राष्ट्रबोध की भावना और साहित्य
डॉ. विनय राजाराम
राष्ट्र
किसी व्यक्ति का न होते हुए भी व्यक्ति का होता है,
जाति का न होते हुए भी जाति का होता
है, राजा का न होते हुए भी
राजा का होता है। कोई किसी से अलग होकर अस्तित्ववान्
नहीं हो सकता। अपने अस्तित्व के लिए राष्ट्र के
अस्तित्व की रक्षा करना ही राष्ट्रीय चेतना है वस्तुतः
राष्ट्र किसी व्यक्ति, जाति
अथवा नेता की संपत्ति नहीं होता,
बल्कि इन सबके सम्मिलित प्रयत्न से
समय को गतिमान करती हुई सामूहिक चेतना जब सक्रिय होती
है तो वही मानो राष्ट्र का रूप ले लेती है। व्यक्ति,
धर्म, राजनीति
और इन सबसे बढ़कर संस्कृति के समन्वय से राष्ट्र बनता
है। मनुष्य की जातीय भावना जब निर्वैयक्तिक रूप लेकर
सार्वजनीन हो जाती है, तब एक
राष्ट्र का निर्माण होता है।
भारतीय साहित्य अपने प्रारम्भ से ही
किसी संकीर्ण राष्ट्रबोध से कभी नहीं जुड़ा है। भारत
अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रीय पहचान के साथ सदैव वैश्विक
महत्ता से जुड़ा रहा है। विश्व को 'वसुधैव
कुटुम्बकम्' का नारा तो भारत
ने ही दिया था जो वर्तमान समय के 'विश्वग्राम'
से कहीं बहुत बेहतर था। 'वसुधैव
बुटुम्बकम्' की भावना में जो
सर्वात्मीयता का भाव है वह 'वैश्विक
ग्राम' में पहुँचकर संकीर्ण
भोग-वाद का प्रथम चरण बन गया है।
भारत अपने राष्ट्र की परिकल्पना में कभी संकुचित नहीं रहा है। हिमालय पार के मानसरोवर से प्रारम्भ होकर कन्या कुमारी तक, असीरिया से लेकर इण्डोनेशिया तक भारत का अखण्ड विस्तार रहा है। भारतीय साहित्य, विशेषकर संस्कृत साहित्य में यह विशाल भारत राष्ट्र अपने सम्पूर्ण गौरव के साथ खूब स्पष्ट हुआ है। व्यापक राष्ट्रबोध का भाव भारती वाड्मय की विशेषता है। यही वह भाव है जो हमारी सोच को संकीर्णता से बचाकर व्यापक फलक प्रदान करता है।
कंबोडिया के हिन्दू मंदिर हों या अफगानिस्तान की बुध्द प्रतिमाएं, मानसरोवर के घाटों के रूप में 'मानस' के सोपान हों या सुदूर दक्षिण में वानर सेना द्वारा निर्मित सेतुबंध का सत्य, सर्वत्र भारतीय वाड्मय के व्यापक राष्ट्रबोध के ही दर्शन होते हैं।
हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय भाव बोध के मायने कई बार बदले। जिस काल-खण्ड में भारत की छोटी-छोटी रियासतें आपसी लड़ाइयों में उलझी थीं, उस काल-खण्ड की मांग के अनुरूप साहित्य में एक प्रकार का क्षेत्रीय राष्ट्रवाद उभरा, जिसमें राष्ट्रीय अस्मिता-बोध के स्थान पर सीमित-संकुचित अभिमान-बोध ने अपना वर्चस्व स्थापित किया। दरअसल उस कालखण्ड की यही आवश्यकता थी, किन्तु क्षेत्रीयता में डूबा वह अभिमान-अस्मिता का बोध सीमित, एकांगी और एक पक्षीय होने के कारण कई मायनों में घातक रहा।
क्षेत्रीयता का वही भाव जब विस्तार पाकर शिवाजी की महत्वाकांक्षा से जुड़ा, लक्ष्मीबाई और टीपू सुल्तान के स्वाभिमान से जुड़ा,तो राष्ट्र-बोध बन गया। खण्ड-खण्ड क्षेत्रीयता का भाव जुड़कर ही विशाल राष्ट्र की राष्ट्रवादी भावधारा का रूप ले लेता है। जेसे मनुष्य रूपी इकाई की श्रेष्ठता समाज की श्रेष्ठता का आधार है, वैसे ही संभवतः क्षेत्रीयता का भाव यदि व्यापक अर्थग्राही है, तो वह एक श्रेष्ठ अस्मिता बोध को जन्म देगा ही।
