आस्ट्रियाई कहानी
वाक्य-प्रतिवाक्य
बारबरा फ्रिशमूथ
मेरी
दादी कहती है, बेशक मैं उसे इरेने कह कर बुला सकती
हूँ, लेकिन मुझे उसे दादी कह कर बुलाने से भी ज्यादा
मुश्किल काम यह लगता है। मैं तो उसे बिल्कुल नहीं
जानती, मेरा मतलब है कि लगभग बिल्कुल नहीं जानती। “जब
तू छोटी-सी बच्ची होती थी, तब से मेरे दिमाग़ में तेरी
साफ़ तस्वीर है,”
वह कहती है, “पाँच
की उम्र में तू पढ़ना सीख गयी थी और तेरे सिर पर छोटे
काले घुँघराले बाल होते थे।”
“मगर
मुझे तेरी याद नहीं है। तब की तो नहीं, सिर्फ दो सालों
से है, और तब तो मैं दस की हो चुकी थी।”
“तू समय-समय पर बदलती रही है। लेकिन तेरे बाल वैसे के वैसे रहे हैं। खूबसूरत लगते हैं, कटवाने के बाद भी । जब तू घर से बाहर जाती है तो उन्हें ढक क्यों लेती है ?” यह कह कर वह मुझे चश्मे के ऊपर से घूरती है।
“कोई और बात कर,” मैं कहती हूँ और अपने कमरे की तरफ चल पड़ती हूँ । मैं जानती हूँ कि सिर पर ओढ़नी बाँधने से उसे चिढ़ है। लेकिन मैं इस बारे में बात करने के मूड में नहीं हूँ ।
दादा ने भी ऐलान कर रखा है कि वह अगर कभी सड़क पर मुझे मिल गये और मैं इस-इस तरह के कपड़े पहनती रही तो वह मुँह फेर लेंगे। “तू अगर इसी तरह चर्च की मठवासिनियों की तरह इधर-उधर घूमना चाहती है तो वहीं स्कूल की सिस्टर्स के यहाँ रह जा।” हम दोनों प्राथमिक स्कूल में सिस्टरों से पढ़ते थे।
“हाँ,” मैंने कहा, “मगर बात सिर्फ इतनी है कि उन्हें देख कर मेरा दिमाग़ ख़राब हो जाता है।”
“और हालुक बहनों का नहीं होता?” उसे दोनों अच्छी नहीं लगतीं, क्योंकि उसके ख्याल से दोनों अली बाबा का फ़ायदा उठाती है।
“हुल्या जब ऐसे कपड़े पहनती है तो तुम्हें तकलीफ़ नहीं होती है ?”
“अल्लाह, अल्लाह,” वह हालुक अंकल की तरह उसाँस भरता है, “फ़र्क सिर्फ़ यह है कि उसकी मजबूरी है।”
सही नहीं कहा उन्होंने । हुल्या की भी मजबूरी नहीं है। सिर्फ़ नैर्मीन कहती है कि उसे तो ओढ़नी पहननी है, कि हमें भी पहननी चाहिए । लेकिन हमने अपनी मर्ज़ी से यह फ़ैसला लिया है। हुल्या कहती है कि उसके माता-पिता इसके लिए उस पर दबाब नहीं डालेंगे। जहाँ तक मुझे पता है, अमीने आंटी पहले कभी सिर पर कपड़ा नहीं बाँधती थी।
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मैं हालुक बहनों से मिल कर आती हूँ तो देखती हूँ कि रोजी फ़िशर दरवाज़े पर खड़ी है। पूछती है कि क्या मैं उसके साथ गणित का काम करूँगी। होम-वर्क की तो छोड़ो, स्कूल में जो ब्लैक-बोर्ड पर लिखा गया था, वह भी उसे सिर्फ आधा समझ आया है। मैं उसे अपने कमरे में ले जाती हूँ, अपनी ओढ़नी उतारती हूँ और बालों में कँघी धरती हूँ ।
“मैंने सोचा था कि तू बिस्तर में भी इसे पहन कर सोती है,” मेरे पोस्टर देखते हुए वह अस्पष्ट-सा बोलती है। वह यह भी जानती है कि दादी फिर वहाँ आ गयी है। “यह मेरी दादी के साथ स्कूल जाती थी।” यकायक मुझे एक ज़बरदस्त शक़-सा होने लगता है, मगर मैं अपने चेहरे से पता नहीं लगने देती और रोज़ी को दुबारा ये बेकार के समीकरण समझाती हूँ, जो वह नहीं समझती ।
