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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त 2007

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   एक कहानी

 

पत्थर दिल


सूरज प्रकाश

 

शिरीष,

कैसे हो! फोटो से तो यही लगता है, आगे के सारे बाल झड़ गये हैं। शायद चांद भी निकल आयी हो। चश्मे का नम्बर तो पता नहीं बदला या नहीं, पर इस फोटो में तुमने जो चश्मा लगा रखा है, तुम पर जँच रहा है। वह पहले वाला लापरवाही का-सा अंदाज शायद अभी भी छोड़ा नहीं तुमने! बधाई लो।  

 

तुम हैरान हो रहे होगे, कौन पाठिका है जो इतनी बेतकल्लुफी से लिख रही है। जानती है क्या मुझे! हाँ  शिरीष, जानती हूँ तुम्हें, तभी तो लिख रही हूँ। तुम भी शायद मुझे भूले नहीं होगे। आज ही एक पत्रिका में तुम्हारी ताज़ा कहानी देखी और साथ में सचित्र परिचय तो लिखने का मन हो आया। नहीं, इतना लम्बा पत्र तुम्हारी कहानी की तारीफ में नहीं लिख रही हूँ।

 

सूरज प्रकाश

 

 

ूरज प्रकाश - हिंदी की  समकालीन कहानी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर । हिंदी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर समादृत एवं चर्चित कहानीकार। कई सम्मान हस्तगत । मुंबई में रहकर उच्च शिक्षण संस्थान में सेवारत ।

कहानीकार का आत्मकथ्य 

   मेरे जैसी नासमझ पाठिका तुम्हारी कहानी का कहाँ मूल्याँकन कर सकती है भला। हाँ, आज मैं खुद तुम्हें एक कहानी लिख रही हूँ। पर वचन दो इसे कहीं छपवाओगे नहीं। बस, सिर्फ पढ़ना और इसे अपने तक ही सीमित रखना।

 

तुम्हें मुझसे शिकायत रहती थी ना, मैं बहुत कम बालती हूँ। एक-एक, दो-दो शब्द के वाक्य, तो लो, आज ढेर सारे शब्दों में अपनी बात कर रही हूँ। पिछली सारी कमी पूरी हो जायेगी।

 

मैं श्रीपर्णा हूँ। याद आया? नहीं! श्रीपर्णा मेहरा, रोल नं. तरेपन, बी.. सेकिण्ड ईयर। तुम्हारा रोल नम्बर तो बावन था। मैं ये सब यूँ लिख रही हूँ, जैसे सचमुच रोल नम्बर के जरिये ही हम एक दूसरे को पहचानते हों। दरअसल मेरा रोल नम्बर आते ही तुम मेरा ''यस सर,'' सुनने के लिए एकदम तैयार होकर बैठ जाते थे। इसलिए याद रह गया। आज इतने बरसों बाद अचानक मेरा खत पाकर हैरानी हो रही है ना! हैरानी तो तुम्हें उस दिन भी बहुत हुई होगी, जब मैं अचानक गायब हो गई थी। बारह-मार्च थी उस दिन, सन् चौहत्तर। डॉ.मिश्रा का पीरियड चल रहा था। इतिहास का। तभी चपरासी मुझे बुलाने आया था, ऑफिस में मेरे लिए एक ज़रूरी फोन था। फोन एटैंड करते ही मैं तुरन्त क्लास में आई थी। सर से अनुमति ली थी और फिर लौटकर कॉलेज में कभी नहीं आई थी। मुझे बाद में पता चला था, तुमने बहुत कोशिश की थी, पता लगाने कि मैं अचानक कहाँ गायब हो गयी, पर तुम्हें कोई कुछ नहीं बता पाया था। बताता भी क्या। बताने लायक कुछ होता तो सबसे पहले मैं ही तुम्हें बताती। मेरे घर जाने की हिम्मत तो तुम नहीं ही जुटा पाये होगे। हो सकता है, तुमने मेरा बहुत-बहुत इंतज़ार भी किया हो, तुम्हारे कुछ नोट्स भी मेरे पास थे, शायद उन्हीं के लिए याद किया हो और बाद में उम्मीद छोड़ दी हो। यह भी हो सकता है, तुम्हें सारी बात का पता चल गया हो और तुमने मेरे लिए बहुत अफ़सोस जाहिर किया हो। खैर, ये तो मेरे ख्याल ही हैं। सच क्या था, वही सब आज तुम्हें लिखने जा रही हूँ।

