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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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   ज़िंदगी के रंग

 

मक्खन... मिर्च और मठा


किशोर दिवसे

 

हुत दिन बाद मज़मा फिट किया है उस्ताद जम्हूरे ने पूछा । हाँ जम्हूरे एक ठो फार्मूला सोचने में भिड़ा था, मिल गया तो अपुन का मज़मा फिर तैयार - उस्ताद ने अपनी बच्चनिया दाढ़ी खुजाते हुए कहा।

 

लेकिन उस्ताद, सामने जो तीन डिब्बे रखे हैं उसमें क्या है ?” बात कुछ हज़म नहीं हुई कहकर जम्हूरे ने उस्ताद से फिर पूछा। बीड़ू....चल, तू अपुन का खास आदमी है, इसलिये पहले बता देता हूँ बाकी अक्खा मज़मा फिर होने के बाद।

ढक्कन खुला....पहले डिब्बे में मक्खन

दूसरे डिब्बे में मिर्च

तीसरे डिब्बे में मठा।

 

पहले डुगडुगी बजा, फिर सबको एक साथ बताऊँगा मक्खन, मिर्च और मठे का रहस्य .....और डुगडुगी बज उठी डुग... डुग... डुग... डुग...

मेहरबानों ....साहबानों ...कदरदानों

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भीड़ में ठलहा टाइम पास करते श्यामलाल ने बाजू ने खड़े बीड़ी सपचाते बिसाहू से बीड़ी का जुगाड़ कर लिया और अपनी चोंच खोली - उस्ताद, जल्दी समझाओ पहले डिब्बे का मतलब। उस्ताद मक्खन भरा डिब्बा उठाया और अँगुली पर लगाकर इशारा कर दिया सरकारी दफ़्तरों की ओर....

साहबानों...कदरदानों ...श्याम लाल को मक्खन की महिमा नहीं मालूम !

अपना काम कराने सरकारी दफ्तर पहुँचा आदमी बाबुओं को क्या लगाता है ? बाबू अपने साहब और वह साहब बड़े साहब को क्या लीपता है ? संस्थानों, सेकेटेरियट, मेंत्रालयों में अँगुली तो क्या कइयों के हाथ और उस पर लगा हुआ क्या रहता है- मक्खन ही ना ! लगाने वाले को मजा बाद में, पहले तो मक्खन-चुपड़वाकर - अगला तो निहाल हो ही जाता है।

 

उस्ताद ! कुछ मिठलबरा कर्मचारी अपने बॉस को, दरी उठाऊ और सेकंड ग्रेड नेता, रायपुरी ओर दिल्ली लेवल के नेताओं को, वो क्या कहते हैं पोल्सन नहीं लगाते, सो, फार्मूला नंबर वन - मक्खन शरणम् गच्छामि...खाओ मत .....लगाओ ज्यादा.....

 

जम्हूरे और उस्ताद की बात चल ही रही थी कि भीड़ चीरकर एक बदहवास पागल गोल घेरे के बीच आ गया। मैले कुचैले तार-तार कपड़े पहने हाथों में मैगजीन, कुछ सर्टिफिकेट और अखबारी करतनों का पुलिंदा लिये वह नौजवान अचानक आकाश की ओर मुँह उठाकर चिल्लाने लगा......

 

मक्खन हो तो काम बने, सुन मक्खन की धुन।

कब, किसको कैसे लगे, इसी बात को गुन

 

उस विक्षिप्त नौजवान की ज़िंदगी का यह खरा-खरा रंग था। उस्ताद की आँखें बरबस सजल हो गई । हाशिये पर खड़ा मैं सोचने लगा-काश ! ज़िंदगी देने वाले विधाता को इसने वो लगाया होता, पेट से सीखकर आता वह मक्खनिया अदा, सफेद अहय्य भवखन में छिपे काले चेहरों को समझ लेता...नौकरी छूटने से पागल तो न हो गया होता !

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मेहरबानों.....साहबानों...कदरदानों.......

मामला सेंटीमेंटल होते देख जम्हूरे ने दूसरा डिब्बा उठा लिया। उस्ताद! अब समझाओ इन मिर्चो का मतलब। -जम्हूरे ने ढक्कन खोलने के बाद उसमें भरी मिर्ची को घूरकर कहा।

 

देख जम्हूरे! इन दिनों मिर्च खाने का कम लगाने का ज्यादह काम कर रहे हैं लोग । फार्मूला नं.2-मिर्च लगाओ .....या तो खुद जान जाओ कब किसे कितनी लगानी है, या फिर हाईकमान से पूछकर .....मेरा मतलब है - बॉस के कहने पर किसी साथी को भी लगाई जा सकती है। अब उन मिर्ची का किस पर कितना असर हुआ यह तो पिछवाड़े पर हाथ धरे उस भुक्तभोगी के उछल-कूद करने के अंदाज से पता चल जायेगा जो बरास्ता मुँह  अपनी भड़ास निकाल रहा हो।

 

शायद इसीलिये मिर्च खाने की कम लगाने की चर्चा अधिक होती है जम्हूरे ने सीसी...करते हुए उस्ताद की ओर देखा....भीड़ में पेलमवाल करते लोग कुछ सतर्क हो गये थे, बगलें झाकने लगे......क्या पता कब कौन किसे किस तरह मिर्चाइटिस का शिकार बना दे। उधर मगर निगम में किसी पान ठेले पर रखा ......ट्रांजिस्टर अचानक गोविंदा की किसी फिल्म का गाना गूँजाने लगा था- तुझको मिरची लगी तो मैं क्या करूँ ?

