ई-पताः srijjangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

   कविता

 

पहाड़ की चार कविताएँ

 

पहाड़

पहाड़ तुमसे मिले मुझे

ऊँचाइयाँ, पहाड़

तुमसे मिले मुझे विशाल हृदय

 

पहाड़

तुम पर उगी तमाम वनस्पतियाँ

सबका जीवन चंगा करें

तुम पर फैली हरीतिमा

मन में जगाए रखे

 नरेश कुमार उदास

पहाड़

पृथ्वी का सुन्दरतम रूप

सब हैं अजनबी

कविता का विद्रोह

खिलने-फूलने की प्रक्रिया

सदा

 

पहाड़

तेरे चरणों में बहता निर्मल जल

धो दे मन की मैल सारी।

 

पहाड़

तुझसे मिले मुझे

अविचल खड़े रहने का हौसला

कठोर निर्णय लेने का संकल्प

मानवता के लिए

मर-मिटने का बल।

 

पहाड़

तेरे कन्धों पर झुके बादल

जल से लबालब भरे है

जो मेरी तपती रेगिस्तानी रूह को

तृप्त करेंगे

सीचेंगे इसकी उर्वरता

 

पहाड़

तुम हमेशा मेरे जीवन में

संग-संग रहना

ताकि हमेशा बहती रहे मन में

स्नेह-निर्मल जलधारा

खिलते रहें सम्वेदनाओं के फूल

अनुभूतियों का सागर

हमेशा-हमेशा

नरेश कुमार उदास

हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान

(सीएसआईआर), पालमपुर

हिमाचल प्रदेश - 176061

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com