 

घर पहुँचते  ही पता चला था, जचगी में दीदी की डैथ हो गयी है, जयपुर में। मेरे तो हाथ-पांव ही सुन्न हो गये थे सुनकर। माँ वहीं गयी हुई थी उसके पास। पापा, वीनू भइया और मैं लगातार दस घंटे ड्राइव करके पहुंचे थे वहाँ । बस, हमारा ही इंतज़ार किया जा रहा था। दीदी सबको बिलखता हुआ छोड़ गयी थी। अपने नन्हें से बेटे का मुँह भी नहीं देख पायी थी बेचारी। उसे दूध पिलाने की तो नौबत ही नहीं आ पायी।

 

सारे घर में कोहराम मचा हुआ था। क्या होगा, इन छोटे-छोटे बच्चों का! कैसा अभागा जन्मा कि माँ का दूध तक नसीब नहीं हुआ! कैसे संभालेंगे रंजीत इन्हें! नौ साल का शेखर तो फिर भी थोड़ा समझदार था। तीन साल की प्रियंका को समझ में नहीं आ रहा था, यह सब रोना-धोना क्यों मचा हुआ है। उधर जीजाजी सदमे की वजह से एकदम चुप हो गये थे। बस, पथराई आँखों  से सबको देख रहे थे। जब रोते हुए शेखर ने चिता में आग दी तो वे अचानक फूट-फूट कर रो पड़े थे और शेखर को सीने में भींच लिया था।

 

मुझे वहाँ जाते ही बच्चों की देखभाल में व्यस्त हो जाना पड़ा था। मैं खुद रोती और नन्हां शंतनु मेरी गोद में रोता रहता। मेरे सीने में मुँह घुसेड़ता, पर कहाँ  से उसे कुछ मिलता। मेरा प्यार, दुलार, स्नेह उसके लिए काफी न होते। उसे माँ का-सा स्पर्श तो दे सकती थी, दूध कहाँ से देती। बोतल का दूध उसे पच नहीं रहा था। मेरा कलेजा मुँह में आने को होता। मैं माँ के गले लगकर रोती और वह मेरे गले लग कर। समझ में नहीं आता था, आगे क्या होगा!

 

दसेक दिन इसी तरह से बीत गये थे। उदास, परेशान और फीके-फीके। तेरहवीं की रस्म तक सभी लोग लौट चुके थे। मम्मी, डैडी, वीनू, मैं, रंजीत और उनके घर के लोग ही बचे थे। सबकी आँखों में एक बहुत बड़ा प्रश्न तैर रहा था। हर कोई सामने वाले की आँखों में इस प्रश्न को आसानी से पढ़ रकता था, पर जवाब किसी के पास नहीं था। रंजीत अभी भी पूरी तरह सहज नहीं हो पाये थे। एकदम गुमसुम बैठे रहते।

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एक रात मम्मी, डैडी, रंजीत, उनके माता-पिता तथा दो-एक रिश्तेदार सिर जोड़कर एक बन्द कमरे में बैठे थे और जब वे दो-ढाई घंटे बाद बार निकले थे तो इस विराट प्रश्न का उत्तर खोज लिया गया था। मम्मी बाहर आते ही मेरे गले से लिपट कर रोने लगी थी, और उसके मुँह से मेरी बच्ची, मेरी बच्ची के सिवाय कोई शब्द नहीं निकल रहा था। मैं समझ नहीं पा रही थी, अचानक सब मुझे बेचारगी से क्यों देख रहे हैं! एकदम ठण्डी आवाज़ में मुझे बताया गया था, ''हमारे पास हर तरह से इससे अधिक स्वीकार्य कोई विकल्प नहीं है कि रंजीत से तुम्हारी शादी कर दी जाये। उसके टूट गये परिवार को सहारा देने के लिए यह बहुत ज़रूरी है।'' मैं एक शब्द भी नहीं कह पायी थी, बच्चों से लिपट कर देर तक रोती रही थी।

