पहाड़ की चार कविताएँ
सब हैं अज़नबी
निर्मल आकाश
कहाँ रहा अब
हो गया है धुआँ-धुआँ
हवाएं है बोझिल
लम्बा अन्तहीन कठोर पथ
दूर तक फैला है
तप रहा है
जीवन का क्षण-क्षण
|
|
|
|||||||||
|
|
||||||||||
|
|
|||||||||||
|
|
||||||||||
|
छायाहीन पगडणडियों पर चल रहा हूँ घर-आँगन सब सिमट गए बँटते चल गए टुकड़ों में लगातार अब तो दीवारें मुँह चिढ़ा रही हैं सब कुछ यहाँ प्रेम-स्नेह-मानवता इन दीवारों में चिने जा चुके हैं किससे कहूँ मन की व्यथा किसके कन्धों पर सिर रखकर हल्का करूँ मन का बोझ नहीं मिलता ऐसा इंसा न मिली ऐसी जमीं जो मेरे भीतर का दर्द समझे जब-जब ढूढता हूँ नहीं मिलता हमदर्द कोई सब हैं अजनबी और बेगाने।
हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (सीएसआईआर), पालमपुर हिमाचल प्रदेश - 176061
|
|||||||||||
|
|||||||||||
|
|||||||||||