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मेहरबानों...साहबानों.....कदरदानों.......! उस्ताद ने मिरची वाले गाने में लिपटे अपने कान गड़ाये और फिर मुखातिब हो गया अपने मज़मे की ओर - अब तीसरे डिब्बे की बारी थी। जम्बूरे के हाथों की खुजली असहनीय हो गई। झट जाकर उसने ढक्कन खोल दिया । भीड़ उचककर झाँकने  की कोशिश करने लगी, आखिर क्या है उस डिब्बे में........।

 

अपने हाथों में उठाकर उस्ताद ने उस डिब्बे में रखा सफेद तरल पदार्थ पास ही उगी किसी पौधे की जड़ में डाल दिया। खाली डिब्बा उठाकर तमाशबीनों के सामने उस्ताद शैतानी मुस्कान के साथ भाषणनुमा स्टाइल में कहने कहा - भाइयों ....और भाइयों... (कोई बहने माता नहीं थी इसलिये) ...मैंने इस पौधे की जड़ में मठा डाल दिया है। अब देखना इसका अंजाम क्या होता है। आप सब अखबार पढ़ते होंगे। अमरजीत भोगी, रामचरण शुक्ल, रणविजयसिंह और रास बिहारी सभी मठावाद के महापंडित है। दोनों ही बातें होती है, या तो इनकी जड़ों में कोई मठा डालने की जुगत में होते है या फिर ....(आप समझ गये होंगे)

 

गर्मियाँ में मठा पीने का मजा ही निराला है - भीड़ में मुंडी उचकाकर एक बतरसिया ने कहा। बाजू वाले चुहलबाज ने पलटकर वार किया - पर भैये, यह पीने की चीज़ अब रह ही कहाँ गई है ! चर्चा तो सिर्फ किसी की जड़ में मठा डालने की ही होती है। महापंडित चाणक्य सैकड़ों वर्ष पहले इतिहास की कहानी दर्ज कर गये हैं वह भी मठा डालने से शुरू होकर खत्म होती है। उन्हीं की परम्परा को समाज का हर तबका आगे बढ़ा रहा है। मठापुराण की इन बातों के दरम्यान ही भीड़ में खड़ा एक शोहदेनुमा कालेजी छात्र, कोंटे में सहमे से लेक्चरर की ओर देखकर विलेनी अंदाज में अपने आप में मुस्कुराया। मानो मन ही मन उस लेक्चरर से कह रहा हो - बेटा, उस समय कैसे ठीक कर दिया था तुझे जब नकल करते वक्त पकड़ लिया था मुझे। एजुकेशन सोसायटी के अध्यक्ष से कहकर इन्क्रीमेट रुकवा दिया ....।

 

 

इधर कलेक्टोरेट के सामने गुजरते जुलूस में नेता भी दाँत निपोरकर जनता के सामने हाथ जोड़ते हुए यही सोच रहा था - जनता के लिये चुनाव में कौन सा नया मठा-पैकेट लेकर जाऊँ । मैनेजर, बॉस, नेता, अधिकारी, प्रिंसिपाल, उद्योगपति, सबकी टेबल पर रखे। पानी भरे गिलास मुझे न जाने क्यों मठे से भरा नजर आया ।

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यकायक किसी पुलिस अफसर की गाड़ी मज़में के सामने आकर रुकी । डंडा लहराते हुए जवान ने उस्ताद का कालर पकड़ा और चीखा - अबे ! भीड़ लगाकर हल्ला करवाता है। मज़मा बंद कर वरना...! फार्मूला वन के तईं मक्खन लगाने उस्ताद की कोशिश फेल हो गई। पुलिसिया साहब के रौब के सामने मिर्च वाला कोई आइटम ट्राई करने का सोच ही नहीं सकता था वह । मजमा खलास ....उस्ताद भी पतली गली से खिसक लिया। मक्खन...मिर्च और मठापुराण की महिमा यहीं खत्म नहीं हुई। यह तो सिर्फ प्रथमोध्याय समाप्त है। पर जजमान! अगली बार दक्षिणा का मक्खन लेकर आना, तभी बताऊँगा-मक्खन मिर्च और मठा-........महापुराण में ज़िंदगी के कितने रंगों का समेंदर छिपा हुआ है।

किशोर दिवसे

जनता क्वार्टर, ई.डब्लयू.एस67

नेहरूनगर, बिलासपुर

छत्तीसगढ़ - 495001

 

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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