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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   इन दिनों

 

दलितों का धार्मिक शोषण


विश्वनाथ सचदेव

 

पिले एक लंबे असें से विश्व हिंदू परिषद की चर्चा उग्र वक्तव्यों और अक्सर समाज को बाँटने वाली गतिविधियों के हवाले से ही होती रही है, लेकिन, एक मौका आया है, जब यह कहा जा सकता है कि परिषद सही दिशा में भी जा सकती है, बशतें नेतागण विवेकपूर्ण निर्णय लें, ऐसा, एक निर्णय परिषद ने इलाहाबाद में आयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन के पहले दिन किया, परिषद ने ब्राह्मण समुदाय से कहा है कि देश के मंदिरों को, दलितों समेत, सबके लिए खोल लिया जाए, परिषद ने हिंदू समाज के व्यापक हित में अपने पुराने सोच को तिलांजलि देते हुए यह निर्णय किया है ।

 

परिषद में पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि हिंदू-क्रांति की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि मंदिर दलितों को पूजा-अर्चना और धार्मिक विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित करे, मंदिरों को दलितों के शोषण से जुड़ी किसी भी गतिविधि से नहीं जुड़ना चाहिए, क्योंकि इससे धर्म के विकास में बाधा पड़ती है, हिंदू क्रांति से परिषद का क्या अभिप्राय है अथवा धर्म के विकास की बात करते समय परिषद के मन में क्या रुपरेखा है, यह बात सम्मेलन में स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं समझी गई। परिषद के पिछले क्रियाकलापों को देखते हुए यह माना जा सकता है कि परिषद हिंदुत्व की संकीर्ण अवधारणा में बंधी है और उसके लिए धर्म के विकास का अर्थ भी सीमित है । लेकिन, इसके बावजूद दलितों के लिए मंदिरों के द्वार खोलने के आह्वान का महत्व कम नहीं होता । भले ही परिषद ने यह कार्य विभाजित वोट बैंक की चिंता से उबरने के लिए किया हो, और यह घोषणा भी की हो कि इस प्रस्ताव का सीधा-साधा उद्देश्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना है, लेकिन यह बात समूचे भारतीय समाज के हितों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि विश्व हिंदू परिषद ने दलितों के मंदिर प्रवेश की आवश्यकता को समझा है । भले ही उसने यह कदमविभिन्न हिंदू जातियों और वर्गों के मदभेदों को दूर करके संयुक्त हिंदू राष्ट्र के निर्माण के उद्देश्य से किया हो लेकिन इससे दो महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट होकर सामने आई हैं । पहली तो यह कि दलितों अर्थात् हरिजनों आदि को मंदिर प्रवेश से वंचित रखना एक गलत परंपरा थी और दूसरी यह की इस गलत परंपरा के दुष्प्रभाव समाज को भुगतने पड़ रहे हैं ।

 

यह हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि सावरकर और महात्मा गाँधी जैसे दो भिन्न वैचारिक ध्रुवों ने हरिजनों को मंदिरों में प्रवेश के लिए आंदोलन किए थे और इस समाज के प्रगतिशील एवं विवेकपूर्ण तबके ने इन दोनों की इस बात के मर्म को समझा था, लेकिन विहिप जैसे कट्टर सोच वाले लोगों को तब यह बात समझ नहीं आई थी । तब उन्हें यह हिंदुओं के आर्थिक मामलों में दखलंदाजी लगी थी । लेकिन, सावरकर और गाँधी दोनों इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट थे कि हरिजनों समेत दलितों को मुख्यधारा से अलग रखकर समाज के विकास को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता । गाँधी यह मानते थे कि वही सच्चा वैष्णव है, जो पराई पीर को समझता हो । आप चाहे तो इस वैष्णव को हिंदू कह सकते हैं, लेकिन गाँधी का वैष्णव तो मनुष्य था । आज विहिप भी हिंदू वोट बैंक के विभाजन को रोकने के लिए दलितों को अपनाने की बात कर रही है, लेकिन इस कदम की तार्किक परिणति तो मनुष्य की एकता और समानता की अवधारणा का स्वीकार ही है ।

 

