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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   छंद

 

आँखों पर है पहरा


सूर्यदेव पाठक 'पराग'

 

कैसे तेरे पथ पर आऊँ, आँखों पर है पहरा

 

रह-रह नयन बहुत अकुलाते, बिन दर्शन के चैन न पाते

सुमिरन, तुम्हारे स्मित आनन का,

मैं जो लोभी ठहरा ।

 

बात न जानूं तेरे मन की, भूल गया सुधि अपने मन की

ये मृगनयनी नयन बाण का

साथ बहुत है गहरा ।

 

होंठों पर है नाम तुम्हारा, कितना मीठा, कितना प्यारा

देख-देख मुख चंद्र

हृद सागर उठता है लहरा ।

 

कैसे अपने को समझाऊँ, ज्वलित दीप किस भाँति बुझाऊँ

केवल अपना कहने वाला

दिल होता है बहरा ।

 

याद तुम्हारी है मनभावन, स्पर्श तुम्हारा लगता पावन

चमक रहा है सूर्य प्रेम का

तब क्यों फैला कुहरा ।

सूर्यदेव पाठक 'पराग'

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

 

 

 

गीतकार

 

मुकुंद कौशल

डॉ. कमलेश व्यास

वीरेन्द्र आस्तिक

परवीन हक़

डॉ. गणेशदत्त सारस्वत

डॉ. शरद नारायण खरे

सूर्यदेव पाठक 'पराग'

 

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