 

आज सोचती हूँ, किसके लिए और किस विकल्प की तलाश कर रहे थे सब! मेरे बारे में फैसला कर रहे थे और मुझसे पूछा तक नहीं गया था। सिर्फ फैसला सुना दिया गया था। रंजीत का परिवार टूटने से बच जाये, इसलिए किसी न किसी को बलिदान करना ही था। मैं एकदम सामने पड़ गई थी सबके। किसी को भी विकल्प की तलाश की ज़रूरत ही नहीं रही थी। काश, मेरे बारे में इतना बड़ा फैसला करने से पहले मेरी राय तो ली जाती! अब तो यही सोच कर तसल्ली कर जाती हूँ कि अगर मुझसे पूछा भी जाता, तो मैं भी तो यही करती न। माया, ममता और सहानुभूति की भेंट वे न भी चढ़ाते, शायद, मैं खुद चढ़ जाती बिना एक शब्द भी बोले।

 

मेरी शादी विशुद्ध रूप से सहानुभूति, जज़्बात, जल्दीबाजी और तथाकथित इन्सानी मूल्यों के नाम पर एक भावुकता भरा कदम थी। दीदी और बच्चों के प्रति मेरे प्रेम को यह मान लिया गया था कि मैं बड़ा से बड़ा त्याग करने में भी हिचकूँगी नहीं। उनके सामने मैं थी ही। इतने दिनों से बच्चों के पीछे खुद को भी भूली हुई थी, बस इसे स्थायी व्यवस्था की भूमिका मान लिया गया। इस शादी को मज़बूरी, ज़रूरत या सुविधा का नाम भी दिया जा सकता है। कई बार ख्याल आता है, रंजीत नये सिरे से, किसी नयी लड़की से विवाह करते तो क्या आज उन्हें उन आवरणों की ज़रूरत पड़ती, जिसमें वे खुद को वर्षों से कैद किए हुए हैं। न ही किसी से त्याग की उम्मीद की जाती और न ही बेहतर या कमतर विकल्प की बात उठती! लेकिन मैं ये भी सोचती हूँ कि हगर मेरी शादी यहाँ न हुई होती तो मैं उतनी सुखी या दुखी होती, जितनी आज हूँ। क्या मेरी पसंद के आदमी से शादी होने पर मुझे उससे वे सब शिकायतें न होतीं जो आज रंजीत से हैं। लेकिन यह सब तो होता, तब की बात थी।

 

और इस तरह से हमारी शादी हो गई। महज औपचारिक शादी। दीदी की मृत्यु के ठीक सत्रह दिन बाद। उस समय मैं इक्कीस की भी नहीं हुई थी। रंजीत छत्तीस पूरे कर चुके थे। दीदी से उनकी शादी के वक्त मैं सिर्फ ग्यारह साल की थी, जिसे रंजीत जीजाजी टॉफी और आइसक्रीम से बहलाया करते थे। अब मैं उनकी पत्नी थी। उनके तीन बच्चों की माँ।

 

हमारी शादी में शादी जैसा कुछ था भी नहीं। न हँसी मज़ाक, न सहेलियाँ, न डोली, न बारात और न ही विधिवत कन्यादान। बेहद बोझिल वातावरण में बस पंडितजी की उपस्थिति में दो-चार मंत्र पढ़े गए थे और मैं शादी का जोड़ा पहनाकर ब्याह दी गई थी। तब मुझे समझ नहीं आ रहा था, मेरी लगातार रुलाई किसलिए थी। समझ तो आज तक नहीं पायी हूँ कि मैं तब क्यों रो रही थी?