आज भले ही विहिप दलितों के मंदिर-प्रवेश का समर्थन किसी हिंदू राष्ट्र की स्थापना का सपना पूरा करने के लिए कर रही हो, लेकिन उसकी यह कार्रवाई अनजाने में ही सही, कुल मिलाकर भारतीय समाज को जोड़ने की जरुरत को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम ही है । मेरे जैसा व्यक्ति यदि इस कदम की सराहना कर रहा है, तो इसलिए कि यह मनुष्य को मनुष्य के रुप में स्वीकार करने की दिशा में उठाया गया है । जिस हिंदू राष्ट्र की अवधारणा विश्व हिंदू परिषद और उसके सोच वाले सामने रख रहे हैं, उससे सहमत होना आसान नहीं हो, क्योंकि यह अवधारणा जोड़ने वाली नहीं, तोड़ने वाली है । एक अरब से अधिक की आबादी वाला हमारा भारत विभिन्न धर्मों, विभिन्न जातियों, विभिन्न वर्गों का एक गुलदस्ता है । विविधता इस गुलदस्ते का सौंदर्य है । इन सब रंगों का खिला रहना ही इस सौंदर्य को बनाये रख सकता है । इसलिए जरुरी है विभिन्न सम्प्रदाय, विभिन्न जातियाँ, विभिन्न वर्ग समानता के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े । एक साथ महके । भारतीय समाज को मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर में बाँटना अथवा छोटी ऊँची जाति के नाम पर दीवारें खड़ी करना एस सांविधानिक अपराध ही नहीं, पाप भी है। यह पाप हम सदियों से करते आए हैं, अब इसके प्रायश्चित की बेला है ।

 

कोई गंदा है, इसलिए यदि हम उसे कहें कि नहाकर हमारे पास आओ, यह बात तो समझ में आती है, लेकिन अकारण ही किसी को गंदा मान लेना और तथाकथित सभ्य समाज से बहिष्कृत कर देना किस आधार पर समझाया जा सकता है । पहले की हम किसी को मैला ढोने के लिए विवश करते हैं, कैसा न्याय है ? कथित छोटा काम करने वालों को सदियों से हमने छोटा बना कर रखा हुआ है । गाँव की परिधि पर रहने के लिए मजबूर बना रखा है । समाज की मुख्य धारा में हम उन्हें आने नहीं देना चाहते । कोई सावरकर या गाँधी या आंबेडकर यदि इसके विरुद्ध आवाज उठाता है, तो हम उसे अनसुना कर देना ही बेहतर समझते हैं । कोई रैदास या कबीर तो हमें स्वीकार है, लेकिन उनकी बातें हम स्वीकार नहीं करते । इसी बीमार सोच के चलते आज भी भारतीय समाज जातियों में, वर्गों में बंटा बुआ है । विहिप द्वारा दलितों के मंदिरों में प्रवेश की वकालत करना भले ही उसे एक राजनीतिक आवश्यकता लग रही हो, लेकिन कुल मिलाकर यह एक सकारात्मक कदम साबित हो सकता है । और यदि विहिप वाले भी कभी हिंदुत्व को भारतीयता मानने लग लग गए और सभी भारतीय उन्हें हिंदू लगने लगे, तब तो समाधान और आसान हो जाएगा ।

 

वैसे, सवाल दलितों को सिर्फ मंदिरों में प्रवेश का अधिकार देने का नहीं है, सवाल दलितों के मनुष्य होने के अधिकार को स्वीकार करने का है । यह तभी संभव है, तब उन्हें दिलों में प्रवेश दिया जाएगा । जब हम मनसा, वाचा, कर्मणा मनुष्य मात्र की समानता और एकता को स्वीकार करेंगे । कब हम किसी वोट बैंक की दृष्टि से नहीं मनुष्यता की दृष्टि से सोचेंगे, जब हमें किसी को नीचा मानना, छोटा मानना, अस्पृश्च मानना अमानवीयता लगेगा। हमारा संविधान सबकी समानता और सबकी बंधुता की बात करता है। हमारा संविधान सबकी समानता और सबकी बंधुता की बात करता है। यह समानता, बंधुता की भावना जब हमारे विवेक का हिस्सा बनेगी तभी धर्म का विकास होगा ।

  विश्वनाथ सचदेव

संपादक, नवनीत,

मुंबई, महाराष्ट्र

 

 

 

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