दादी उससे पूछती है कि क्या वह हमारे यहाँ खाना खायेगी, लेकिन सौभाग्यवश उसे छः बजे घर में होना है। जाते-जाते दरवाज़े से रोज़ी मुससे पूछती है कि क्या मैं शुक्रवार को उसके जन्मदिन पर आऊँगी। “मेरे ख्याल से नहीं,” मैं कहती हूँ , “शुक्रवार को मुझे और कुछ करना है।”
“माफ़ करना,” वह बाँहे ज़ोरों से इधर-उधर धुमाती है, “मैं ग़लत कह बैठी, यह शनिवार की है। तुम्हारी दादी ने कहा है कि वह सैंडविच बनायेगी।” मेरा सिर घूम जाता है।
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“मैंने इरेने को फिर से दादी कहना बन्द कर दिया है। बस आदत डालने की बात है। जबसे वह वहाँ है, अली रात की ड्यूटी ले रहा है। स्पष्टतः वह नहीं जानता कि वह नौकरी पर होता है तो वैसे भी वहीं खाता है। मैंने सोचा था कि अब वह मुझसे चिपटी रहा करेगी, लेकिन शाम को वह अपने आप बाहर चली जाती है। एम्मी आंटी या अपनी पुरानी स्कूल की सहेलियों को मिलने । मसलन बूढ़ी क्रोबाथ को, रोज़ी की दादी, एक जैसी, सास जैसी, जो कहेगी, ऐसे किसी तुर्क को मैं घर में नहीं घुसने दूँगी, लेकिन जो मुझसे बड़ी मीठी-मीठी बातें करती है, खास तौर से जब इरेने वहाँ हो।
या वह पूरी शाम बैठक में बैठी टीवी पर चैनल बदल रही होती है, कभी कोई कभी कोई कार्यक्रम । किस्मत से घर इतना बड़ा है कि हर एक का अपना कमरा है। मुझे तब से टीवी देखना पसन्द नहीं है, जबसे उन्होंने इस सड़े हुए कार्यक्रम में हमारा पतन दिखाया है। अगले दिन बड़ी क्लासों के बच्चों ने भी मुझे फिर से पहचाना है। जबसे मैंने समझा है कि हमें ग़लत तरीके से पेश किया जाता है तब से मुझे टीवी देखने का शौक़ नहीं रहा । अच्छा हुआ कि दादा ने इसे नहीं देखा था। अब वह कभी-कभी इरेने के साथ बैठ घर “यूनीवर्स” देखते हैं। जब दादा टीवी से चिपके होते हैं तो मैं कम-अज़-कम कंप्यूटर इस्तेमाल कर सकती हूँ । जब अली बाबा और इरेने मुझसे पूछेंगे कि मुझे जन्मदिन पर कौन सा तोहफ़ा चाहिए तो मैं अपने अकेली के इस्तेमाल के लिए कंप्यूटर माँगूगी। दादा उस पर बहुत सारी गेम्स खेलते रहते हैं और मेरी बारी बहुत कम आती है।
अली बाबा मेरे कमरे में आते हैं, बल्कि वह खटखटा कर आये हैं। आज तो रात की ड्यूटी नहीं है। क्या अब मुझे उन पर विश्वास नहीं रहा । क्यों, मैं पूछती हूँ । वह मेरे बिस्तर पर बैठ जाते हैं, और मैं उनके सामने अपनी लिखने की मेज़ के साथ कुर्सी पर बैठी रहती हूँ ।
“तू तो जानती है।”
मैं कंधे उचकाती हूँ । शुरूआत करनी उन्हें मुश्किल लगती है, लेकिन फिर वह किसी तरह शुरू हो जाते हैं।
“मैं हर चीज़ के लिए तैयार था,” वह बोले, किसी दिन रात को तुमे किसी डिस्को में जाकर मुझे ढूँढना होगा, और कि तू नाक में छल्ला पहनता शुरू कर देगी और अपनी पीठ पर एक अज़दहा गुदवा लगी, कि तू चोरी-छुपे सिगरेट पियेगी या स्कूल में ज़िद्धीपन दिखायेगी। इन सब चीज़ों के लिए मैं अन्दर से तैयार था क्योंकि यहाँ तकरीबन हर माँ-बाप के साथ ऐसा ही कुछ होता है, लेकिन था, क्योंकि यहाँ तकरीबन हर माँ-बाप के साथ ऐसा ही कुछ होता है, लेकिन तू अचानक किसी दिन किसी कट्टरवादी की तरह घूमता शुरू कर देगी, यह मैंने नहीं सोचा था।”