 

तुम्हें हँसी आयेगी, हमारी पहली रात भी हमारे बीच नन्हां, सत्रह दिन का दूध पीता शंतनु सो रहा था और मुझे दो-तीन बार उसके पोतड़े बदलने के लिए उठना पड़ा था। अब उसकी माँ जो थी मैं।

 

दीदी की स्मृतियाँ दिमाग पर बुरी तरह हावी थीं। उस सदमे से कोई भी उबर नहीं पाया था। गहरे पशोपेश में थी। बिल्कुल समझ में नहीं आता था, क्या हो गया ज़िंदगी का। बच्चों और रंजीत की तरफ देखती तो उनके लिए प्यार और तरस के भाव उपजते, खुद का सोचती तो रोना आता। क्या कुछ तो चाहा था, पढ़ना, कैरियर बनाना, खूब ऊपर उठना। जिस व्यक्ति को कल तक जीजाजी का आदर भरा सम्बोधन देती थी, कब सोचा था, वे ही अचानक एक दिन, बिना किसी भूमिका के मेरे पति हो जायेंगे। उनके जीवन में जहाँ-जहाँ मेरी दीदी थीं, वे सारी जगहें मुझे भरनी होंगी। शुरू-शुरू में समझ नहीं पाती थी, मुझे खुद अपनी ज़िन्दगी जीनी है, या दीदी बनकर, दीदी के बच्चों की मम्मी बनकर, दीदी के पति की पत्नी बनकर, दीदी द्वारा खाली की गयी जगह भरनी है! सब कुछ पूर्ववत् चलता रहे, इसकी कोशिश करनी है या हर जगह से दीदी का नाम धो-पोंछ कर खुद अपनी जगह बनानी है। तुम्हें मैं कैसे बताऊँ शिरीष, कितना-कितना रोती थी मैं उन दिनों। एक भूमिका निभाना शुरू करती तो दूसरी भूल जाती। दूसरी में मन रमाने की कोशिश करती तो तीसरे में कन्फ्यूज हो जाती। खुद अपने आपको कहाँ रखना है, तय नहीं कर पाती।

 

रंजीत के हाथ मेरी तरफ न बढ़ते। वह संकोच के मारे बेडरूम में न आते। हमने कई रातें यूँ ही अलग-अलग काटीं। वह अगर मुझे छूते भी तो कई बार चौंक कर अपना हाथ खींच लेते। मैं भी संकोच में रहती। अरसे तक हम पति-पत्नी के सम्बन्ध को सहजता से नहीं जी पाये थे। बार-बार लगता, दीदी कहीं आसपास ही हैं और उन्हें सब पता चल गया है। अभी परदा हटाकर अचानक कमरे में आ जायेंगी और मुझे जीजाजी के साथ इस तरह रंगरेलियाँ मनाते देख, मेरी चुटिया पकड़, अपने घर से बाहर निकाल देंगी। मैं खुद को लाख समझाती, अब कुछ बदल चुका है। रिश्तों के अर्थ हमारे लिए बदल गये हैं, फिर भी मन आशंकित रहता। इस सबके बावजूद खुद सहज रहते हुए उन्हें भी सहज रखने की कोशिश करती, पर वह न जाने मौन के किस अंधे कुएं में उतर गए थे, आज तक, सोलह साल बीत जाने पर भी उससे बाहर नहीं आ पाये हैं।

 

जब पहले दीदी के घर जाती थी तो बच्चे लाड़ लड़ाते हुए मेरे पास सोने की ज़िद करते। मुझसे बहुत हिले हुए थे। अब मैं उनकी माँ बनकर आ गई थी तो वे मुझे अविश्वास से देखने लगे थे। इस बदले हुए, थोपे हुए रिश्ते को स्वीकार नहीं कर रहे थे। हर समय सहमे-सहमे रहते। मम्मी के न रहने से परेशान वैसे ही थे। शेखर को तो खैर इतनी समझ थी, प्रियंका महीनों तक मम्मी के पीछे पागल रही। उसने मम्मी को अस्पताल जाते हुए देखा था, वापिस तो वह आयी ही नहीं थी, सो प्रियंका अक्सर दरवाजे पर खड़ी मम्मी की राह देखा करती। मम्मी संबोधन तो खैर मुझे शंतनु के बोलना सीखने के बाद से ही मिलना शुरू हुआ था।

