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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   कथोपकथन

 

 

 

मैं तो व्यक्ति व्यंजक निबंध लिखता हूँ


साक्षात्कारः हारून रशीन खान

 

 

(पूर्व में लिया गया एक विशेष साक्षात्कार)

 

हारून रशीद खान- डॉ साहब, ललित निबंध क्या है ?इस नाम के पीछे कौन सी चीज़ व्यक्त होती है ?

 डॉ.विद्यानिवास मिश्र-पहले ललित और सुन्दर शब्द का अर्थ समझिए, सुन्दर ललित मनुष्य के द्वारा निर्मित जो सौन्दर्य होता है उसे ललित कहते हैं । ललित का मूल अर्थ यह है कि यह अनुपात और न्याय जहाँ स्थापित होता है वहाँ ललित होता है। ललित का अर्थ कोमल नहीं होता। ठीक जगह ठीक के साथ । तो इसलिए हम तो समझते हैं ललित शब्द (BELL LETTER) का अनुवाद है। हमारे यहाँ यह शब्द द्विवेदीजी के समय से चला। भाषा में रम्य रचना के नाम से चला। मैं स्वयं इस ललित निबंध को व्यक्ति व्यजक निबंध के अंतर्गत एक उपराशि मानता हूँ । ललित में कल्पना के स्वच्छंद की उड़ान ज्यादा है। उसकी एक कोटि है। मैं अपने थोड़े से निबंधों को ललित मानता हूँ। जैसे अपने जीवन में कोई घटना अनुभव बनता है। हम तो व्यक्ति व्यंजक निबंध पसंद करते हैं। जैसे रमेशचंद शाह का हमको ललित निबंधकार कहा जाना पसंद नहीं हैं। मैं तो व्यक्ति व्यंजक निबंध लिखता हूँ।

 

हारून रशीद खान- यूरोप में निबंध की दो परम्पराएं हैं एक मान्तेन की और दूसरी फांसिस बेकन की। क्या हिन्दी में कोई ऐसी समानान्तर परंपरा है, यदि है तो उसमें आप स्वयं को कहाँ पाते हैं ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र - ऐसा है कि इन निबंधों की चर्चा हुई। निबंध भी लिखे गये । हिन्दी की अपनी स्वतंत्रता है। निबंध भी लिखे-गये आत्मकथात्मक पालि साहित्य में । कथा साहित्य में भी पश्चिमी साहित्य से प्रभावित होकर निबंध लिखा गया ऐसा नहीं है । राजा शिवप्रसाद सिंह सितारे हिन्द ने निबंध लिखा। इन्होंने पश्चिमी साहित्य से प्रभावित होकर नहीं लिखा। अँगरेज़ी में भी बहुत से निबंधकार हैं। हिन्दी में अपनी अलग से परंपरा है। शुक्लजी के निबंध चिंतन प्रधान हैं। उनके निबंधों में दार्शनिकता भी है। 

 स्व.विद्यानिवास मिश्र

जन्म- 14 जनवरी, 1926

मृत्यु- 14 फरवरी, 2005

 

हिंदी और संस्कृत के अग्रणी विद्वान, प्रख्यात ललित निबंधकार, भाषाविद और चिंतक

सेवा-यात्रा

प्रारंभ में मध्य प्रदेश सरकार के सूचना विभाग से संबद्ध । 1956 से विश्वविद्यालय सेवा में और गोरखपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विद्यापीठ संस्कृत विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आचार्य, निदेशक अतिथि आचार्य और कुलपति के पदों को गरिमा प्रदान की । वाशिंगटन विश्वविद्यालय, सियाटल में अतिथि प्रोफेसर रहे तथा यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया बर्कले में महत्वपूर्ण शोध कार्य प्रस्तुत किए ।

