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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   कविता

 

पहाड़ की चार कविताएँ

 

सब हैं अज़नबी

निर्मल आकाश

कहाँ रहा अब

हो गया है धुआँ-धुआँ

हवाएं है बोझिल

लम्बा अन्तहीन कठोर पथ

दूर तक फैला है

तप रहा है

जीवन का क्षण-क्षण

 नरेश कुमार उदास

पहाड़

पृथ्वी का सुन्दरतम रूप

सब हैं अजनबी

कविता का विद्रोह

छायाहीन पगडणडियों पर

चल रहा हूँ

घर-आँगन

सब सिमट गए

बँटते चल गए

टुकड़ों में लगातार

अब तो दीवारें

मुँह चिढ़ा रही है

सब कुछ यहाँ

प्रेम-स्नेह-मानवता

इन दीवारों में

चिने जा चुके हैं

किससे कहूँ मन की व्यथा

किसके कन्धों पर

सिर रखकर

हल्का करूँ मन का बोझ

नहीं मिलता ऐसा इंसा

न मिली ऐसी जमीं

जो मेरे भीतर का दर्द समझे

जब-जब ढूढता हूँ नहीं मिलता

हमदर्द कोई

सब हैं अजनबी और बेगाने।

नरेश कुमार उदास

हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान

(सीएसआईआर), पालमपुर

हिमाचल प्रदेश - 176061

 

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