 

अरसे तक हम दोनों का संवाद नपे-तुले शब्दों तक सीमित रहा। हम ज़रूरत भर बात करते। घर पर हर वक्त मनहूस-सा सन्नाटा पसरा रहता। खाना खा लीजिए, चाय पी लीलिए। आपके कपड़े रख दिए हैं, नहा लीजिए, जैसी निहायत ज़रूरी सूचनाएँ । सम्बोधन तो हमारे पास अरसे तक नहीं रहा। नाम से बुला न पाती। अभ्यासवश मुँह से जीजाजी ही निकलता। वह दीदी को अपर्णा न कहकर रिन्नी कहकर पुकारते थे। मेरा घर का नाम पर्णा था। वह अक्सर मुझे भी रिन्नी कहकर पुकार बैठते। अपनी गलती का अहसास होने पर हम देर तक नज़रें चुराते रहते।

 

दीदी की पहली पुण्यतिथि पर मैंने उनका विधिवत् श्राद्ध किया था। दान-पुण्य करके उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की थी। दीदी की पहली पुण्यतिथि के ठीक सत्रह दिन बाद हमारी शादी की पहली वर्षगाँठ थी। हालांकि उस शादी में कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसे याद रखा जाता, यहाँ  तक कि उस मौके पर कोई तस्वीर भी नहीं खींची गई थी, लेकिन शादी तो फिर भी शादी थी। बेशक उनके लिए दूसरी हो, मेरे लिए तो पहली थी। वैसे भी दीदी को गुज़रे साल से ऊपर गुजर चुका था, और हम सबने नयी परिस्थितियों में, नये रिश्तों को स्वीकार करके जीना शुरू कर दिया था।

 

रंजीत को हमारी शादी की पहली वर्षगाँठ याद नहीं रही थी। अरसे तक याद नहीं आई थी। जीवन उनका ढर्रे पर चलने लगा था। लगता था, उन्होंने अपनी जीवन से सभी अच्छी-अच्छी तारीखें, चीज़ें मिटा दी थीं और अब जो कुछ बचा था, उनकी दृष्टि में उसमें सेलिब्रेट करने जैसा कुछ नहीं था। मैं चुप रह गई थी। याद नहीं दिलाया था उन्हें। यही सही।

 

शादी के बाद जब पहला जन्मदिन आया था तो दीदी को गुज़रे ज्यादा अरसा नहीं हुआ था। मैं उनकी स्थिति समझ सकती थी! लेकिन जब शादी के बाद मेरा दूसरा जन्मदिन भी उन्हें याद नहीं आया तो मैं बहुत-बहुत रोयी थी। भला ऐसी भी क्या रुग्ण आसक्ति कि जो अब नहीं है, उनके लिए आप हर समय उदास ग़मगीन बने रहें और जो है, जिन्होंने आपके और आपके परिवार के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, वह कहीं नहीं है! जब मैं उनकी साली थी तो हर साल कोई न कोई तोहफा जरूर भेजते थे। कैमरा तक दिया था उन्होंने मुझे और अब पत्नी बन जाने पर इतनी बड़ी सज़ा!

 

ऐसा भी नहीं था कि हमने इस दौरान बच्चों के जन्मदिन न मनाये हों। बेशक छोटे पैमाने पर सही, बच्चों को उनकी इस छोटी-सी खुशी से मैंने कभी वंचित नहीं किया था। खुद रंजीत के जन्मदिन पर मैंने उन्हें एक बढ़िया रेडीमेड शर्ट दी थी। केक बनाया था&