“नेर्मीन और हुल्या भी कट्टरवादी तो नहीं है, अगर यह तुम्हारा मतलब है।”
“हमारे यहाँ औरतों को बाल छुपा कर रखने पड़ते हैं, लेकिन सिर्फ़ बूढ़ी औरतें यह करती है, पूरी दुनिया में ऐसा होता है।”
“तुम कहते हो हमारे यहाँ, और तुम्हारा मतलब कहीं अनाटोलिया से, तुर्की से है। मगर हम यहाँ रहते हैं, यह अलग बात है। फैसला मुझे करना है।”
“मैं तेरा पिता हूँ और तू जानती है कि मैं उन लोगों में से नहीं हूँ। हम अलग हैं।”
“फिर मुझे बताओ कि हम कैसे है, मैं कौन हूँ और मुझे क्या होना चाहिए।”
अली बाबा सिर को हाथों में थाम लेते हैं। “मैंने तुम्हें कई बार बताया है कि हमारे लोग कैसे होते हैं, हम लोग कैसे रहते हैं, किस में विश्वास रखते हैं। मेरे ख्याल से तुम जानती हो कि हम कौन हैं।”
“तुमने मुझे बताया है, बाबा, मगर मैं वहाँ कभी नहीं रही।”
“तू यह भी जानती है कि हम वहाँ कभी क्यों नहीं गये।”
“फिर भी तुमने मुझे बताया है। मेरे लिए ये सब किस्से हैं। मैं आधी तीतर आधी बटेर हूँ, इसलिए मुझे फैसला करने दो।”
“लेकिन तू नहीं जानती कि तू क्या फैसला करने वाली है।”
“मैं वहीं फैसला करूँगी, जो मैं सही समझूँगी। जिस तरह से नेर्मीन और हुल्या कपड़े पहनती हैं, वो मुझे अच्छा लगता है। उनके साथ मैं भी कुरान की क्लास में जाना चाहती हूँ ।”
अली बाबा अधीरता से अपनी ऊसाँस को दबाते हैं, मानो समझ गये हों कि इस विषय पर मुझसे आगे बात करना व्यर्थ होगा। “फिर सुन ले छोटी,” इस तरह से उन्होंने मुझे काफ़ी समय से नहीं बुलाया था, “अगर तू कुरान पढ़ना चाहती है तो उसे ध्यान से पढ़ना, ताकि तुम्हें दूसरों द्वारा न बताया जाये कि उसमें क्या लिखा है। और याद रखना कि वो लोग, जो तुम्हें उसका मतलब समझाना चाहते हैं, उसे तेरे ही खिलाफ़ इस्तेमाल करेंगे।”
मैं देखती हूँ कि यकायक उनके चेहरे का रंग बदल गया है। उसकी आँखें फट जाती है, खून से सुर्ख़ हो गयी हैं।
वह एकदम से खड़े हो जाते हैं और अपना हाथ उठाते हैं।
“मारो मुझे,” मैं सोचती हूँ “मारो मारो ! शायद फिर हम मिल कर रो सकते हैं। ”
एक पल वह मेरे सामने यों ही खड़े रहते हैं, किसी मेढ़े की तरह नहीं, किसी सारस की तरह भी नहीं, बल्कि किसी शेर की तरह, जो अगले पल सरसराते हुए अपना पंजा नीचे लायेगा।
लेकिन तभी उनका उठा हुआ हाथ नीचे आ जाता है और ऐसे लटकने लगता है मानो उनका हाथ न हो।
“इससे पहले कि तुम कुरान की क्लास में जाओ में तुम्हें साफ़ तौर पर बता देना चाहता हूँ कि हमारे जैसों के लिए सबसे अहम उसूल क्या है।”
इससे पहले कि वह बोलें, मैं उन्हें टोक कर तुर्क भाषा में बुदबुदाती हूँ, “एलीने, बेलीने, डिलीने, साहिम ओल !” जिसका अर्थ है कि इन्सान को अपने हाथों, पोशाक और ज़बान को काबू में रखना चाहिए । फिर मैं एकदम से मुँह के आगे हाथ रख लेती हूँ, किसी छोटी बच्ची की तरह, जिस के मुँह से “शिट” की गाली निकल गयी हो। तब वह सर हिलाना शुरू कर देते हैं और हिलाते-हिलाते मुझे बाँहों में ले लेते हैं और मेरा माथा चूमते हैं। “ठीक से सोना,” जाते-जाते वह कहते हैं, “इन्सानों के लिए नींद बहुत ज़रूरी है।”
(उपन्यास “एंटश्लुश्स्येलुंगन” से एक अंश)
अनुवादः अमृत
मेहता