पुरस्कार

डॉ. मिश्र को उनकी साहित्यिक योगदान के लिए भारतीय ज्ञानपीठ के 'मूर्तिदेवी पुरस्कार', 'शंकर सम्मान', 'विश्व भारती सम्मान', 'पद्मश्री' और 'पद्मभूषण', 'भारती,  भारती सम्मान',  'महाराष्ट्र भारती सम्मान', 'हेगडेवार प्रज्ञा पुरस्कार', साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान 'महत्तर सदस्यता', मंगला प्रसाद पारितोषिक, उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी से 'रत्न सदस्यता सम्मान' आदि कई सम्मानों से नवाज़ा गया ।

विशेष

भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासी बोर्ड के सदस्य थे । वह मूर्तिदेवी पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष के साथ-साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार चयन समिति के सदस्य भी थे । अपने अंतिम समय तक वे नवभारत टाइम्स इनसाइक्लोपीडिया आफ हिन्दूज के प्रधान सम्पादक एवं सहित्य अमृत नामक पत्रिका के सम्पादक पद पर काम करते रहे । देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों मैं समादृत ।

कृतियाँ

छितवन की छाँह, गाँव का मन, तुम चंदन हम पानी, मेरे राम का मुकुट भींग रहा है, भारतीयता की पहचान, रीति-विज्ञान,आदि लगभग 100 कृतियों का लेखन और संपादन

 

हारून रशीद खान - कुबेरनाथ राय ने ललित निबंध को साहित्यिक बतरस कहा है, लेकिन उनका साहित्य बतरस से अधिक ज्ञानरस लगता है । आपकी रसात्मकता के बिलकुल प्रतिकूल। क्या आप कुबेरनाथ राय के निबंधों के ऊपर कुछ कहना चाहेंगे ? इस टिप्पणी के संदर्भ में ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र - हम टिप्पणी इसलिए नहीं देना चाहेंगे हर आदमी की एक शैली होती है। मैं साहित्य देता हूँ । साहित्य का एकमात्र प्रयोजन है लोगों को चुनना । अपनी बात कहकर के लोगों को कुछ देना अपना उद्देश्य रहता है। मूल उद्देश्य तो यही है मानव चेतना। तो, बतरस तो माध्यम है, लक्ष्य नहीं है। कुबेरनाथ राय रसात्मक हैं।

 

हारून रशीद खान - आप यूरोपीय वाड़्मय के प्रख्यात विद्वान हैं। किन-किन पश्चिम लेखकों और निबंधकारों का आपकी सृजनशीलता पर प्रभाव है ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र- यूरोपीय साहित्य बहुत पढ़ा। उसका प्रभाव नहीं है। मान्तेन के निबंधों से हमारे निबंधों का कोई रिश्ता नहीं है। प्रताप नारायण मिश्र, हरिश्चंद आदि को पढ़ा। पश्चिम का साहित्य एक हवा की तरह से आता है और निकल जाता है।

 

हारून रशीद खान - डॉ. रामदरश मिश्र का कहना है कि पंडित विद्यानिवास मिश्र भी लेखक है और डॉ. विद्यानिवास मिश्र भी लेखक है, किंतु मैं उस लेखक की बात कर रहा हूँ जो केवल विद्यानिवास मिश्रजी है। रामदरश मिश्रजी की टिप्पणी मुझे अबूझ-सी लगी। क्या आप अपने लेखक व्यक्तित्व के इन तीनों आयामों पर प्रकाश डालेंगे ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र यह तो टिप्पणी डॉ. रामदरश मिश्र की है । आप उनसे पूछिए बहुश्रुत होना, आत्मीयता की चिंता की तलाश करना कौन कितना अपने को उपस्थित करके भी अनुपस्थित करता है दूसरी बातों को आपके सामने रखता है । अपनी चर्चा नहीं करना चाहिए । नहीं तो आत्मकथा हो जाएगी । मैं वर्षों से लिख रहा हूँ । उपेक्षा प्रधान, विचार प्रधान, आनंद के निबंध प्रतिभावों के निबंध, संस्कृति के निबंध । इसी पर डॉ. मिश्र ने लिखा होगा । मेरा जीवन अनेक यात्राओं मे बीता है ।

 

