आँखों पर है पहरा
सूर्यदेव पाठक 'पराग'
कैसे तेरे पथ पर आऊँ, आँखों पर है पहरा
रह-रह नयन बहुत अकुलाते, बिन दर्शन के चैन न पाते
सुमिरन, तुम्हारे स्मित आनन का,
मैं जो लोभी ठहरा ।
बात न जानूं तेरे मन की, भूल गया सुधि अपने मन की
ये मृगनयनी नयन बाण का
साथ बहुत है गहरा ।
होंठों पर है नाम तुम्हारा, कितना मीठा, कितना प्यारा
देख-देख मुख चंद्र
हृद सागर उठता है लहरा ।
कैसे अपने को समझाऊँ, ज्वलित दीप किस भाँति बुझाऊँ
केवल अपना कहने वाला
दिल होता है बहरा ।
याद तुम्हारी है मनभावन, स्पर्श तुम्हारा लगता पावन
चमक रहा है सूर्य प्रेम का
तब क्यों फैला कुहरा ।
सूर्यदेव पाठक 'पराग'
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
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