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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   प्रवासी कविता

 

अनुचिंतन


डॉ. ज्ञान प्रकाश सिंह ज्ञानी

 

मन में उठते तूफ़ानों को

तुम को कैसे मैं दिखलाऊँ ।

बह गया विकट मझधारों में

तुम को कैसे समझाऊँ ।

 

आगे से मंज़िल निकल गयीं

मैं खड़ा रह गया ठगा हुआ ।

दुनिया ने सपने लूट लिए

मैं रहा सोचता जगा हुआ ।

 

माला के मोती बिखर गये

कुछ इधर गए कुछ उधर गये ।

उनको समेट लूँ होश न था

बस रहा देखता किधर गये ।

 

इसको ही दुर्दिन कहते हैं

दुर्भाग्य यही कहलाता है ।

जाने क्या-क्या होगा आगे

यह सोच हृदय घबड़ाता है ।

 

दुत्कार रहा है जग हरदम

पर तुम साथी मुख मोड़ न लो ।

विपदा से भरे हुए पथ पर

मुझ को एकाकी छोड़ न दो ।

 डॉ. ज्ञान प्रकाश सिंह ज्ञानी

 1 holly court,godley,

HYDE (Manchester )

UK, SK14 3DF

 

 

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