हारून रशीद खान आप भारतीय परम्परा को प्रगति विरोधी नहीं मानते, उसमे वृहत्तर संभावना तलाशते हैं लेकिन इस प्रगति सम्मत भारतीय परम्परा के बावजूद भारतीय विशेषतः हिंदू समाज कमोवेश ठहराव का शिकार रहा है । जिसके विरूद्ध आज तरह-तरह के सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन खड़े हैं, क्या आप महसूस करते हैं कि भारतीयता की अवधारणा भारतीय यथार्थ से कटी हुई है ? या वे जो आज की इस अवधारणा के प्रति राजनीतिक, सामाजिक सृजन कर रहे हैं ? क्या भारतीयता से परिचित हैं ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र प्रगति उसको मानते हैं जो सबको साथ लेकर चले । प्रगति वह नहीं है जो दूसरे को ढकेलकर चले । दूसरी बात ठहराव नाम की बात करते हैं जो गल्फ है । जो नीचे था ऊपर चला आया । एक व्यवसाय दूसरे व्यवसाय से नीचे रहा । मुसलमान हिंदू में एक संबंध की व्यवस्था है । एक चूड़ी बेचने वाला है हिंदू में भी मुसलमान में भी । समाज मे दोनों की आवश्यकता है । व्यवसाय एक दूसरे पर आवलंबन है । हमारे यहाँ दर्जी का नखरा हम बर्दाश्त करते हैं । यह उसका हक था । हम तो बहुत कुछ बर्दाश्त करते हैं । गाँव में रहते हैं तो चाचा होगा, चाची होगी, दीदी होगी । आज जाति के साथ राजनीति आ गयी है । यह दुर्भाग्यपूर्ण है । ये सब भाव ईर्ष्या करना । यह नहीं है कि सहज भाव से दूसरे से मिलना है । तुम अपने ताऊ से पूछो, हिंदू मुहर्रम में शरीक होते थे तमाम अब नहीं है यह बात सही है । अब प्रतिक्रिया है । आज नहीं कल बदलेगा । हम तो साफ कहते हैं हिंदू चाहे तो 14-15 करोड़ मुसलमान की हत्या नहीं कर सकते । उनके साथ रहने की लाचारी है । मानवीय संबंध मेरी भारतीयता की अवधारणा हर व्यक्ति के भीतर भी मौजूद है । कोई आंतरिक चेतना । रात को फूल न तोड़े, पेड़ न काटें, इसका संबंध भारतीय संस्कृति से है । सबके भीतर का भाव है । हिदुस्तानी भूमि का । दूसरा भाव है सबके भीतर एक दिव्य प्रकाश है । मुसलमान क्या सोचता है, मैं नहीं जानता । हमको पाकिस्तान में 1962 में एक मूसलमान मिला । तीन चार घंटे तक वह परेशान था, चलते-चलते कहा अपना वतन तो वतन ही रहता है, मुल्क बदल जाए तो क्या होता है । गंगा को प्रणाम कहना । जो अनुभव का मोह भारतीय में है, जो चला गया है वह छोड़ो । जो भी बीज बोया गया है अगर व मनुष्यता की चिंता होती तो शिक्षा की बात की जाती । अशिक्षा में हिम् है । इन चीजों का बोझ उठाई नहीं है, साझेदारी की बात की जाती है । 19 वीं शताब्दी में जितना साहित्य हिंदुस्तान में, फारसी में लिखा गया । वह फारस में नहीं । परिणाम यह है कि आप चले जाइए देखिए फारसी पढ़ाने वाले मुसलमान की संख्या ऊँगली पर है । अरबी जानने वाले मिल जाएँगे । फारसी में अनेक ग्रंथों का अनुवाद हुआ ।

 

