयोग से काम किया जाए।
(ग)
उचित वेतन,
सम्मान
तथा सुविधाओं की लड़ाई
:
मजदूरों को उचित वेतन मिले,
उनके साथ
सम्मानपूर्ण व्यवहार हो,
उनके काम
के घंटे और स्थितिया अमानवीय न हों,
उन्हें
मेडिकल सहायता,
छुट्टी
आदि सुविधाएं मिलें,
इसके लिए संघर्ष करना ही होगा। गांवों में खेतिहर
मजदूरों के हितों की रक्षा करनी होगी।
(घ)
उचित कीमत
: अनेक इलाकों में एक ही चीज कई
कीमतों पर मिलती है। सभी दुकानदार ‘अधिकतम
खुदरा मूल्य’
के आधार
पर सामान बेचते हैं,
उचित
मूल्य पर नहीं।
ग्राहक
यह तय नहीं कर पाता कि कितना प्रतिशत मुनाफा कमाया जा
रहा है। नागरिक टोलियों को यह अधिकार है कि वे
प्रत्येक दुकान में जाएं और बिल देख कर यह पता करें कि
कौन-सी वस्तु कितनी कीमत दे कर खरीदी गई है। उस कीमत
में
मुनाफे
का न्यूनतम प्रतिशत जोड़ कर प्रत्येक वस्तु का विक्रय
मूल्य तय करने का आग्रह किया जाए। दवाओं की कीमतों के
मामले में इस सामाजिक अंकेक्षण की सख्त जरूरत है।
खुदरा व्यापार में कुछ निश्चित प्रतिमान लागू कराने के
बाद उत्पादकों से भी ऐसे ही प्रतिमानों का पालन करने
के लिए आग्रह किया जाएगा। कोई भी चीज लागत मूल्य के
डेढ़ गुने से ज्यादा पर नहीं बिकनी चाहिए। विज्ञापन
लुभाने के लिए नहीं,
सिर्फ तथ्य बताने के लिए हों ।
(ड।)
दलितों,
अल्पसंख्यकों और महिलाओं के हित
:
इन तीन तथा ऐसे अन्य वर्गों के हितों पर आवश्यक ध्यान
दिया जाएगा। इनके साथ किसी भी प्रकार के दर्व्यवहार और
भेदभाव को रोकने की पूरी कोशिश होगी।
ये
तथा इस तरह के अभियान शुरू के दो वर्षों में सघन रूप
से चलाए जाने चाहिए,
ताकि
लोगों में यह विश्वास पैदा हो सके कि गलत चीजों से लड़ा
जा सकता है,
स्वस्थ
बदलाव संभव है और इसके लिए किसी बड़े या चमत्कारी नेता
की आवश्यकता नहीं है। गाँव और मुहल्ले के सामान्य लोग
भी संगठित और नियमित काम के जरिए सफलता प्राप्त कर
सकते हैं। इस तरह का वातावरण बन जाने के बाद तीसरे
वर्ष से बड़े कार्यक्रम हाथ में लिए जा सकते हैं।
तीसरे और चौथे वर्ष का कार्यक्रम
भारत में अंग्रेजी शोषण,
विषमता
तथा अन्याय की भाषा है। अत: अंग्रेजी के सार्वजनिक
प्रयोग के विरुध्द अभियान चलाना आवश्यक है। बीड़ी,
सिगरेट,
गुटका
आदि के कारखानों को बंद कराना होगा। जो धंधे महिलाओं
के शारीरिक प्रदर्शन पर टिके हुए हैं,
वे रोके
जाएंगे। महंगे होटलों,
महंगी
कारों,
जुआ,
शराबघरों
या कैबरे हाउसों में नाच आदि को खत्म करने का प्रयास
किया जाएगा। देश में पैदा होनेवाली चीजें,
जैसे दवा,
कपड़ा,
पंखा,
काजू,
साइकिल
आदि,
जब
भारतीयों की जरूरतों से ज्यादा होंगी,
तभी उनका
निर्यात होना चाहिए। इसी तरह,
उन
आयातों पर रोक लगाई जाएगी जिनकी आम भारतीयों को जरूरत
नहीं हैं या जो उनके हितों के विरुध्द हैं। राष्ट्रपति,
राज्यपाल,
प्रधान
मंत्री,
मुख्य
मंत्री,
मत्री,
सांसद,
विधायक,
अधिकारी
आदि से छोटे घरों में और सादगी के साथ रहने का अनुरोध
किया जाएगा। उनसे कहा जाएगा कि एयरकंडीशनरों का
इस्तेमाल खुद करने के बजाय वे उनका उपयोग अस्पतालों,
स्कूलों,
वृध्दाश्रमों,