इतिहास के उस काल खण्ड में यदि
विभाजित राष्ट्र-बोध एक जुट हो जाता तो भारतीय
स्वतन्त्रता का स्वरूप ही कुछ और होता। साहित्य समाज
की वाणी होता है, अतः
राष्ट्र-बोध को मुखरित करने का कार्य सदैव से
साहित्यकार करता रहा है। चन्दबरदाई हों या भूषण,
अपने-अपने अनुरूप इन कवियों ने
राष्ट्रीय अस्मिता के किसी न किसी स्वरूप को उभारने का
भरपूर प्रयत्न किया।
भारत जब स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ रहा था तब भी राष्ट्रीय अस्मिता-बोध को जागृत करने की महती आवश्यकता थी। यह काम कुछ कठिन था। एक ओर पाश्चात्य सभ्यता-मिश्रित ऐशो-आराम की जीवन-शैली थी, तो दूसरी ओर निरक्षर, दरिद्र, रोटी को तरसता जमींदारों और हुक्मरानों के जुल्मों के बोझ तले दबा सामान्य जन। इन दो विपरीत परिस्थितियों के भीतर से राष्ट्र-बोध के भाव को जागृत करना आसान नहीं था। फिर भी, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनके समकालीन लेखकों ने पत्थर से पानी निकालने की तरह तत्कालीन समाज की सुषुप्त मानसिकता के भीतर राष्ट्रीय भाव-धारा का उत्स प्रस्फुटित किया, जिसने आगे चलकर झरने का रूप ले लिया।
भारतेन्दु जब हिन्दी क्षेत्र में राष्ट्रीय अस्मिता की जोत जगा रहे थे तब बंगाल में भी यह आंदोलन छिड़ रहा था। महाराष्ट्र-गुजरात और दक्षिण में भी साहित्यकारों द्वारा राष्ट्रीय अस्मिता को उद्वेलित कर जागृति लाने का कार्य प्रारम्भ हो चुका था। भिन्न-भिन्न कोणों में जलते दीपकों ने मिलकर एक महाज्योति का रूप धारण कर लिया।
हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु युग के उपरान्त एक ओर द्विवेदी युगीन लेखकों ने साहित्य में अनेकशः आदर्शों की स्थापना की तो दूसरी ओर मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा नवीन तथा दिनकर जैसे विशुध्द राष्ट्रवादी कवि भ्ी उभरे। विशुध्द राष्ट्रवादी परम्परा स्वतन्त्र भारत में अधिक दिन तक न चल सकी। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारतीय राजनीति और भारतीय परिवेश ने जो स्वरूप अख्तियार किया, वह राष्ट्रवादी विचारधारा से धीरे-धीरे दूर होता चला गया। स्वातन्त्रयोत्तर छायावादी कवि प्रसाद ने 'मानव' को महत्ता देते हुए न केवल 'कामायनी' की रचना की, अपितु इतिहास के माध्यम से देश की खोई हुई अस्मिता को जागृत करने का महत कार्य भी किया, किन्तु उन्हीं के समकालीन कवि पंत आगे चलकर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुए बिना न रह सके। वह बात और है कि पंत पर यह प्रभाव अत्यंत कम समय तक रहा। शीघ्र ही उनका मोहभंग हुआ और वे अरविन्द दर्शन की ओर मुड़ गए। बाद के कवि प्रगतिशीलता के नाम पर मार्क्सवाद तथा रूस से जुड़े। लाल रूस को ढाल मानते-मानते हमारे साहित्यकार लालमय होते चले गए। वे यह भी भूल गए कि रूस का लालरंग रूस वासियों की अस्मिता का रंग था, न कि भारत की अस्मिता का। इस वैचारिक धरातल पर पहुँचकर मार्क्सवाद और प्रगतिशीलता का ऐसा घाल-मेल हुआ कि भारत का आधुनिक लेखक विशुध्द 'वर्गवाद' में बटकर रह गया।
