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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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   प्रवासी कविता

 

 

खिड़की पर बोगनविलाः ग्यारह कविताएँ

 

1.

सुबह सुबह
सबसे पहले उठती है बोगनविला
खिड़की के बाहर

बाँह फैलाकर बुलाती हुई

जैसे नन्हें बच्चे को
बुलाती है माँ

बोगनविला जागती है
सूरज से भी पहले

 पूर्णिमा वर्मन

 

हिंदी अंतरजाल की चर्चित एवं प्रशंसित  संपादक । पिछले 25 सालों से लेखन, संपादन, फ्रींलासिंग, अध्यापन, कलाकर्म, ग्राफिक्स डिजायनिंग और जाल प्रकाशन के अनेक रास्तों से गुज़रते हुए फिलहाल यानी 1995 से शारजाह में साहित्यिक जाल पत्रिका अभिव्यक्ति-अनुभूति का कुशल संपादन और कलाकर्म में अग्रसर । कई प्रतिष्ठित संगठनों द्वारा सम्मानित ।

कृति- वक्त के साथ

संपर्क- संपादक, अभिव्यक्ति, शारजाह, युएई

  2

खिड़की
बोगनविला को झुलाती है बाहों में
आकाश को पकड़ लाती है कमरे में
उजाले को देती है नई दिशाएँ
और

अंधेरे को बुहार कर फेंक देती है

बाहर

 

3.
खिड़की बिछाती है
कमरे में धूप की चादर

बोगनविला बाँधती है उसके ओर छोर
गर्म हवा के गुब्बारे की तरह
उड़ान को तैयार हो जाती है कल्पना
यों ही कमरे में बैठे

 

4.

धूप को
दीवार पर चिपकाती है बोगनविला

खिड़की तार पर आकाश सुखाती है
मैं कविताएँ तहाती हूँ
पन्नों में
दिन गुज़रता है
हौले

 

5.

बोगनविला झरते है
रुक कर ठहरते है
खिड़की की देहरी पर
उचक कर
उछलते हैं नीचे
भागते फिरते हैं आँगन में
डाली बाँह हिला हिला कर

बरजती है
खिड़की मुसकाती है

 

6.

खिड़की पर खिली है बोगनविला
उमगा है रूप का दरिया
खिड़की के पार है

सौंदर्य खुलकर बिखरता हुआ
खिड़की भीतर
सिमटकर निखरता हुआ

 

7.

खिड़की में फूल हैं
फूलों में जीवन

दीवार के सन्नाटे को

भरती है
बोगनविला

 

8.
खिलती है
बोगनविला
झूमते हैं उल्लास के फूल

भरते हुए
रंग मौसम में
कल ये फूल ना भी रहें
उल्लास
!
रहेगा फिर भी नित्य नए फूलों में

उल्लास रुकता नहीं
खिड़की के सम्मान में
आत्मा में
व्यक्तित्व में
निरंतर घुलता है

फूटकर झलकता है
खिड़की के सौंदर्य में

 

9.

मैं हूँ
खिड़की है
और बोगनविला

मैं और बोगनविला दोनो बतियाते है
हँसते खिलखिलाते हैं

खिड़की चुप रहती है

सिर्फ़ मुसकुराती है

 

10.

आसमान खो गया है रात में
सो गया है आँगन
ऊँघने लगी हैं दीवारें
धीमी पड़ गई है रात भर जलनेवाली बत्तियाँ

बोगनविला जागी है अबतक
मेरे सोने से पहले
कहने को
शुभ रात्रि

 

11.

खिड़की पर सरसराती
करवटें लेती है बोगनविला

चलो नीहारिकाओं तक चलें...

जागी हो अभी तलक?”
हाँ निर्मल चाँदनी जो है आकाश की राहों में
और हम चल पड़े
चाँद की नाव पर

 

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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