खींचना
डॉ. गंगा प्रसाद गुप्त ‘बरसैंया’
सामान्यतः किसी दबी या फँसी हुई चीज़ को बाहर निकालना अपनी ओर घसीटना खींचना कहा जाता है। बुनकर सुलझाने के लिये धागा तानकर खींचता है तो सुनार तार पतला करने के लिये उसे खींचता है। गाड़ी खराब हो जाये तो दूसरी गाड़ी खींचती है। परन्तु टाँग खींचना एकदम अलग बात है। प्रतिद्वन्दी या परस्पर दुश्मन एक दूसरे की टाँग खींचने की ताक में रहते हैं ताकि पटखनी दे सकें, आगे बढ़ने से रोक सकें ।
कुछ लोग साथ देने या सहयोग करने का वायदा करके अपना हाथ खींचकर अलग हो जाते हैं। एक के हाथ खींचने से दूसरा कमजोर हो जाता है। काम न पसंद होने पर भी लोग अपना हाथ खींच लेते हैं। विवाद होने पर मुँह लड़ाने पर प्रायः लोग ज़बान खींचने की धमकी देते हैं। जब ज़बान ही खींच ली तो फिर बोलना कैसा ? कभी-कभी कान खींचकर बच्चों को ऊधम करने से रोका जाता है या गलत काम दुबारा न करने की हिदायत दी जाती है।
जब कोई परिजन, संबंधी, साथी या साझीदार दूसरे की आँख बचाकर या बहाना बनाकर अधिक माल हड़पने की चेष्टा करता है या चुपचाप रखता है तो उसे माल खींचना कहते हैं। राम आजकल श्याम को बेवकूफ बनाकर खूब माल खींच रहा है। एक पक्ष दूसरे पक्ष के लोगों को अपनी ओर खींचकर अपने को सबल बनाता है्। राजनीति के क्षेत्र में यह रोज देखा जा सकता है। वे लोग एक दूसरे की टाँग भी खींचते हैं और आदमी भी खींचतें हैं। इससे खींचातानी भी मच जाती है।
चोर या बदमाश कहीं छिपा हो तो गुस्से में लोग उसे खींच-खींचकर भारते हैं। भाइयों-भाइयों में झगड़ा हो जाये तो घर-खेत आदि के बँटवारे में लाइन खींच दी जाती है। इस प्रकार की लाइन खींचना बड़ा दुखदायी होता है। कई बार ताव में आकर जोर देने के लिए रेखा खींचने का उल्लेख करते हैं। मैं रेखा खींचकर अर्थात् पक्के तौर पर विश्वासपूर्वक कहता हूँ कि ऐसा होकर रहेगा। मेंथरा ने कैकेयी से इसी तरह अपनी बात कहकर विश्वास दिलाया था –
रेख खंचाय कहौं बल भाखी ।
भामिनी भइउ दूथ कै माखी ।।
बंटवारे की रेखा में और इस रेखा में बहुत अंतर है। कुएँ से रस्सी-घड़े के माध्यम से पानी खींचा जाता है। पानी खींचना यानी भरना। कुछ लोग अपनी ओर दूसरों का ध्यान खींचकर आकर्षित करने के लिए नाना प्रकार के करतब करते हैं। कभी किसी के प्रति आकर्षित होकर मन अपने आप खिंचता चला जाता है। साधक लोग श्वाँस खींचकर प्राणायाम करते हैं। फोटो ग्राफर कैमरे से चित्र खीचता है और बड़ा पौधा छोटे पौधे का रस खींच लेता है। क्रोध में आकर पुलिसवाले अपराधी से प्रायः चमड़ी खींचकर भूसा भरने की बात कहते हैं । न चमड़ी खींची जाती है, न भुसा भरा जाता है, पर मुहावरा अपने अर्थ खींचकर हथियाने के दाँव-पेंच खेलते रहते हैं। कुर्सी अपनी जगह ही रहती है - फिर भी खींच-तान बनी रहती है। जिसका दाँव लगा वही बैठ जाता है।
खींचने का खेल बड़ा रोचक है लेकिन बिना ज्ञान के इसे नहीं खेला जा सकता । ज्यादा खींचा-खाची में सारा खेल ही बिगड़ जाता है।
डॉ.
गंगा प्रसाद गुप्त
‘बरसैंया’
एम.आई.जी. – 12
चौबे कॉलोनी, छतरपुर, मध्यप्रदेश
