अनुचिंतन
डॉ. ज्ञान प्रकाश सिंह ‘ज्ञानी’
मन में उठते तूफ़ानों को
तुम को कैसे मैं दिखलाऊँ ।
बह गया विकट मझधारों में
तुम को कैसे समझाऊँ ।
आगे से मंज़िल निकल गयीं
मैं खड़ा रह गया ठगा हुआ ।
दुनिया ने सपने लूट लिए
मैं रहा सोचता जगा हुआ ।

माला के मोती बिखर गये
कुछ इधर गए कुछ उधर गये ।
उनको समेट लूँ होश न था
बस रहा देखता किधर गये ।
इसको ही दुर्दिन कहते हैं
दुर्भाग्य यही कहलाता है ।
जाने क्या-क्या होगा आगे
यह सोच हृदय घबड़ाता है ।
दुत्कार रहा है जग हरदम
पर तुम साथी मुख मोड़ न लो ।
विपदा से भरे हुए पथ पर
मुझ को एकाकी छोड़ न दो ।
डॉ.
ज्ञान प्रकाश सिंह ‘ज्ञानी’
1 holly court,godley,
HYDE (Manchester )
UK, SK14 3DF
