प्रकृति के सुकुमार कवि - सुमित्रानंदन पंत
कैलाश जैन
आज
भले ही हिन्दी
साहित्य में छायावादी युग का अवसान हो चुका हो किन्तु
यह सत्य है कि हिन्दी कविता
छायावाद के एक अत्यन्त समृद्ध व सम्पन्न दौर से गुजरा
है। हिन्दी में जब कभी
छायावाद की चर्चा होती है,
तब उसके चार सुदृढ स्तम्भों के रूप में प्रसाद,
निराला,
महादेवी वर्मा तथा सुमित्रानंदन पंत को याद किया जाता
है। ये चारों उस युग के कवि
हैं,
जब हिन्दी कविता घुटनों के बल चलना सीख रही थी।
सुमित्रानंदन ने जब लिखना शुरू
किया,
उस समय मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवि मौजूद होने के बावजूद
हिन्दी को कविता की
भाषा के रूप में मान्यता तक प्राप्त नहीं थी। प्रसाद व
निराला के साथ मिलकर पंत ने
हिन्दी को कविता की न केवल सौम्य,
सुकुमार और सशक्त भाषा के रूप में एक सर्वथा नवीन
प्रतिष्ठा दिलवाई बल्कि हिन्दी काव्य के लिए एक
बिल्कुल नई शैली भी ईजाद की।
पंत जी की रचनाओं के बारे में प्रायः यह प्रश्न उठाया
जाता रहा है कि वह
संसारमुखी व यथार्थवादी होने के बदले रूमानी और अति
आत्मकेन्द्रित क्यों है
?
वस्तुतः यह हमारी समूची सांस्कृतिक विरासत का ही मूल
तत्त्व व मौलिक स्वर है।
हिन्दी कविता छायावादी युग के उस दौर में अपने
प्रसव-संकट के समय उस आदि साँचे की
ओर लौट गई,
जो सदियों से भारतीय चेतना का मूल मातृ साँचा रहा है।
प्रकृति के
सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत अल्मोडा जिले के कोसानी
नामक स्थान पर20 मई 1900 को
जन्मे। कवि और पीडा के शाश्वत रिश्ते की सत्यता उनके
जन्म के कुछ ही घंटों के बाद
माँ की मृत्यु के रूप में प्रकट हुई। माँ के अभाव ने
बालक सुमित्रानंदन को अपने
पिता के बहुत अधिक निकट ला दिया। पिता गंगादत्त जी
कोसानी में चाय बागानों की
मैनेजरी के अलावा लकडी का कारोबार भी करते थे। आर्थिक
स्थिति सुदृढ थी किन्तु
युवावस्था में ही पत्नी के बिछोह से वह जीवन के प्रति
विरक्त हो उठे। विरक्ति के
बावजूद वह बालक सुमित्रानंदन पंत से अत्यधिक स्नेह
रखते थे।
पंत जी का बाल्यकाल
अल्मोडा में उनके पिता द्वारा बनवाए गए शानदार व विशाल
मकान में बीता। सन् 1905 में
वह विद्याध्ययन हेतु कोसानी पाठशाला में दाखिल किए गए।
संस्कृत का प्रारम्भिक ज्ञान
उन्हें अपने फूफा से प्राप्त हुए। नौ वर्ष की अल्पायु
में बालक पंत ने मेघदूत,
अमरकोश,
चाणक्य आदि संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन पूर्ण कर लिया
था। पंडित अम्बादत्त
जोशी से पंत जी ने फारसी तथा अपने पिता से अंग्रेजी की
शिक्षा प्राप्त की।
दस
वर्ष की आयु में शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से पंत
जी अल्मोडा आए। यह उनके मानसिक
विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण मोड था। इस दौरान वह
