छत्तीसगढ़ की दो लोककथाएँ
जयप्रकाश मानस
एकः कौन सबसे बड़ा ?
देवर्षि नारद बेचैन थे। उन्हें कुछ भी समज नहीं आ रहा था कि इस संसार में सबसे बड़ा कौन है ? जब वे थक गए तो हर बार की तरह भगवान विष्णु के पास जा पहुँचे।
नारद जी ! सबसे बड़ी तो यह पृथ्वी ही दिखती है। इसलिए पृथ्वी को सबसे बड़ी मान सकते हो भगवान ! पृथ्वी कैसी बड़ी ? वह तो सागर के घेरे में पढ़ी।
हाँ नारद ! समझो सागर ही बड़ा !
सागर कैसे बड़ा ! वह तो अगस्त्य मुनि के अंजलि में बूँद–सा पड़ा ।
तब तो अगस्त्य ही बड़े ।
अगस्त्य कैसे बड़े ? वे भी आकाश में जुगनू-सा टिमटिमाते पड़े।
ठीक कहते हो नारद आकाश ही बड़ा।
आकाश कैसे बड़े ? वे क्या वामन के चरण में नहीं पड़े ?
विष्णु जी कुछ मुस्करा पड़े। नारद ने कहा- देव ! वामन का अवतार तो आपने ही धारण किया था। इसलिए आप ही न बड़े हुए !
विष्णु जी ने झट से कहा- भगवान कैसे बड़े ? वे तो हरदम संत के प्रेम में पड़े । नारद ! इसलिए सबसे बड़ा प्रेम ही न हुआ ।
नारद जी को समाधान मिल चुका था।
दोः सुगन्ध और दुर्गन्ध
महादेव और पार्वती एक बार जंगल घूमने के उद्देश्य से निकल पड़े - पृथ्वी लोक की ओर।
दोनों को जंगल की सैर में आंनद आ रहा था। तरह-तरह की वनलताएं, तरह-तरह के वृक्ष। अलग-अलग पखेरूओं की अलग-अलग धुन । हर फल का स्वाद अपने में खास और मजेदार । रंग-बिरंगी तितलियाँ । मन को भरमाने वाले हिरण, सांभर, चीतल, खरहा, शाही, वनमुर्गी, नेवले, न जाने कितने जीव-जन्तु। शीतल मंद और महकती हवा। गीत गाते नदी-नाले झरने । लुभावनी पर्वत श्रृंखला । हरी-भरी घाटियाँ । भाँति-भाँति के चिरई-चिरगुन ।
घूमते-घूमते दोनों मणि जैसे फूल से लदे एक पेड़ के पास पहुँचे । पीले-पीले फूलों की सुगंध से आसपास का वातावरण गमक रहा था। वे दोनों मादक गंध से जैसे खींचे चले आए पेड़ के नीचे । पेड़ से महादेव पार्वती के सिर पर कुछ फूल झरने लगे। मानो पेड़ स्वागत कर रहा हो।
पार्वती की इच्छा पर महादेव भी पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे । कुछ क्षण पश्चात् पार्वती ने महसूस किया कि इस सुगन्धित पेड़ के नीचे कोई दुर्गन्ध भी है।
“भोलेनाथ ! मणि और सुगन्धित फूल वाले इस पेड़ के नीचे यह दुर्गन्ध क्यों ? यह क्या लीला है प्रभु !” – पार्वती की जिज्ञासु आँखे महादेव को पूछने लगीं।
“पार्वती ! यह महुए का पेड़ है। यह सुगन्ध इसके फूलों के कारण है और इस फूलों के पड़े-पड़े सड़ जाने के कारण ही यह दुर्गन्ध पैदा हो रही है।”
“क्यों महाराज ! इन फूलों का कोई उपयोग नहीं है जो ये पड़े-पड़े सड़ रहे हैं ? ”
“नहीं पार्वती। इनकी प्रकृति के कारण इनका उपयोग कोई नहीं करता ।”
“भोले बाबा। दुर्गन्ध है तो क्या हुआ । इन पर कृपा कर दीजिए न ! कितना अच्छा पेड़ है, कितने अच्छे फूल हैं। खाने में स्वादिष्ट भी लग रहें है।”
भोले नाथ को हरदम की भाँति पार्वती का मान रखना पड़ा। उन्होंने वरदान दे दिया – “महुए ! आज से तेरे फूल को जंगल निवासी,गाय-बैल, सभी खायेगे। डोरी(महुए के फल) से तेल भी निकलेगा, जो वनदेवता की पूजा में काम आयेगा। जो इसे सड़ाकर कोसना (शराब) बनाकर पीयेगा, उसे भी कुछ देर के लिए आनन्द आएगा, किन्तु उसके मुँह एवं जीवन से भी दुर्गन्ध आयेगी ।”
पार्वती जी आज गद्-गद् थीं, महुए का पेड़ भी । ऐसा माना जाता है कि तब से जंगल के आदिवासी, अमीर-गरीब, गाय-बैल सभी महुए को खाते चले आ रहें है और डोरी तेल आज भी गाँव में लोगों के लिए बहुत उपयोगी तेल है। तब से ही महुए की शराब पीने वाले को अच्छा नहीं समझा जाता है।
जयप्रकाश मानस
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