गीत में लिखता रहूँगा
डॉ. शरद नारायण खरे
तुम भले ही ना सुनो पर, गीत मैं लिखता रहूँगा ।
लेखनी के शब्द सारे, हर घड़ी तुझको पुकारें
कह रहे खुदभाव मेरे, वो तो हैं तेरे सहारे
तुम भले ही ध्यान ना दो, नेह मैं बुनता रहूँगा ।
उर में मेरे काव्य-धारा, रागिनी छेड़े तुम्हारी
गीत की लय कह रही है, तुम बिना वो है बेचारी
तुम भले ही रूठ जाओ, मैं मनाता ही रहूँगा ।
है अधर पर प्यास बाकी, कामना तेरी करूँगा
चाह तेरी, साध तेरी, आराधना तेरी करूँगा
तुम भले ही दरस ना दो, बंदगी पर मैं करूँगा ।
नाम तेरे दिल धड़कता, मानना तेरी करूँगा
अश्रु मेरे अर्चना में, साधना तेरी करूँगा
तुम भले ही जुड़ ना पाओ, तुमसे में जुड़ता रहूँगा ।
डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, मध्यप्रदेश
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