पुस्तकालयों आदि में होने दें। रेलगाड़ियों,
सिनेमा हॉलों,
नाटकघरों
आदि में कई क्लास न हों। सभी के लिए एक ही कीमत का
टिकट हो।
चार वर्ष बाद का कार्यक्रम
चार वर्षों में इस तरह का वातावरण बनाने में सफलता
हासिल करना जरूरी है कि राजनीति की धारा को प्रभावित
करने में सक्षम हुआ जा सके। हम राज्य सत्ता से घृणा
नहीं करते। उसके लोकतांत्रिक अनुशासन को अनिवार्य
मानते हैं। हम मानते हैं कि बहुत-से बुनियादी परिवर्तन
तभी हो सकते हैं जब सत्ता का सही इस्तेमाल हो। इस
अभियान का उद्देश्य नए और अच्छे राजनीतिक नेता,
कार्यकर्ता और दल पैदा करना भी है। लेकिन जिस संगठन के
माध्यम से उपर्युक्त कार्यक्रम चलेगा,
उसके
सदस्य चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। जिन्हें चुनाव लड़ने की और
सत्ता में जाने की अभिलाषा हो,
उन्हें
संगठन से त्यागपत्र देना होगा।
राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के इस आंदोलन से जरूरी नहीं कि
किसी एक ही राष्ट्रीय दल का गठन हो। कई राजनीतिक दल बन
सकते हैं,
ताकि उनमें स्वस्थ और लोकतांत्रिक प्रतिद्वंद्विता हो
सके। जो लोग सत्ता में शिरकत करेंगे,
उनसे यह
अपेक्षा की जाएगी कि वे मौजूदा संविधान को,
यदि उसके
कुछ प्रावधान जन-विरोध पाए जाते हैं तो उनकी उपेक्षा
करते हुए,
सख्ती से
लागू करने का प्रयत्न करें। बुरे कानूनों को खत्म
करें। अच्छे और जरूरी कानून बनाएं। सत्ताधारियों पर
दबाव डाला जाएगा कि
कानून
बना कर आर्थिक विषमता घटाएं,
संपत्ति
का केंद्रीकरण खत्म करें। निजी पूंजी और धन की सीमा
निर्धारित करें। किसानों सहित सभी को उसकी उपज और
उत्पादन का उचित मूल्य दिलाने का प्रयत्न करें। सभी के
लिए सम्मानजनक जीविका का प्रबंध किया जाए। गृहहीनों को
तुरंत रहने का स्थान दिया जाए। इसके लिए शिक्षा
संस्थाओं,
थानों,
सरकारी व
निजी बंगलों,
दफ्तरों
आदि के खाली स्थान का उपयोग किया जा सकता है। सभी
नीतियों में जनवादी परिवर्तन ले आएँ।
संगठन
:
जाहिर है,
यह सारा
कार्यक्रम एक सांगठनिक ढांचे के तहत ही चलाया जा सकता
है। खुदाई फौजदार व्यक्तिगत स्तर पर भी कुछ काम कर
सकते हैं,
पर संगठन की उपयोगिता स्वयंसिध्द है। शुरुआत गाँव तथा
मुहल्ला स्तर पर संगठन बना कर करनी चाहिए। फिर
धीरे-धीरे ऊपर उठना चाहिए। जिस जिले में कम से कम
एक-चौथाई कार्य क्षेत्र में स्थानीय संगठन बन जाएं,
वहां
जिला स्तर पर संगठन बनाया जा सकता है। राज्य स्तर पर
संगठन बनाने के लिए कम से कम एक-तिहाई जिलों में जिला
स्तर का संगठन होना जरूरी है। राष्ट्रीय संगठन सबसे
आखिर में बनेगा। सभी पदों के लिए चुनाव होगा। सदस्यों
की पहचान के लिए बाईं भुजा में हरे रंग की पट्टी या
इसी तरह का कोई और उपाय अपनाना उपयोगी हो सकता है।
इससे पहचान बनाने और संगठित हो कर काम करने में सहायता
मिलेगी।
कार्य प्रणाली
: यह इस
कार्यक्रम का बहुत ही महत्वपूर्ण पक्ष है। जो भी
कार्यक्रम या अभियान चलाया जाए,
उसका अहिंसक,
लोकतांत्रिक,
शांतिमय
तथा सद्भावपूर्ण होना आवश्यक है। प्रत्येक कार्यकर्ता
को गंभीर से गंभीर दबाव में भी हिंसा न करने की
