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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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   चीन की चिट्ठी

 

जरूरत है सिर्फ एक संकल्प की


 राजनंदन

 

भाषा के प्रति अँगरेज़ों की एक नीति थी। किसी भी समाज या राष्ट्र को दबाना है तो सबसे पहले उसकी बोली या भाषा को दबाकर उस पर अपनी भाषा थोप दो। इससे उसकी अपनी अभिव्यक्ति दब जायगी और थोपी हुई भाषा में वह अपने आपको कभी अभिव्यक्त नहीं  कर पायेगा। दुर्भाग्य से भारत के साथ भी यही हुआ।

 

आजादी के समय जब अंग्रेजों के हाथ से भारतीयों के हाथ में सत्ता का हस्तानांतरण हुआ तो देश में उम्मीदों की अनगिनत आशाएँ जागीं। उसमें एक महत्वपूर्ण आशा हिन्दी के विकास की भी थी। हिन्दी और हिन्दी प्रेमियों ने यह सपना देखा कि अब वर्षों से दबी हुई हिन्दी को अपनी जगह और आवाज दोनो मिल जाएगी। मगर हिन्दी का दुर्भाग्य!  तत्कालीन गैर अँगरेज़ी भरत सरकार को या तो हिन्दी आती नहीं  थी या फिर हिन्दी में अपने राजकाज करने में सक्षम नहीं  थी। इसलिए स्वतंत्र भारत के राजकाज में अँगरेज़ी का राज कायम रहा।

 

दुसरी तरफ भारत के विशाल जनसमूह को अँगरेज़ी नहीं आती थी। महापुरुषों ने भी भारत को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए हिन्दी भाषा को ही  सबसे उपयुक्त एवं सक्षम समझा इसलिए हिन्दी स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा घोषित हुई मगर एक निश्चित अवधि तक विशेष राजकाज अँगरेज़ी में ही  करते रहने का निर्णय लिया गया। उस निश्‍चित अवधि का अंत अभी तक तो नहीं हुआ, शायद कभी अंत भी न हो।

 

हिन्दी जो सच्चे अर्थों मे अभी तक अपने देश की राष्ट्रभाषा नहीं  बन पायी, उसे विश्‍वभाषा बनाने के लिए हाल ही में आठवाँ विश्‍व हिन्दी सम्मेलन न्यूयॉर्क में संपन्न हुआ। सुनने में आया कि इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए हिन्दी के कुछ स्वर्गीय सहित्यकारों को भी सरकार के तरफ से न्योता दिया गया था।

 

आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि संबंधित मंत्री महोदय ने हिन्दी के विकास और हिन्दी को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की जरूरत को महसूस किया और उस जरूरत को दुनिया के सामने रखा।

 

विदेश राज्यमंत्री श्री आनंद शर्मा ने न्यूयॉर्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन से जुड़ी तीन प्रदर्शनियों का उद्घाटन करते हुए कहा कि हिंदी भाषा को सूचना प्रौद्योगिकी के साथ जोड़े जाने की जरूरत है दुनिया में जिस रफ्तार से तकनीकी प्रगति हो रही है हिंदी को भी उसके साथ कदम मिलाते हुए चलना होगा, तभी वह विश्व में उस मुकाम तक पहुँच पाएगी जिसकी वह हकदार है।

 

सोचने की बात यह है कि इस जरूरत को इतनी देर से महसूस क्यों किया गया? होना तो यह चाहिए था कि ऐसी जरूरतें समय से पहले महसूस की जाती। इनकी पूरी तैयारी की जाती और सम्मेलन में यह घोषणा की जाती कि आज हिन्दी  हर प्रकार की आधुनिक प्राद्यौगिकी से जुड़कर समृद्ध और सक्षम होकर विश्‍वभाषा के रूप में प्रस्तुत है। यदि कोई जरूरत है तो सिर्फ संयुक्त राष्ट्र से मान्यता की।

 

समझ में नहीं  आता कि इतने बड़े सम्मेलन का आयोजन करके अपने ही मुँह से अपनी भाषा को अधूरा बताकर हम अपनी भाषा को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दिलाने की कोशिश करने गये थे या भाषा को अभी और समृद्ध बनाने के नाम पर कही  से धन का जुगाड़ करने? विश्‍व स्तर पर हिन्दी सम्मेलनों का उद्‍देश्य हिन्दी की समृद्धि और उपलब्धियों का प्रदर्शन होना चाहिए न कि हिन्दी की कमी एवं जरूरतों का व्याख्यान।

 

सरकार ने हिन्दी के विकास के लिए जिन जरूरतों को न्यूयॉर्क जाकर महसूस  किया इससे हिन्दी के प्रति सरकारी रवैये का अंदाज़ा भी लगता है। क्योंकि वास्तव में हिन्दी उनके द्वारा महसूस की गई जरूरतों से कही  बहुत आगे बढ चुकी है। विश्‍वजाल पर हिन्दी वेव-पत्रिका, हिन्दी ब्लॉग, हिन्दी में चिट्ठियाँव(चैटिंग), हिन्दी ई-मेल, हिन्दी शब्दकोश, हिन्दी टाइप करने के औजार, देवनागरी वेव खोज और.. मेरी जानकारियों से ज्यादा और भी बहूत कुछ, विश्‍वजाल पर हिन्दी-देवनागरी में उपलब्ध है।