स्वामी सत्यदेव के सम्फ में
आए,
जिन्होंने पंत जी के विचारों को एक साहित्यिक एवं
राष्ट्रवादी स्पर्श प्रदान
किया। पंत जी ने अल्मोडा में ही विधिवत हिन्दी साहित्य
का अध्ययन प्रारम्भ किया। इस
बीच उन्हें इलाचन्द्र जोशी,
गोविन्दवल्लभ पंत और श्यामचरण पंत जैसे मित्र मिले।
साहित्यिक गतिविधियों के कारण उनकी पढाई-लिखाई
प्रभावित तो अवश्य हुई किन्तु फिर भी
बदस्तूर चलती रही। उन्होंने अल्मोडा में नौवीं कक्षा
तक शिक्षा प्राप्त की।
इस
दौरान उन्होंने अपना नाम गोसाई दत्त से बदल कर
सुमित्रानंदन पंत रख लिया। पंत जी ने
कक्षा सातवीं या आठवीं में अध्ययन के दौरान ही कविकर्म
को अपनाने का निश्चय कर लिया
था।
एक बार सुमित्रानंदन पंत अपने पिता के साथ नैनीताल गए।
वहाँ की प्राकृतिक
सुषमा से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी प्रथम रचना
’हार‘
लिखी। इस उपन्यास में
नैनीताल के प्राकृतिक सौन्दर्य का प्रभाव स्पष्ट रूप
से परिलक्षित होता है।
पन्द्रह वर्ष की आयु में पंत जी ने पद्य और छंदों में
अभिनव प्रयोग करते हुए
अनेक रचनाएँ लिखीं। उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ समसामयिक
विषयों व प्राकृतिक सौन्दर्य
पर केन्द्रित थीं। ये रचनाएँ
’सुधाकर‘,
’मर्यादा‘
तथा अल्मोडा के स्थानीय अखबारों
में छपती थीं।
अगस्त1918में
पंत जी ने बनारस के जयनारायण हाई स्कूल में
प्रवेश लिया। इसी साल गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर वहाँ
पधारे। पंत जी उनसे बहुत
प्रभावित हुए। अगले वर्ष वह इंटर की परीक्षा पास करने
प्रयाग के म्योर सेन्ट्रल
कॉलेज आ गए,
जहाँ उन्हें रामचन्द्र जी टंडन,
परशुराम चतुर्वेदी,
फिराक गोरखपुरी आदि
हस्तियों के सम्फ में आने का अवसर मिला। सन्
1921
में असहयोग आन्दोलन के दौरान
गाँधी जी के आह्वान पर पंत जी ने कॉलेज छोड दिया।
सन्
1926-27
में पंत जी की
पहली पुस्तक
’पल्लव‘
के नाम से प्रकाशित हुई। इस समय आर्थिक रूप से पंत जी
के
परिवार की स्थिति अत्यधिक नाजुक थी। सारी जमापूँजी
खर्च हो चुकी थी। हजारों रुपयों
के कर्ज को चुकाने में जमीन जायदाद व घर का सामान तक
बिक चुका था।
1927
में बडे भाई
रघुदत्त जी की मृत्यु ने पंत जी को अन्दर तक हिला कर
रख दिया। पंत जी के पिता अपने
बडे पुत्र की मृत्यु के सदमे को सहन नहीं कर पाए और
डेढ साल बाद ही परलोक सिधार गए।
संवेदनशील व भावुक पंत के लिए यह बहुत गहरा आघात था,
जिसके कारण वह लम्बे समय तक
अस्त-व्यस्त रहे।
सन्
1930
में पंत अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गए।
यहाँ उन्होंने फ्रायड,
साम्यवाद,
माक्र्सवाद आदि का गहन अध्ययन किया। वह माक्र्स के
आर्थिक चिंतन से बेहद प्रभावित हुए। पूरनचन्द जोशी के
सानिध्य में रहकर उनके
विचारों में परिपक्वता आई। इस दौरान उन्होंने कवि के
कल्पनाशील मन के लिए यथार्थ की