प्रतिज्ञा करनी होगी। सभी निर्णय कम से कम तीन-चौथाई
बहुमत से लिए जाएंगे। पुलिस तथा अन्य संबध्द
अधिकारियों को सूचित किए बगैर सामाजिक दबाव,
सामाजिक
अंकेक्षण,
और
सामूहिक संघर्ष का कोई कार्यक्रम हाथ में नहीं लिया
जाएगा। अपील,
अनुरोध,
धरना,
जुलूस,
जनसभा,
असहयोग आदि उपायों का सहारा लिया जाएगा। आवश्यकतानुसार
अभियान
के नए-नए तरीके निकाले जा सकते हैं। किसी को अपमानित
या परेशान नहीं किया जाएगा। जिनके विरुध्द आंदोलन होगा,
उनके साथ
भी प्रेम और सम्मानपूर्ण व्यवहार होगा। कोशिश यह होगी
कि उन्हें भी अपने आंदोलन में शामिल किया जाए। संगठन
के भीतर आय और व्यय के स्पष्ट और सरल नियम बनाए
जाएंगे। चंदे और आर्थिक सहयोग से प्राप्त प्रत्येक
पैसे का हिसाब रखा जाएगा,
जिसे कोई भी देख सकेगा। एक हजार रुपए से अधिक रकम बैंक
में रखी जाएगी।
स्थानीय
स्तर पर कार्यकर्ता समूह काम करेंगे। वे सप्ताह में
कुछ दिन सुबह और कुछ दिन शाम को एक निश्चित,
पूर्वघोषित स्थान पर (जहां सुविधा हो,
इसके लिए
कार्यालय बनाया जा सकता है) कम से कम एक घंटे के लिए
एकत्र होंगे,
ताकि
जिसे भी कोई कष्ट हो,
वह वहां
आ सके। कार्यक्रम की शुरुआत क्रांतिकारी गीतों,
गजलों,
भजनों,
अच्छी
किताबों के अंश के पाठ से होगी। उसके बाद लोगों की
शिकायतों को नोट किया जाएगा तथा अगले दिन क्या करना है,
कहां
जाना है,
इसकी योजना बनाई जाएगी। जिनके पास समाज को देने के लिए
ज्यादा समय है जैसे रिटायर लोग,
नौजवान,
छात्र,
महिलाएं,
उन्हें
इस कार्यक्रम के साथ विशेष रूप से जोड़ा जाएगा।
काम करने के कुछ नमूने
(1) पाँच कार्यकर्ता निकटस्थ सरकारी अस्पताल
में जाते हैं। अस्पताल के उच्चतम अधिकारी से अनुमति ले
कर वार्डों,
ओपीडी,
एक्सरे आदि विभागों का मुआयना करते हैं और लौट कर
अधिकारी से अनुरोध करते हैं कि इन कमियों को दूर किया
जाए। कमियां दूर होती हैं या नहीं,
इस पर
निगरानी रखी जाती है। उचित अवधि में दूर न होने पर
पुलिस को सूचित कर धरना,
सत्याग्रह आदि का कार्यक्रम शुरू किया जाता है।
(2)
कुछ कार्यकर्ता पास के सरकारी स्कूल में जाते हैं।
प्रधानाध्यापक से अनुमति ले कर स्कूल की स्थिति के
बारे में तथ्य जमा करते हैं और प्रधानाध्यापक से कह कर
कमियों को दूर कराते हैं। प्रधानाध्यापक स्कूल के
लोगों से बातचीत करने की अनुमति नहीं देता,
तो
लगातार तीन दिनों तक उससे अनुरोध करने के बाद स्कूल के
बाहर सत्याग्रह शुरू कर दिया जाता है।
(3)
कार्यकर्ता राशन कार्ड बनाने वाले दफ्तर में जाते
हैं और वहां के उच्चाधिकारी को अपने आने का प्रयोजन
बताते हैं। राशन कार्ड के लिए आवेदन करने वालों सभी
व्यक्तियों को उचित अवधि में कार्ड मिल जाया करे,
यह
व्यवस्था बनाई जाती है। जिनका आवेदन अस्वीकार कर दिया
जाता है,
उन्हें
समझाया जाता है कि कौन-कौन-से दस्तावेज जमा करने हैं।
उदाहरण के लिए,
दिल्ली
में किराए के घर में रहने वाले किसी व्यक्ति के पास
निवासस्थान का प्रमाणपत्र नहीं है,
तो कार्यकर्ता मकान मालिक से आग्रह कर उसे किराए की
रसीद या कोई और प्रमाण दिलवाएंगे।