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खिड़की
बोगनविला को झुलाती है बाहों में
आकाश को पकड़ लाती है कमरे में
उजाले को देती है नई दिशाएँ
और
अंधेरे को बुहार कर फेंक देती है
बाहर
3.
खिड़की बिछाती है
कमरे में धूप की चादर
बोगनविला बाँधती है उसके ओर छोर
गर्म हवा के गुब्बारे की तरह
उड़ान को तैयार हो जाती है कल्पना
यों ही कमरे में बैठे
4.
धूप को
दीवार पर चिपकाती है बोगनविला
खिड़की तार पर आकाश सुखाती है
मैं कविताएँ तहाती हूँ
पन्नों में
दिन गुज़रता है

हौले
5.
बोगनविला झरते है
रुक कर ठहरते है
खिड़की की देहरी पर
उचक कर
उछलते हैं नीचे
भागते फिरते हैं आँगन में
डाली बाँह हिला हिला कर
बरजती है
खिड़की मुसकाती है
6.
खिड़की पर खिली है बोगनविला
उमगा है रूप का दरिया
खिड़की के पार है
सौंदर्य खुलकर बिखरता हुआ
खिड़की भीतर
सिमटकर निखरता हुआ
7.
खिड़की में फूल हैं
फूलों में जीवन
दीवार के सन्नाटे को
भरती है
बोगनविला
8.
खिलती है
बोगनविला
झूमते हैं उल्लास के फूल
भरते हुए
रंग मौसम में
कल ये फूल ना भी रहें
उल्लास!
रहेगा फिर भी नित्य नए फूलों में
उल्लास रुकता नहीं
खिड़की के सम्मान में
आत्मा में
व्यक्तित्व में
निरंतर घुलता है
फूटकर झलकता है
खिड़की के सौंदर्य में
9.
मैं हूँ
खिड़की है
और बोगनविला
मैं और बोगनविला दोनो बतियाते है
हँसते खिलखिलाते हैं
खिड़की चुप रहती है
सिर्फ़ मुसकुराती है
10.
आसमान खो गया है रात में
सो गया है आँगन
ऊँघने लगी हैं दीवारें
धीमी पड़ गई है रात भर जलनेवाली बत्तियाँ
बोगनविला जागी है अबतक
मेरे सोने से पहले
कहने को
शुभ रात्रि
11.
खिड़की पर सरसराती
करवटें लेती है बोगनविला
“चलो
नीहारिकाओं तक चलें...”
“जागी
हो अभी तलक?”
”हाँ
निर्मल चाँदनी जो है आकाश की राहों में”
और हम चल पड़े
चाँद की नाव पर