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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   छंद

 

एक अनूठे छंद को


वीरेन्द्र आस्तिक

दिन भर गूँथे शब्द

रिझाया एक अनूठे छंद को ।

 

रस्ते से देखा श्रमिकों को, खेतों से करते प्यार को

देखा जैसे दर्पण में, दुल्हन को करते श्रृंगार को

देख बीज पड़ी धरती भी महसूसा आनंद को ।

 

श्रम से थके सूर्य, घर लौटे पथ अगोरती मिली जुन्हाई

कूद रहा खूँटे पर बछड़ा, गइया ने हुँकार लगाई

स्वस्थ सुबह के लिए चाँदनी फिर कसती अनुबंध को ।

 

 

दिन भर गूँथे शब्द

रिझाया एक अनूठे छंद को ।

वीरेंद्र आस्तिक

कानपुर, उत्तरप्रदेश

 

 

गीतकार

 

मुकुंद कौशल

डॉ. कमलेश व्यास

वीरेन्द्र आस्तिक

परवीन हक़

डॉ. गणेशदत्त सारस्वत

डॉ. शरद नारायण खरे

सूर्यदेव पाठक 'पराग'

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