 

हिन्दी के सैकड़ों वेब-साईट अंतर्जाल पर उपलब्ध है। चीन में भी रेडियो पर हिन्दी कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। चाइना रेडियो इंटरनेशनल का सशक्त हिन्दी वेब-साइट है। जिसके माध्यम से वह अपने आप को संपूर्ण रूप से हिन्दी में अभिव्यक्त करता है। इस साईट पर चीन के इतिहास, भूगोल, कला, साहित्य, धर्म-संस्कृति, आर्थिक, राजनितिक विकास से लेकर आधुनिक योजना-परियोजना, समसामायिकी एवं प्रतिदिन के समाचार तक बिना किसी व्यवधान के शुद्ध हिन्दी में उपलब्ध है।

 

चीन जैसे गैर हिन्दी राष्ट्र में यदि हिन्दी को सूचना तकनीकी से जोड़कर इतना सक्षम बना लिया गया है कि वह इतनी आसानी से अपने आपको अभिव्यक्त कर सकता है और प्रतिदिन करता भी है तो सूचना तकनिकी के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले देश, भारत की सरकार अभी तक यह क्यों सोंच रही है कि हिन्दी को सूचना प्रद्यौगिकी से जोड़े जाने कि जरूरत अभी शेष है।

 

मुझे पूरी उम्मीद थी कि विश्‍वहिन्दी सम्मेलन के अवसर पर हिन्दी पत्रकारिता एवं हिन्दी साहित्य को सूचना-प्रद्यौगिकी से जोड़कर हिन्दी को वैश्‍विक उँचाइयों पर पहुँचाने वाले हिन्दी के सभी प्रमुख बेव-पत्रिकाओं से जुड़े संपादक एवं संचालकों को न्यूयॉर्क बुलाकर उन्हे उनकी हिन्दी सेवा के लिए सम्मानित किया जाएगा, उनके योगदान को सराहा जाएगा और विश्‍वमंच पर दुनिया से उनका परिचय करवाया जाएगा। मगर ऐसा संभवत: कुछ भी नहीं हुआ।

 

हिन्दी में ब्लॉग पत्रकारिता के लिए माता सुंदरी पुरस्कार से सम्मानित श्री ज.प्र. मानस के एक ब्लॉग में मैने हिन्दी को समर्पित उत्साही युवा श्री जगदीप डांगी के विषय में पढा था। ऐसे योग्य, उत्साही लोगों की खोज या चयन करोड़ों रूपया खर्च करके भी क्या सरकार के किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा या साक्षात्कार के माध्यम से संभव है? शायद नहीं ! क्योकि ऐसे लोग आवेदन ही नहीं करेंगे। यदि सौभाग्य से किसी डांगी के मन में हिन्दी के लिए कुछ करने की दीवानगी है तो सरकार की नज़र में उसका कोई महत्व ही नहीं  है।

 

क्या हुआ श्री डांगी के प्रयासों का परिणाम? विश्‍वहिन्दी सम्मेलन में यदि उन्हें नहीं बुलाया गया तो कम से कम उनकी उपलब्धियों को ही दुनिया के सामने रखा जा सकता था। संभवत: ऐसा भी कुछ नहीं हुआ। और न ही कहीं पर उनका नाम सुना गया।

 

 

जैसा कि मेरा विश्‍वास है हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं विकास के लिए दो दर्जन से भी अधिक विश्‍व हिन्दी सम्मेलन जैसे आयोजनों का जितना प्रभाव नहीं होगा उससे कही ज्यादा प्रभाव अकेले एक जाल-पत्रिका का होता है। जो अपनी प्रकाशन अवधि के हिसाब से हर माह, हर सप्ताह हिन्दी में एक नया अध्याय जोड़ती है और उस नये अध्याय से दुनिया को अवगत भी कराती है।

 

यदि भारत की सरकार ईमानदारी पूर्वक यह ठान ले कि हिन्दी को विश्‍वभाषा बनानी ही है तो दुनिया में ऐसा कोई कारण नहीं जो हिन्दी को अपने लक्ष्य तक पहुँचने से रोक सके। दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं  जहाँ भारतवंशियों की भारी संख्या नहीं । यदि मन में दृढ संकल्प हो तो काम बहुत आसान है।

 

इसके लिए न तो हमें अंग्रेजों जैसी भाषा नीति अपनाने की जरूरत है, न ही अँगरेज़ी को छोड़ने की जरूरत है, न ही किसी योजना-परियोजना, विचार-विमर्श या विश्‍वसम्मेलन की जरूरत है, न ही अपने देश में हिन्दी के नाम पर हिन्दी माह, पखवाड़ा या सप्ताह मनाने की जरूरत है। और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी प्रकार की कोई गुहार लगाने या लंबे समय तक इंतजार की जरूरत है। विश्‍वभाषा बनने के लिए संयुक्त राष्ट्र से हिन्दी को सादर निमंत्रण मिल सकता है।

 

जरूरत है तो ईमानदारी पूर्वक सिर्फ एक संकल्प की और संकल्प के प्रति पुन: ईमानदारी की।

  

राजनन्दन

हांगज़ाउ, चीन

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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