राजनीति
एक दिन बिल्ली ने चूहे को पुचकारते हुआ कहा-
“तुम
व्यर्थ ही मुझसे डरते हो। मेरे साथ रहने की आदत डाल
लोगे, तो मौज करोगे।”
“मैं
तुम्हारी राजनीति में नहीं आने वाला।”
चूहे ने कहा और अपने प्राण बचाने झट से बिल में घुस
गया
।
बिल्ली किसी दूसरे चूहे की तलाश में चल पड़ी। बहुत
घूमने के बाद जब वह लगभग निराश हो चुकी थी कि तभी एक
चूहा उसके पास आ गया, उसने कहा-
“मेरे
पड़ोसी चूहे के आतंक से मुझे बचाओ जो मेरा सारा अनाज
खा जाता है और बहुत मोटा होता जा रहा है और अक्सर मुझे
धमकाता भी है।”
बिल्ली को अपनी बात बनती दिखाई दी। वह छोटे से चूहे के
साथ बड़े चूहे की खबर लेने पहुँच गई । उसने सोचा,
“पहले
उस चूहे को देख लूँ
!
यह मूर्ख तो अब जाएगा कहाँ
!”
विवशता
वर्मा साहब से उनकी श्रीमती जी बोली-
“क्या
बात है जी !
इस बार आप कोई जुगाड़ नहीं भिड़ा रहे हैं। क्या हमारी
दीवाली ऐसे ही रूखी-सूखी मनेगी
?”
“क्या
करें मजबूरी है। इस आदर्श चुनाव संहिता ने तो हमारे
पाँव बाँध कर ही रख दिए हैं न नियुक्ति, न तबादला, न
निलंबन और न बहाली।”
उनके चेहरे पर अजीब किस्म की विवशता थी ।
चोरी
बूढे रामू काका से मोहल्ले के समाज सुधारक रोहन बाबू
ने पूछा- “जब
तुम्हें मालूम हो गया था कि चोरी किसने की थी तो तुमने
थाने में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई
?”
“क्या
फायदा बाबू !
थाने वाले तो अपना हिस्सा पहले ही तय कर चुके थे।”
वह बोला और आगे बढ़ गया।
शिक्षक
परीक्षा में एक प्रश्न पूछा गया था -
“शिक्षक
का प्रमुख कार्य क्या है
?”
एक परीक्षार्थी ने उत्तर में लिखा था-
“घर-घर
जाकर सर्वे करना ।”
शराबी
शराबियों को पकड़ने के लिए एक सिपाही दस्ता नियुक्त
किया गया । अगले दिन सुबह थानेदार को दस्ते के सारे
सिपाही नशे में धुत् थाना परिसर में पड़े मिले।