कला की मासूम आँखें
डॉ.बल्देव
सहसा
ही काले-डैश के ऊपर दुधिया प्रकाश का एक नन्हा-सा
टुकढ़ा पँख फड़फड़ाने लगा। इसके साथ ही वाताररण को
झंकृत करने वाले उद्दाम संगीत का बनरिया सुर झन्नाटे
से शान्त हो गया। जादुई छड़ी के नट से जादूगर ने उस
नन्हीं-सी बुलबुल को हाथों में लिया और फूल सा सूँघता
रहा रहा, फिर सीने से लगा लिया । हल्के नीले रँग की
शेरवानी और मोतियों की लड़ियों के ऊपर उस नन्हीं
बुलबुल के पँख फूल को पँखुरियों से कोमल प्रतीत ही रहे
है। इतना ही हिस्सा प्रकाशित था, बाकी दृश्य, जादूगर
का सिर पगड़ी, तुर्रा और जड़ीदार जूते गायब थे अंधेरे
में अब बुलबुल ने चहचहाकर नीले आकाश का शुभ-गीत गाना
शुरू किया। एक सुरमई उजास के बाद पर्दे पर लालिमा छा
गयी, फिर धुंध, बदली......उनमें से छनकर आती हुई
किरणों और धान की हरी-बालियाँ नाचने लगी, दूर कहीं
झरने का कलनाद फूट पड़ा। उसके मधुर संगीत से दर्शकों
के हृदय के तार तड़फकर बजने से लगे। जादू का असर
जड़-चेतन को एकाकार कर रहा था। तभी जादूगर ने छड़ी
धुमाई........मधुर सिम्फनी की मर्च्छता जैसे टूटी और
छड़ी पर पख फड़फड़ाकर बुलबुल बैठ गयी।
अब जादूगर दर्शकों के बीच था वह जिस पंक्ति में जाता दर्शकों का अभिवादन झुककर स्वीकार करता और बुलबुल सीटी बजाकर उनका अभिनन्दन करती, तभी एक नौजवान डॉक्टर अपनी सीट से उठा । उसने जादूगर से चुनौती के स्वर के कुछ कहा। सभी का ध्यान उन दोनों पर केन्द्रित हो गया । डॉक्टर ने पूछा - क्यों जनाब । यदि इस बुलबुल के पँख कतर दिए जाएँ, तब भी क्या आप अपना शो दिखा सकते हैं ? मेरा मतलब, आपके जादू का राज कहीं यह बुलबुल हो तो नहीं है ? जादूगर भी नौजवान था और प्रयोगशील कलाकार भी। वह दर्शकों के समक्ष कठिन परीक्षा की स्थिति से भी कमी विचलित नहीं हुआ। इन्हीं जन-परीक्षणों के बीच उसका जादू परवान चढ़ रहा था। उसने डॉक्टर के चेहरे पर भरपूर मुस्कान फेंकी और कहा - जनाब, इससे मेरे जादू में कोई फर्क नहीं आयेगा। दूसरे ही क्षण बुलबुल बाज के पंजे में थी। डॉक्टर ने अपना बैग खोला और एक छोटा सा तेज धार चक्कू निकाल लिया। पहले उसने बुलबुल का बायाँ पख काट डाला । फिर भी बुलबुल सीटी बजाकर उसका अभिनन्दन करती रही। दर्शकों का एक वर्ग उसके इस दुष्कृत्य से दुखी और परेशान हो रहा था। दूसरा तबका तमाशबीनों का था। वे साँस रोककर इंतजार कर रहे थे कि डॉक्टर कितनी जल्दी बुलबुल का दूसरा पँख काटता है। जाने कौन सी शैतानियत उस उत्साही डॉक्टर के भीतर पैठ गई थी कि दूसरे ही क्षण उसने बुलबुल का दाहिना डैना भी जड़ से काट दिया। बुलबुल ने बड़ी मासूम नजरों से जादूगर की और देखा। उसकी आँखें भीग चुकी थी। फिर उसने मुँह फेर लिया ।
इक क्रूर हाथों इस मामूस बुलबुल को क्यों सौंपा ? जादूगर का स्वर सयंत और गंभीर था हमें डॉक्टर पर विश्वास और भरोसा करना चाहिए । यह दूसरी बात है कि वह हमारे साथ कैसा सलूक करता है। ‘हमें कितनी सान्त्वना दे पाता है, । जादूगर के इस ठंडे व्यवहार पर हाल में बैठे वृद्ध लोग अपने आचरण के विपरीत उस दिन उत्तेजित हो गये और फर्नीचर पीट-पीटकर न्याय की माँग करने लगे। भारी शोर-घुल के बीच एक प्रतिष्ठित, संवेदन शील तथा दार्शनिक से कवि को वहाँ खोज निकाला गया। स्टेज पर खड़े होकर कवि ने अपने अगल, बगल, अपराधी मुद्रा में खड़े जादूगर और डॉक्टर की ओर जाँचती निंगाहों से देखा। वह उत्तेजित भीड़ के ही पक्ष में निर्णय देना चाहता था, ताकि आगे का शो देखा जा सकें। किन्तु अचानक ही उसके भीतर के न्यायाधीश ने आदेश दिया - दबाव या भावावेश में निर्णय देना उचित नहीं होगा।
आवश्यक पूछताछ के बाद अन्त में कवि ने लगभग निर्णय के स्वर में कहा - कलाकार की कोई भी कला उसकी आत्मा से पैदा होती है। जादूगर को इतने बड़े खतरे नहीं उठाने चाहिए। किसी की जान की बाजी लगाकर कला को जीवंत बनाना कौन सी बात हुई ? कला सिर्फ जीवन दान ही नहीं करती, हमारे काल को भी अमर करती है। मनुष्य को मनुष्य वही बनाती है। जादूगर के सोने में अगर बुलबुल के प्राण घड़क रहे होते तो जादूगर ही छट-पटाकर पहले गिर गया होता। लेकिन वह पीड़ा की अनुभुति मात्र करता रहा, शायद नफा-नुकसान का खयाल भी उसे रहा हो। जादू को खेल बनाये रखने के लिए अपनी अनुभूति को ही गिरवी रख देना कौन न्याय है ? इसी प्रकार परीक्षण के बतौर किसी साबूत और निरोग अंग को काटने का अधिकार किसी डॉक्टर को भी नहीं है। चाहे उसे अपने व्यवसाय में घाटा ही क्यों न हो। क्या आप दोनों अपने पेशे से ऊपर उठकर अपने आपरेशन या जादू से इसके कटे डैने जोड़ सकते हैं ?
जादूगर और डॉक्टर दोनों निरुत्तर थे। उनकी आँखों में पश्चात्ताप के किरण झिलमिला रहे थे। रोशनी का नन्हा-सा टुकड़ा पर्दे से तिरोहित हो चुका था। घने अंधकार में उस दिन का शो फिर शोक समा में परिणित हो गया।
डॉ.बल्देव
स्टेडियम के पीछे, रायगढ़
छत्तीसगढ