हारून रशीद खान मार्क्सवादी आलोचक आपको एक हिंदूत्ववादी निबंधकार के रूप में रेखांकित करते हैं । क्या आप हिंदूत्व बोध पर प्रकाश डालेंगे ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र - प्रश्न तो मार्क्सवादी से पूछा जाना चाहिए । हम तो लेखक हैं । सारे विश्व को बताते हैं हम हिन्दू हैं । अगर यह गुनाह है तो ठीक है । उसमें विभाजन कर दिया जाता है हम मार्क्सवादी को बड़ा नहीं मानते । इसी माने में हम यह मानते हैं कि सभी विकल्प है । हमारा विकल्प न माने तो ठीक है । दुनिया ऐसी है कि लोग दूसरे की विकल्पता को स्वीकार करें । जो नहीं स्वीकार करेगा नहीं रह पाएगा । सच्चाई का विकल्प है, हमारे अलग विकल्प है । हम उनकी नादानी समझते हैं । ये समझने वाले को हम तोप से उड़ा तो नहीं देंगे ।

 

हारुन रशीद खान आजकल इधर के परिवेश को देखने से ऐसा लगता है, राष्ट्रीय निर्माण राजनीतिक उपक्रम है, साहित्यिक कृति नहीं । ऐसे में साहित्यकार की क्या भूमिका होनी चाहिए ? राष्ट्रीय संदर्भ में आप अपनी अर्थवत्ता कैसे स्थापित करेंगे ?

डॉ. निद्यानिवास मिश्र अभी हाल ही में मैंने एक पुस्तक लिखी है सपने कहाँ गये ?’ पिछले पचास वर्षों पर । ऐसा नहीं कि समस्या नहीं है, लेकिन जो संकल्प होना चाहिए, वह नहीं है । जो संकल्प लेना चाहिए था । साधारण आदमी की उपलब्धियाँ है अच्छी खासी । पर दो एक संकल्प लेना चाहिए । साहित्य तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ मूल्याँकन किया जाए । अभी आशा बनती है ।

 

हारुन रशीद खान क्या कारण है कि ललित निबंध के लेखक सबसे ज्यादा पूर्व उत्तरप्रदेश के हैं ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र और कोई कारण नहीं । अभी भी इस क्षेत्र के लोग बड़े शहर में दूर-दराज में जाते हैं । भोपाल में भोजपुरी सम्मेलन था बहुत से मुसलमान मेरी बोली सुनने आए । दूसरा कारण भोजपुर जनपदीय सरोकार इस क्षेत्र में ज्यादा है । तीसरा कारण है हिन्दी गद्य ढला ही यहीं पर । हिन्दी का साहित्यिक वृक्ष इसी क्षेत्र में पनपा, द्विवेदीजी, हरिश्चंद, रामचन्द्र शुक्ल ने ढाला । जयशंकर प्रसाद ने हिन्दी गद्य के रुप को निखारा है । उपन्यासकारों में डॉ. शिवप्रसाद सिंह आदि लोग है ।

 

हारुन रशीद खान इस सदी की मुख्य उपलब्धियाँ क्या है और आज की विसंगतियाँ ?

डॉ. विद्यानिवास मिश्र - विज्ञान की दृष्टि से अखण्डता की और जीवन की समग्रता की पहचान । जीव विज्ञान में एक दूसरे का जीवन सम्बन्ध है। एक व्यापक प्रभाव डाला। एक सूचना एकत्रित करना । केन्द्रीयकरण के नाते आज लोग कटे हुए है इसका बड़ा प्रभाव पडे़गा। विवादों के आर्थिक क्षेत्र में, राजनीति के क्षेत्र में। अब पशुबल और शस्त्रबल महत्वपूर्ण है। इसीलिए अब युद्ध को रोकने की परिस्थिति पैदा हो गयी । यह नकारात्मक उपक्रम है। कुछ खुलापन, कुछ गुलबर्क। एक ऐसी आक्रामक विचारधारा आयी और उसका पतन हुआ। हिंदुस्तान की विशेषता है सबको साथ लेकर चलना। शताब्दी के अंत होते होते प्रश्नों से भी जो उपेक्षित है, जड़ है, उनके भीतर शक्ति का आभास होता है। प्रकृति के सहारे पर का आभास मिला है।

हारून रशीद खान

खजुरिया,

गाजीपुर (उ.प्र.) 233001

 

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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