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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   हिंदी-विश्व

 

प्रवासी साहित्यः हमारा दायित्व


श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी

 

हिन्दी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि उसे अपनों के ही प्यार से वंचित रहना पड़ा है। राष्ट्रभाषा का गौरवशाली पद पाकर भी वह उस पर प्रतिष्ठित नहीं हो पा रही है। उसकी एक से एक कमियाँ निकालने वाले उसके अपने ही हैं। जनगणना में उसके बोलने वालों में उसकी बोलियाँ/सहभाषायें में (राजस्थानी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मैथिली, आदि) बोलने वालों को नहीं जोड़ा जाता । धर्म और सम्प्रदाय के कारण वे लोग भी उसे अपनी मातृभाषा नहीं लिखाते जो उसके अतिरिक्त और कोई भाषा जानते ही नहीं। प्रपत्रों में मातृभाषा का स्तम्भ तो होता है। भाषा-ज्ञान का नहीं, कि उससे हिन्दी बोलने और जानने वालों की संख्या अत्याधिक बढ़ जाने की आशंका रहती है। अँगरेज़ी  माध्यम के विद्यालय सबसे अधिक हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही खुल रहे हैं, उसके अपनों के उसकी ओर से मुँह मोड़ लेने के कारण। प्रकाशन की आज की स्थिति में केवल लेखन के भरोसे जी सकना हिन्दी के लिए संभव नहीं है।

 

सबसे अधिक दुर्व्यवस्था का शिकार हिन्दी का प्रवासी-साहित्य है। अपनी धरती की महक से सिक्त यह साहित्य निकट-दृष्टि सम्पादकों के कारण न तो पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा रहा है न संचार माध्यमों में और नहीं पाठ्यक्रम या साहित्येतिहास में । इससे भारतवासियों को पता ही नहीं चलता कि भारत के बाहर हिन्दी के प्रचार-प्रसार की क्या स्थिति है। प्रवासियों के सम्मेलन में भी सम्पन्न देशों के सम्पन्न (भारतवंशी) प्रवासी ही ससम्मान प्रस्तुत किए जाते हैं, और वे भी अँगरेज़ी बोलने में ही गर्व का अनुभव करते हैं।

 

फिजी, मारीशस सुरीनाम, गुयाना आदि में प्रवासी भारतीयों ने अपनी भाषा को न केवल जीवित रखा है वरन उसे निष्ठापूर्वक पुष्पित और पल्लवित भी किया है। वहाँ के हिन्दी-साहित्य के बारे में कभी-कभार कहीं कोई लेख आदि पढ़ने को मिल जाए तो मिल जाए। कभी वर्षों में, कृतार्थ करने के भाव से प्रकाशित, कोई रचना भी शायद देखने को मिल जाए, बिना लेखक के किसी परिचय या चित्र आदि के। विश्व हिन्दी सम्मेलन के प्रयासों से प्रवासी हिन्दी-लेखकों के बारे में यहाँ कुछ जानकारी हो पायी है और वहाँ की एकाध साहित्यिक कृतियाँ भी पढ़ने को मिल गयी है। इस सबसे अनुमान लगा है कि वहाँ भी साहित्य की लता पूरी गति से सदैव गतिशील रही है । ऐसे में हिंदी-साहित्य का इतिहास अधूरा-अधूरा लगने लगा है। प्रवासी हिन्दी-साहित्य के समावेश के बिना उसके सर्वाग सम्पूर्ण हो सकने की संभावना नहीं है । कम से कम पिछले सौ-सवा सौ वर्षों का साहित्येतिहास संशोधित किया जाना चाहिए और उसमें प्रवासी-साहित्य की प्रवृत्तियों, शैलियों एवं अवदान का उल्लेख होना चाहिए । उसे हीन या न्यून कहकर उपेक्षित कर देना अदूरदर्शिता होगी। उसे यहाँ की परिस्थितियों से नहीं, वहाँ की परस्थितियों को ध्यान में रखकर देखना और समझना होगा।

 

परिचित हो जाने पर प्रवासी-साहित्य के पाठकों की संख्या बढे़गी जिससे उसे प्रकाशक मिलने की संभावनायें बढे़गी और उन देशों के भारतवांशियों के प्रति एक नई निकटता और सौहार्द का भाव उत्पन्न होगा जो लेखकों के आदान-प्रदान का द्वार उन्मुक्त करेगा। साथ ही साथ हिन्दी के पाठ्यक्रम में उनकी रचनाओं को भी स्थान मिलने की संभावनायें बढ़ेगी। क्या यह विडम्बना नहीं है कि चलचित्र-जगत के तुक्कड़ गीतकारों को पाठ्यक्रम में स्थान दिलाने के तो प्रयास हो रहे हैं, पर प्रवासी-साहित्य की ओर से आँखें पूरी तरह बंद रखी जा रही हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्र की ही भाषा न रहकर विश्व-भाषा बन चुकी है और विश्व का शायद ही कोई बड़ा नगर या उपनगर हो जहाँ हिन्दी बोलने वालों की कुछ न कुछ संख्या न हो।

 

प्रत्येक स्तर पर प्रवासी-साहित्य का समावेश हिन्दी के पाठ्यक्रम में होना चाहिए और  विश्वविद्यालयों के स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर प्रवासी-साहित्य का प्रश्नपत्र होना चाहिए। जैसे अँगरेज़ी -साहित्य में अँगरेज़-साहित्यकारों के अतिरिक्त स्थानीय अँगरेज़ी-लेखकों तथा अमेरिका (अँगरेज़ी ) साहित्य का खण्ड होता है, उसी प्रकार हिन्दी साहित्य में भी होना चाहिए। इस में अन्य भाषाओं के पाठ्यक्रमों से भी प्रेरणा ली जा सकती है।

 

भाषा के विकास की यह प्रथम शर्त है कि उसके साहित्य को जानने-समझने का प्रयास से, उसके साहित्यकारों को उचित सम्मान मिले तथा उसके साहित्य का प्रचार-प्रसार हो। और सबसे रोचक तथ्य यह है कि पाठ्यक्रम में सम्मिलित लेखकों को ही सामान्य जन लेखक मानते हैं। यहाँ एक बात और ध्यान में रखनी होगी कि प्रवासी-साहित्य का अर्थ वहाँ की मिट्टी में रचा-बसा साहित्य ही है। दूतावासों के कर्मचारियों और अनुबंध पर सेवा- कार्य कर रहे भारतीयों को उसका अपहरण नहीं करने दिया जा सकता । अपने दाय का संरक्षण-संवर्द्धन करके ही हम वास्तविक रूप से समृद्ध हो सकेंगे। 

श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी

द्वीपांतर,लाल बहादुर शास्त्री मार्ग, फतेहपुर

उत्तरप्रदेश-212501

 

 

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