चंदा की बाहों में
डॉ. गणेशदत्त सारस्वत
चंदा की बाहों में आओ हम बँधें, मिलें ।
मधुवन में में बरस चलें, मन-उपपन सरस करें, चंदा की बाहों में ।
अनभोगी काया की मणिकंचनी कथाएँ
आओ, हम दोनों ही मिलकर के दुहराएँ
नलिनी के सौरभ पर, चंदन की गंध मलें, चंदा की बाहों में ।
चाँदी के निर्झर में, द्युति कनकसी अरविंदी
कलियों की कंचुकि में भौंरे सा मन बंदी
आओ, मधु गीतों में, स्वर लय में हिलें-मिलें, चंदा की बाहों में ।
लहरों के सरगम पर ग़ज़ले रेशमी कहें
कामना रचे मेंहदी, आदिम युग पुनः सृजें
आओ, इस मौसम में, फूलों की गंध वरें, चंदा की बाहों में ।
छवि के नंदन वन में मनसिज के कमल खिलें
ऋतुपति का सौरभ ले, सुख के मकरंद झरें
मदजल से पूनम का, आओ, अभिषेक करें, चंदा की बाहों में ।
डॉ. गणेशदत्त सारस्वत
सीतापुर, उत्तरप्रदेश
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