नई जमीन तोडी। इस सम्बन्ध में पंत जी कहते हैं -
’मेरे
पाठक इस तथ्य से परिचित हैं
कि काला कंकर के ग्राम जीवन के महान् सम्फ का प्रभाव
मेरी समूची जीवन दृष्टि का एक
अनिवार्य अंग बन चुका है। युगवाणी और ग्राम्या ही में
नहीं,
उसके बाद की रचनाओं में
भी किसी न किसी रूप में और लोकायतन में विशेष रूप से
उस दृष्टि की व्यापक छाप देखने
को मिलती है।‘
पंत जी ने अपने भावों और विचारों को मूर्तरूप प्रदान
करने के
दृष्टिकोण से
’लोकायतन‘
नामक संस्था की शुरुआत की किन्तु इसमें कुछ समय उन्हें
खास
कामयाबी नहीं मिली। पांडिचेरी के अरविन्द आश्रम में
कुछ समय रहने के बाद पंत जी ने
स्वयं को अरविन्द-दर्शन से अभिभूत पाया। अरविन्द
विचार-श्रृंखला का क्रमबद्ध अध्ययन
करने के बाद पंत जी की जीवन दृष्टि ने और व्यापक
आधारभूमि पाई। युगान्त,
युगवाणी,
स्वर्णकिरण आदि रचनाएँ उनके यथार्थोन्मुख रुख की ओर
इंगित करती हैं।
सन्
1938
में पंत जी ने
’रूपाभ‘
नामक एक प्रगतिशील मासिक पत्र का संपादन भार संभाला।
रघुपति
सहाय,
शिवदानसिंह चौहान,
शमशेर जैसे लोगों के सम्फ में आने के बाद वह प्रगतिशील
लेखक संघ से जुडे।
1955
से
1962
तक सुमित्रानंदन पंत आकाशवाणी के मुख्य
प्रोड्यूसर के पद पर बने रहे।
1961
में उन्हें भारत सरकार के उच्च राष्ट्रीय सम्मान
’पद्मभूषण‘
से अलंकृत किया गया।
सन्
1969में
सुमित्रानंदन पंत को उनकी काव्य
कृति
’चिदम्बरा‘
के लिए देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार
’ज्ञानपीठ‘
से सम्मानित
किया गया।
’चिदम्बरा‘
को वर्ष
1968
की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृति घोषित करते हुए
कहा गया कि कवि पंत की ये काव्य रचनाएँ युग के
संघर्षों की पृष्ठभूमि में नई
सौन्दर्यबोध भावना,
भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक विकास की शक्तियों के
समन्वय से
प्रसूत नैतिकता की धारा एवं उन्नत मनुष्यत्व की चेतना
को रूपायित करती है। कवि पंत
हिन्दी काव्य में आधुनिक युग के प्रवर्तकों तथा अभिनव
काव्य-चेतना के प्रेरकों में
अग्रगण्य हैं।
आजीवन अविवाहित रहे हिन्दी साहित्य के इस महत्त्वपूर्ण
लेखक ने
तीन नाटक,
एक कहानी संग्रह,
एक उपन्यास,
एक संस्मरण संकलन सहित करीब चालीस पुस्तकें
लिखीं,
जो उनकी निरन्तर सृजनशीलता को रेखांकित करती हैं।
’उच्छ्वास‘,
’गुंजन‘,
’वीणा‘
आदि छायावादी कृतियों से शुरू हुआ यह साहित्यिक सफर
अरविन्द-दर्शन और
साम्यवादी युग-चेतना से प्रभावित ग्रंथों
’युगांत‘,
’स्वर्णकिरण‘,
’उत्तरा‘,
’पतझड‘,
’शिल्पी‘
में सिमटता हुआ
’कला
और बूढा चाँद‘
जैसी यथार्थवादी रचना तक
पहुँचा। इस रचना पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी
मिला।
77
वर्ष की आयु में
सुमित्रानंदन पंत का निधन हो गया,
जो सचमुच हिन्दी साहित्य जगत् की अपूरणीय क्षति
था।(साभार)