ग्लोबलाइजेशन की बात करने वाले साहित्यकार तबके में 'नव-ब्राह्मणत्व' का सा भाव उदय होता चला गया और उसने देश की, देश की अस्मिता की, देश की ह्रासोन्मुखी संस्कृति की चिन्ता करने वाले लेखकों को दोयम दर्जे का लेखक घोषित करके समूचे समय को अनेक प्रकार से गुणात्मक हानि पहुँचाई जिसका आकलन आज नहीं तो कल इतिहास अवश्य करेगा।
साहित्य में चल
रहे इस वर्ग-विभाजन का एक सीधा परिणाम यह निकला कि
लोगों ने देश की चिंता ही छोड़ दी,
आदर्श तथा श्रेष्ठता की चिंता छोड़ दी।
परिणाम न केवल भयावह और घिनौने रूप में सामने आ रहा है,
अपितु एक 'ब्लेक
होल' जैसे शून्य को सामने ला
कर उपस्थित कर रहा है।
राष्ट्रवाद के नाम पर साहित्य में नारेबाजी हो यह कौन कहता है? दरअसल देश की आवश्यकता के अनुरूप राष्ट्रवाद भी परिवर्तित होता रहता है। कभी ओज भरे गीतों की आवश्यकता थी तब 'वन्देमातरम्' जैसे गीत लिखे गए, जिन्हें सुनने मात्र से मन-प्राण रोमांचित हो उठता है। वह समय 'स्थूल-युध्द' का समय था। इस स्थूल-युध्द के उपरान्त भावनात्मक लड़ाई का दौर भी आया जब भाव-प्रधान लेखन ने अपना काम बखूबी निभाया। गाँधीजी का समस्त लेखन भावनात्मक स्तर पर भारत की सोई हुई जनता को जगाने का रहा है। आज जब हमारे देश में सूक्ष्म सांस्कृतिक आक्रमण जारी है तब हमें उसी प्रकार से उसका सामना भी करना होगा।सूक्ष्म रूप से जारी सांस्कृतिक आक्रमण का उत्तर भी हमें उसी स्तर पर पहुंचकर देना होगा। आकाश मार्ग से, विज्ञापनों द्वारा, भाषा के स्तर पर या 'मीडिया' के माध्यम से जहाँ से भी, जैसे भी आक्रमण हो रहे हैं वहाँ, उसी प्रकार उनका प्रतिकार करना आवश्यक है।
राष्ट्रीयता का अर्थ आज वीर रस की कविताओं से नहीं लिया जा सकता। आज तमाम राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही राष्ट्रवाद का पर्याय है। आतंकवाद, संकीर्ण जातिवाद, बेरोजगारी, राष्ट्रीय संपदा का अपव्यय, पर्यावरण संरक्षण जैसे तमाम मुद्दे आज राष्ट्रीय मुद्दे हैं जिन पर खुल कर कलम चलाने की आवश्यकता है। भारत की अस्मिता, भारत की संस्कृति, भारत की भाषा सब कुछ इस समय दाव पर है। इनको बचाने का हर संभव प्रयत्न करना होगा। आज के समय की, आज के साहित्य की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम अपनी संस्कृति को, अपनी भाषा को, अपने वाड्मय को सहेज पाएं।
यद्यपि युग के अनुरूप आधुनिकीकरण की प्रक्रिया सहज-स्वाभाविक है और यथार्थ के बिना साहित्य-सृजन असंभव है, तब भी साहित्य यदि यथार्थ की ही अभिव्यक्ति मात्र होता तो आज समाचार-पत्रों से अधिक सच्चा साहित्य भला क्या होता?
निश्चित ही साहित्य मात्र यथार्थ की अभिव्यक्ति भर नहीं है, वह समाज की अन्य अनेक जरूरतों के लिए भी है। प्लेटो जैसे कला-विरोधी दार्शनिक ने भी अंततः समाजोपयोगी कला को स्वीकृति दी थी। इसी समाजोपयोगी भाव के भीतर ही वह सब कुछ समाया है जिसे हम राष्ट्र-बोध कह सकते हैं। यह राष्ट्र-बोध किसी वाद की परिधि में नहीं आता है। यह भी सच है कि ऐसे व्यापक राष्ट्र-बोध की अभिव्यक्ति के बिना साहित्य बेमानी हो जाएगा, शून्य में खो जाएगा। क्या इस नई सहस्राब्दि में हम अपनी अस्मिता, अपने गौरव और अपने राष्ट्रबोध को फिर से स्थापित कर पाएंगे?
डॉ. विनय राजाराम
प्राध्यापक हिंदी
भोपाल, मध्यप्रदेश
