एक अनूठे छंद को
वीरेन्द्र आस्तिक
दिन भर गूँथे शब्द
रिझाया एक अनूठे छंद को ।
रस्ते से देखा श्रमिकों को, खेतों से करते प्यार को
देखा जैसे दर्पण में, दुल्हन को करते श्रृंगार को
देख बीज पड़ी धरती भी महसूसा आनंद को ।
श्रम से थके सूर्य, घर लौटे पथ अगोरती मिली जुन्हाई
कूद रहा खूँटे पर बछड़ा, गइया ने हुँकार लगाई
स्वस्थ सुबह के लिए चाँदनी फिर कसती अनुबंध को ।
दिन भर गूँथे शब्द
रिझाया एक अनूठे छंद को ।
वीरेंद्र आस्तिक
कानपुर, उत्तरप्रदेश
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