लोककथा
कुटिया के आगे सिया सामने हैं ठाड़े राम
लव-कुस जवान पूत मइया के दहिन बाम !
राम राजवेष, अति नव सुकुँआर गात,
चौंकि पहचाने देखि कुँवरन को सीय साथ !
सिया थकी हारी देह कैसी दुबराय गई,
केसन में बिच-बिच सपेदी झलकाय रही !
घाम सीत सेव करत आस्रम में जनम गयो
रूख देह, गौर बरन कइस झँवराय गयो!
महाबाहु लव-कुस सुदर्सन वीरवेस धरे
स्याम-गौर कुँवर दोउ देखि राम बोलि परे
मोरे हो पूत, युवराज करौं चलो साथ
सिया, सपथ सत की करइबे सभा के माँझ !
मेरो अस्वमेध जज्ञ सुखद समापन पाय
सून सिंहासन मोर कुँवर लेहु अपुन दाय !
व्यक्त करे देत मुखर तीखो सिया को मौन
खरी बात गूँज भरे चारिउँ दसा में जौन !
ज्वान लरिकन की माई सपथ को कौने काम
लाज नहीं लगी, अब काहे चले आये राम ?
जनम दुर्वाद सुने, भरे गरभ ठेल दिहिन
सपथ ना करिबे अब अइस जनम काट दिहिन,
जनम देइ दोऊ पूत पाले बन में अकेल
रघुकुल मे इहै मान लरिकन की माय केर ?
मेरो तमासा करि आपुन सुजस 'के लाग,
ऐसो अपमान सहिबे की और नही ताब !
मोरा कोई नाथ नहीं जाओ तुम राज करो
ना ही केहू की आस आपुन जस सेंत धरो !
कोऊ नहीं साथ ,नहीं मोर कहूँ राज-पाट,
जो पै बिसबास नहीं तहाँ नहीं कोऊ आस
एक अपराध इहै नारी का जनम लिहिन
दूजो दोष इहै रहै तुअ से जो ब्याह किहिन
बेबस बिहाल तौ हू मरी ना तीसर कसूर
तुमसे चिरौरी नाहीं ,दीन ह्वै पुकारी नहिन !
ज्वान पूत ठाड़े कइस बोल बोल रह्यो बाप
सपथ न करिबे, सुनि लीनो इहै भयो पाप !
बेबस हूँ वन हू ते चाहे निकारो और
धरती ही धरिहै जौन कहूँ नायँ रहे ठौर
आपै चली जाइत,बच्यो है कौन मोर काज !
पत न रखी पति कहात राम तुम्हैं नहीं लाज!
चुपैचाप निकरी घने बन में विलाय गईं
दोऊ पूत खोज रहे कहूँ ना दिखाय रहीं,
ऐसी कहाँ गई सीय भुइयाँ में समाय गई
व्यकुल भे राम कहाँ खोजौं और कौन विधि
गाँस सी हिया में लगी, सिया जो जनाय गई !
आँख ना उठावैं ,बोल मुख पे न आवै,
मोरी सारी मरजाद आज जानकी के साथ गई !
नैन में हिकारत लै दोउ पूत निरखें मुख
हाथ मलैं राम जाकी पतनी ही त्यागि गई!
प्रतिभा
सक्सेना
1341,Parsons
Folsom C.A . 95630,
U.S.A.
